8.24 ‘अपने जन के कारने कृष्ण भए रघुनाथ’

8.24 ‘अपने जन के कारने कृष्ण भए रघुनाथ’

कृष्ण-कथा पर राम-कथा का कितना असर पड़ा,यह तो पता नहीं चलता।किंतु,अर्वाचीन राम-कथाओं पर कृष्ण की रास-लीला संबंधी कथाओं का असर साफ देखा जा सकता है।वैसे प्राचीन ग्रंथों में भी कृष्ण के साथ प्रेम की कथाएँ नहीं मिलती।कृष्ण का प्राचीनतम् उल्लेख पहले छांदोग्य उपनिषद् में और तब महाभारत में मिलता है।इन दोनों ग्रंथों में कृष्ण के रसिक रूप की चर्चा नहीं है।पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार प्राचीनतम भारतीय साहित्य और शिल्प में श्रीकृष्ण की श्रृंगार-लीलाओं का प्रमाण नहीं मिलता।उनके अनुसार श्रीकृष्ण के दो मुख्य रूप हैं।एक में वे यदुकुल के श्रेष्ठ रत्न हैं,वीर हैं,राजा हैं,कंसारि हैं।दूसरे में वे गोपाल हैं,गोपी-जन वल्लभ हैं,’राधाधर-सुधापान-शालि-वनमाली’ हैं।प्रथम रूप के अपेक्षाकृत दूसरा रूप नवीन है।धीरे-धीरे दूसरा रूप प्रधान हो गया और पहला गौण। इसी प्रधान रूप का प्रभाव कृष्ण -कथा के बाद राम-कथा पर भी पड़ा।

हम जिन राम-कथाओं से आम तौर पर परिचित हैं,उनके अनुसार राम श्रेष्ठ और उच्च गुणों से युक्त एक आदर्श व्यक्ति हैं,मर्यादा पुरुषोत्तम हैं,एक पत्नीव्रतधारी हैं।जिसका चित्रण वाल्मीकि रामायण,महाभारत के रामोपाख्यान,अध्यात्म रामायण और तुलसीकृत रामचरित मानस में किया गया है।इसलिए श्रीराम द्वारा कोई रास रचाया गया होगा,यह विचार ही हमारी सोच से परे है।पर आनंदरामायण, सत्योपाख्यान आदि में राम-सीता की विलास-क्रीड़ाओं का विस्तृत वर्णन है,लगता है ये कृष्ण-लीला से प्रभावित है।किन्तु,कृष्ण-कथा के अनुकरण की चरमसीमा यह है कि भुशुण्डीरामायण, महारामायण, हनुमत्संहिता,वृहत्कोशलखंड, संगीत रघुनंदन आदि ग्रंथों में राम के रासलीला की कल्पना कर ली गई।विवाह के पूर्व और विवाह के बाद राम अयोध्या के आसपास रासलीला करते हैं और वनवास के समय चित्रकूट मेें भी।

हनुमत्संहिंता में हनुमान-अगस्त्य-संवाद के रूप में सरयू-तट पर राम की रास-लीला और जलविहार का वर्णन किया गया है।इसके अनुसार सीता अपने शरीर से १८१०८ नारियों की सृष्टि करती हैं और इनके साथ रास करने के लिए राम,कृष्ण की तरह ही इतने ही रूप धारण कर लेते हैं।

वृहत्कोशल खंड में विवाह के पूर्व राम की रास-लीला का वर्णन है।कथा के अनुसार राम के सखा (जिनमें रुद्र भी शामिल हैं) स्त्री का रूप धर कर राम के साथ रासलीला का आयोजन करते हैं बाद में गोपिकाओं,देवकन्याओं और राजकन्याओं के साथ रास का वर्णन किया गया है।किसी अवसर पर राम को देखकर गोपियों का मन आकर्षित हुआ और वे उनको पतिस्वरूप प्राप्त करने के उद्देश्य से तप और माता पार्वती की पूजा करने लगीं।एक बार पिता की आज्ञा लेकर राम शिकार के बहाने यमुनातट पहुंचते हैं।यहाँ पर राम गोपियों के पास पहुंचकर उनके साथ वसंतोत्सव मनाते और रासलीला भी करते हैं।इसमें लक्ष्मी, सरस्वती, उमा आदि मालिन का रूप धारण कर भाग लेती हैं।

विवाह के बाद राम सीता विश्वकर्मा-निर्मित प्रासाद में निवास करते हैं,समय-समय पर विविध उत्सव मनाते हैं और वन में जाकर रासलीला करते हैं।राम-रासलीला के वर्णन में कृष्ण की रासलीला का स्पष्ट अनुकरण किया गया है।जैसे-राम का बहुत से रूप धारण करना,अन्तर्धान हो जाना,सीता की मानलीला आदि।

रामकथा के बहुत से पात्रों का संबंध कृष्ण चरित्र के पात्रों से स्थापित किया गया है।राम और कृष्ण की अभिन्नता के अलावा सीता-सुभद्रा और लक्ष्मण-बलभद्र की अभिन्नता भी बताई गई है।आनंदरामायण में माना गया है कि सीता कृष्णावतार में रुक्मिणी बनकर प्रकट होंगी।इनके अलावा इन पात्रों की अभिन्नता का उल्लेख मिलता है–मंथरा और पूतना,शूर्पनखा और कुब्जा,बालि और भील,अयोध्या का धोबी और कंस का धोबी,जाम्बवान और जाम्बवंती का पिता,वानर और गोप।गर्गसंहिता के अनुसार राम ने मिथिला,कोसल देश और अयोध्या की स्त्रियों को गोपियाँ या कृष्ण की पत्नियाँ बन जाने का आश्वासन दिया था,जो उनसे मिलन को उत्सुक थीं।सत्योपाख्यान में रत्नालखा और उसके पति को अगले जन्म में यशोदा और नन्द के रूप में जन्म लेने का वरदान मिलता है।आनन्द रामायण के अनुसार राम ने नागकन्या,गुणवती विधवा,पिंगला वैश्या और सुगुणा दासी को आश्वासन दिया था कि वे क्रमश: जाम्बवती,सत्यभामा, कुब्जा और राधा के रूप में प्रकट होंगी।आनन्द रामायण में यह भी माना गया है कि एकपत्नीव्रत का पालन करने के कारण कृष्णावतार में राम की बहुत सी पत्नियाँ होंगी और इसका उल्लेख किया गया है कि ब्राह्मणों को सोलह अथवा एक सौ सुवर्ण मूर्तियाँ प्रदान करने के कारण राम को कृष्णावतार में सोलह हजार पत्नियाँ मिलेंगी।।गर्ग संहिता के अनुसार रामाश्वमेध की स्वर्ण सीताएँ भी गोपियों के रूप में प्रकट हुईं।

वैसे हमारे लिए राम-कृष्ण दोनों एक ही हैं,दोनों नारायण के पूर्णावतार हैं,परब्रह्म हैं,परमात्मा हैं।दोनों के अवतार का उद्देश्य भी समान है,दुष्टों का संहार और धर्म की स्थापना। ‘यदा-यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत’ या

‘जब-जब होय धरम कै हानि।

बाढै़ असुर अधम अभिमानी।।

तब-तब प्रभु धरि मनुज सरीरा।

हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा।।’

जहाँ तक उनकी नर लीलाओं की बात है,भक्त लोग कृष्ण में राम और राम में कृष्ण की लीलाओं का दर्शन कर लेते हैं।सामान्य जन को राम-कृष्ण की एकरूपता बताने के लिए एक बार तुलसीदास जी ने कृष्ण मंदिर में कृष्ण प्रतिमा के सामने यह कह कर माथा नवाने से इंकार कर दिया था ‘तुलसी मस्तक जब नवे धनुष बान लो हाथ’ और देखते ही देखते कृष्ण धनुष-बाण धारी रघुनाथ केे रूप में प्रकट हो गए।तब कृतज्ञता भाव से माथा नवाते हुए तुलसीदास जी के मुंह से निकला ‘अपने जन के कारने,कृष्ण भये रघुनाथ।’

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