अनुपम सौंदर्य की प्रतिमा, जिसे ब्रह्माजी ने स्वयं अपने हाथों से गढ़ा हो,वह भी ऐसे-वैसे तरीके से नहीं,अपितु उसे सर्वांग सुंदर बनाने के लिए पहले एक हजार स्त्रियों की रचना की, जिनमें से उन्होंने उनकी सारी विशेषताएँ लेकर फिर उसका निर्माण किया।ऐसी नारी को तो सर्वथा निर्दोष और लावण्यमयी होना ही था।ब्रह्मपुराण के अनुसार ब्रह्मा ने एक ऋषि को देखभाल के लिए उसे सौंपा रखा था।यौवन प्राप्ति पर उस अपूर्व सुंदरी को प्राप्त करने के लिए समस्त देवता,मुनि, दानव, यक्ष, राक्षस उतावले हो उठे,जिनमें से देवराज इन्द्र की आतुरता और अभिलाषा तो सबसे अधिक थी।यह देखकर ब्रह्मा ने कहा कि जो भी पृथ्वी की प्रदक्षिणा करके सर्वप्रथम मेरे पास आएगा,उसी को यह कन्या दे दी जाएगी।इस पर समस्त देवता पृथ्वी की प्रदक्षिणा करने निकल पड़े,किन्तु, एक ऋषि ने अर्धप्रसूता सुरभि और एक शिवलिंग की प्रदक्षिणा की,जिसे पृथ्वी की प्रदक्षिणा के समतुल्य मानकर और उनकी सिद्धि देखकर ब्रह्मा जी ने उस कन्या को उन्हें प्रदान किया।आप जानने को उत्सुक होंगे कि वह युवती कौन थी और वे ऋषि कौन थे।तो वह अनिंद्य सुंदरी स्त्री थी देवी अहल्या और वे ऋषि थे महर्षि गौतम।ब्रह्मा जी ने उसका नाम अहल्या रखा ही इसलिए था क्योंकि उसमें ‘हल’ (कुरूपता) का सर्वथा अभाव था।गौतम ऋषि जैसे संयमी महात्मा भी अहल्या के रूप के ताप से पिघल गए और तपस्वी से गृहस्थ बन गए।संभवत: उनके मन में भी देवी अहल्या को पाने की इच्छा पहले से ही रही हो।वैसे भी विवाह के पहले ब्रह्मा ने धरोहर के रूप में अहल्या को उन्हीं के पास रखा था।
अहल्या की उत्पत्ति के संबंध में एक अन्य कथा हरिवंशपुराण में मिलती है,जिसमें माना गया है कि बध्यश्व तथा मेनका की दो संतान थी–दिवोदास और अहल्या।अहल्या ने गौतम ऋषि की पत्नी बन कर शतानन्द को जन्म दिया।अहल्या चूँकि मेनका जैसी अपूर्व सुंदरी की संतान थी,इसलिए उसे अपनी माता की सुंदरता स्वत: प्राप्त हो गई।यद्यपि उसके पिता का नाम में मतभेद है।विष्णुपुराण में उसके पिता का नाम बृहदश्व, मत्स्यपुराण में विंध्याश्व और भागवत पुराण में मुद्गल माना गया है।
अहल्या यद्यपि ऋषि गौतम की पत्नी बन चुकी थी किन्तु,इन्द्र की कुटिल नजर अहल्या पर बनी हुई थी।वह किसी भी तरह उसे पाना चाहता था।गौतम-पत्नी के साथ इन्द्र के दुराचार का वर्णन पहले-पहल महाभारत में मिलता है।इस कथा के अनुसार अपनी पत्नी के व्यभिचार से क्रुद्ध होकर गौतम ने अपने पुत्र चिरकारी को अहल्या का वध करने का आदेश दिया और तपस्या करने वन चले गए।चिरकारी ने इस आदेश पर बहुत समय तक विचार किया और इस नतीजे पर पहुंचा कि माता निर्दोष हैं।क्योंकि इन्द्र गौतम के वेष में उनके पास गए थे।इतने में गौतम वन में सोचने लगे कि मैंने अपनी निर्दोष पत्नी के वध का आदेश देकर अच्छा नहीं किया।इन्द्र ब्राह्मण के वेश में मेरे आश्रम आए;उसने उनका अतिथ्य-सत्कार किया।बाद में जो दु:खद घटना हुई उसमें मेरी स्त्री का कोई दोष नहीं था–अत्र चकुशले जाते स्त्रिया नास्ति व्यतिक्रम:।इसलिए वह घर लौटे और अपने स्त्री को कुशल पाकर पुत्र चिरकारी की प्रशंसा करने लगे।स्कंद पुराण के अनुसार वह अपने पुत्र और भार्या के साथ चिरकाल तक अपने आश्रम में रहकर अंत में स्वर्ग सिधारे— ततश्चिरमुपास्याथ दिवं यातश्चिरं मुनि:।
महाभारत में कई स्थलों पर इन्द्र के प्रति गौतम के शाप का उल्लेख है,किन्तु अहल्या को महाभारत में सर्वत्र निर्दोष ही माना गया है।वाल्मीकीय रामायण के उत्तरकांड के अनुसार भी अहल्या निर्दोष है पर बालकांड में कहा गया है कि जिज्ञासा से प्रेरित होकर अहल्या ने इन्द्र को गौतम के वेष में पहचानते हुए भी उनका प्रस्ताव स्वीकार किया था:
मुनिवेषं सहस्त्राक्षं विज्ञाय रघुनंदन।
मतिं चकार दुर्मेधा देवराज कुतूहलात्।
वाल्मीकीय उत्तरकांड के अनुसार गौतम ने अहल्या से कहा कि तुम्हारे सौंदर्य के कारण यह अनर्थ हुआ है,इसलिए अब से लेकर तुम अकेली ही सुंदर नहीं होगी;सभी लोग तुम्हारे सौंदर्य के भागी बन जाएंगे।
तस्मांद्रूपवती लोके न त्वमेका भविष्यसि।
रूपं च ते प्रजा: सर्वा गमिष्यंति न संशय:।।
बालकांड के वृतान्त में ही गौतम अहल्या को आदेश देते हैं कि वह अदृश्य होकर राम के पहुंचने तक तपस्या करे।साथ ही गौतम यह भी कहते हैं कि राम का आतिथ्य सत्कार करने के बाद तुम पूर्ववत अपना शरीर धारण कर मेरे पास आओगी– स्वं वपुर्धारयिष्यसि।संभवत: इसी वाक्यांश को लेकर बाद में यह धारणा बन गई कि अहल्या शापवश शिला बन गई थी।आगे चल कर पाषाणभूता अहल्या का उल्लेख अनेक रामकथाओं में किया गया।
वाल्मीकीय उत्तरकांड के अनुसार गौतम ने अहल्या को आश्वासन दिया कि विष्णु-अवतार राम के दर्शन-मात्र से वह पवित्र हो जाएगी(तं द्रक्ष्यसि भद्रे तत: पूता भविष्यसि।)
राम के आगमन तक वह शाप के प्रभाव से अदृश्य होकर तपस्या करती है।विश्वामित्र से यह कथा सुन कर राम और लक्ष्मण आश्रम में प्रवेश करते हैं।उसी समय शाप की अवधि समाप्त हो जाती है;इसलिए अहल्या दृष्यमान हो जाती हैं और राम-लक्ष्मण ऋषि-पत्नी के पैर छूते हैं–राघवौ तु तदा तस्या: पादौ जगृहतुस्तदा। राम-लक्ष्मण का आतिथ्य-सत्कार करने के बाद (पाद्य मध्यं तधातिथ्यं चकार सुसमाहिता)अहल्या अपने पति के पास लौट जाती है।
बाद की अधिकांश रचनाओं यथा- नृसिंह पुराण,स्कंद पुराण,जानकी हरण, महानाटक, उदारराघव,सोमेश्वरकृत राम शतक,कंब रामायण,रंगनाथ रामायण,ब्रह्मवैवर्तपुराण, पद्मपुराण,तोरवे रामायण,आनंद रामायण,रामचरित मानस आदि के अनुसार अहल्या वास्तव में शिला बन गई थी और राम उन्हें अपने चरण के स्पर्श से पुनर्जीवन प्रदान करते हैं।
‘गौतम नारि श्राप बस उपल देह धरि धीर।
चरण कमल रज चाहति कृपा करहु रघुवीर।।’
‘परसत पद पावन सोक नसावन प्रगट भई तपपुंज सही।
देखत रघुनायक जन सुखदायक सनमुख होई कर जोरि रही।।’
श्रीराम के चरण रज से कठोर शिला के नारी बन जाने का किस्सा सब ओर फैल चुका था।बाद में यही किस्सा केवट की दुविधा का कारण बना–
‘मांगी नाव न केवट आना।
कहत तुम्हार मरम मैं जाना।।
छुअत सिला भई नारि सुहाई।
पाहन ते न काठ कठिनाई।।’
उदार राघव के अनुसार राम के चरणस्पर्श से पत्थर को स्त्री बनती देखकर विश्वामित्र और दोनों राजकुमार विस्मित हो गए।इस पर अहल्या अपनी कथा सुनाती,राम-सीता के विवाह की भविष्यवाणी करती और विश्वामित्र से अनुरोध करती है कि वह राम लक्ष्मण को मिथिला ले जाएँ।गौतम अपनी पत्नी को स्वीकार करतेे हैं और वे दोनों भी विश्वामित्र के साथ जनक की राजधानी में जाते हैं।
पद्मपुराण के अनुसार गौतम ने शाप के अंत के विषय में अहल्या को आश्वासन दिया कि राम किसी दिन सीता और लक्ष्मण के साथ इस आश्रम में आएँगे और तुम्हें शुष्करूप प्रतिमा के रूप में देखकर वसिष्ठ से पूछेंगे कि यह मूर्ति क्या है। वसिष्ठ से सारी बात सुन कर राम तुम्हें निर्दोष घोषित करेंगे,तब तुम दिव्यरूप धारण कर मेरे पास आओगी।
रामभक्ति से ओत-प्रोत अध्यात्म रामायण के अनुसार अहल्या शिला पर खड़ी होकर तपस्या करती रही (तिष्ठ दुर्वृते शिलायामाश्रमे मम:)।राम ने उस आश्रय शिला का अपने चरण से स्पर्श किया और अहल्या को अपना विष्णुरूप दिखाया।अहल्या ने राम का विधिवत पूजन किया और उनकी स्तुति करते हुए भक्ति का वरदान मांगा।
अधिकांश रचनाओं के अनुसार राम ने मिथिला की यात्रा में अहल्या का उद्धार किया था।फिर भी अनेक रामकथाओं में राम के वनवास के समय इस घटना का वर्णन किया गया है।महानाटक में अगस्त्याश्रम से चले जाने के बाद राम अहिल्या का उद्धार करते हैं।रामलिंगामृत में राम सीता की खोज करते हुए शिलामयी अहल्या को शाप से मुक्त कर देते हैं।आनन्द रामायण में भी वनवास के समय इसका वर्णन किया गया है।
हमारा पुरुष-प्रधान समाज हमेशा से नारी के चरित्र पर ही संदेह करता और उनकी परीक्षा लेता आ रहा है,चाहे वे माता सीता हों या अहल्या।कहने को हम आज आधुनिक वैज्ञानिक युग में जी रहे हैं।किंतु,खेद का विषय है कि महिलाओं को लेकर आज भी समाज की सोच में बहुत अधिक परिवर्तन नहीं आया है।अन्यथा महिलाओं पर इतने अत्याचार नहीं हो रहे होते।

