सम्राट मिहिर भोज- जिन्होंने मुस्लिम आततायियों को रौंद दिया था.

सम्राट मिहिर भोज- जिन्होंने मुस्लिम आततायियों को रौंद दिया था.

राजा भोज का जिक्र आते ही हमारे मन में धार के परमार वंशीय राजा भोज की छवि उभरती है, जिन्होंने वर्ष 1000 से 1055 तक राज्य किया था।निश्चित ही वे बहुत बड़े विद्वान,अच्छे कवि, दार्शनिक और ज्योतिषशास्त्री थे।कहा जाता है कि उन्होंने धर्म,खगोल विद्या,कला,कोष रचना,भवन निर्माण,काव्य, औषध शास्त्र आदि विषयों पर ग्रंथ लिखे।वे बहुत बड़े निर्माता, वीर,प्रतापी और गुणग्राही व्यक्ति थे।

किन्तु,उनके भी लगभग दो सौ साल पहले एक और राजा भोज हो गए हैं जोकि अत्यंत शूरवीर,प्रबल पराक्रमी, प्रतापी, राजनीति निपुण,कूटनीतिज्ञ,उच्च संगठक,सुयोग्य प्रशासक,लोक कल्याण में संलग्न,महान धार्मिक और भारतीय संस्कृति के प्रति निष्ठावान शासक थे।इनका नाम था सम्राट मिहिर भोज,जिन्होंने सन् 835 से 885 तक राज्य किया।मध्यकाल के इतिहास में सम्राट भोज के शासन काल को अद्वितीय माना जाता है।इस अवधि में देश का चतुर्दिक विकास हुआ।साहित्य सृजन, शांति व्यवस्था, स्थापत्य, शिल्प, व्यापार और शासन प्रबंध की दृष्टि से यह श्रेष्ठतम माना गया।सिंहासन पर बैठते ही भोज ने कन्नौज राज्य की व्यवस्था को चाक-चौबंद किया।प्रजा पर अत्याचार करने वाले सामंतों और रिश्वतखोर कर्मचारियों को कठोरता से दंडित किया।व्यापार और कृषि कार्य को इतनी सुविधा दी गई कि सारा साम्राज्य धन-धान्य से सम्पन्न हो गया। उनका साम्राज्य पश्चिम में सिंधु नदी से पूर्व में बंगाल तक और उत्तर में कश्मीर से लेकर दक्षिण गोदावरी नदी के तट तक फैला हुआ था।

सम्राट मिहिर भोज का देश को सबसे बड़ा योगदान यह था कि उन्होंने बर्बर,धर्मान्ध,आततायी अरबों को बुरी तरह परास्त कर सनातन धर्म और संस्कृति की रक्षा की और उन्हें ऐसा सबक सिखाया कि अगले दो शताब्दियों तक भारत की ओर देखने की हिम्मत नहीं कर सके।

सम्राट मिहिर भोज शिव और विष्णु के परम भक्त थे। स्कंद पुराण के प्रभास खंड महात्म्य में लिखा है कि जिस प्रकार भगवान विष्णु ने वाराह रूप धारण कर हिरण्याक्ष आदि दुष्ट राक्षसों से पृथ्वी का उद्धार किया था,उसी प्रकार विष्णु के वंशज मिहिर भोज ने आततायी यवन और तुर्क राक्षसों को मार भगाया और भारत भूमि का संरक्षण किया।

अरब यात्री सुलेमान ने भारत भ्रमण के दौरान लिखी पुस्तक सिलसिलीउत तुआरीख 851 ईस्वीं में सम्राट मिहिरभोज को इस्लाम का सबसे बड़ा शत्रु बताया है, साथ ही मिहिरभोज प्रतिहार की महान सेना की तारीफ भी की।उसने लिखा है कि उनके राज्य में चोर-डाकुओं का बिल्कुल भी भय नहीं है। 915 ईस्वीं में भारत आए बगदाद के इतिहासकार अल- मसूदी ने अपनी किताब मरूजुल महान मेें भी मिहिरभोज प्रतिहार की 36 लाख सैनिकों की पराक्रमी सेना के बारे में लिखा है। इनकी राजशाही का निशान “वराह” था और मुस्लिम आक्रमणकारियों के मन में इतना भय था कि वे वराह नाम से नफरत करते थे। मिहिरभोज की सेना में सभी वर्ग एवं जातियों के लोगों ने राष्ट्र की रक्षा के लिए हथियार उठाये और इस्लामिक आक्रान्ताओं से लड़ाईयाँ लड़ी।

प्रतिहार सम्राट मिहिरभोज के मित्र काबुल का ललिया शाही राजा, कश्मीर का उत्पल वंशी राजा अवन्ति वर्मन तथा नेपाल का राजा राघवदेव और आसाम के राजा थे। सम्राट मिहिर भोज को साम्राज्य विस्तार के लिए कई देशी राजाओं से युद्ध करना पड़ा,जिनमें बंगाल के पाल वंशीय राजा,दक्षिण के राष्ट्रकूट राजा अमोघवर्ष आदि थे।इन्हें जीत कर इनके राज्यों को उन्होंने अपने साम्राज्य में मिला लिया था।किन्तु,उस समय उनके सबसे शत्रु थे अरब के खलीफा मौतसिम वासिक, मुत्वक्कल, मुन्तशिर, मौतमिदादी। अरब के खलीफा ने इमरान बिन मूसा को सिन्ध के उस भाग का शासक नियुक्त किया था,जिस पर उसने कब्जा कर लिया था।सम्राट भोज ने सिन्ध के अरब शासक इमरान बिन मूसा को पूरी तरह पराजित करके समस्त सिन्ध गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य का अंग बना लिया था। केवल मंसूरा और मुलतान दो स्थान अरबों के पास सिन्ध में इसलिए रह गए थे,क्योंकि अरबों ने सम्राट भोज के तूफानी और भयंकर आक्रमणों से बचने के लिए अनमहफूज नामक गुफाएं बनवाई हुई थी जिनमें छिप कर अरब अपनी जान बचाते थे।

सम्राट मिहिरभोज नहीं चाहते थे कि अरब इन दो स्थानों पर भी सुरक्षित रहें और आगे संकट का कारण बने।इसलिए उन्होंने कई बड़े सैनिक अभियान भेज कर इमरान बिन मूसा के अनमहफूज नामक जगह को जीत कर गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य की पश्चिमी सीमाएं सिन्ध नदी से सैंकड़ों मील पश्चिम तक पंहुचा दी और इसी प्रकार भारत देश को अगली शताब्दियों तक अरबों के बर्बर, धर्मान्ध तथा अत्याचारी आक्रमणों से सुरक्षित कर दिया था। इस तरह सम्राट मिहिरभोज के राज्य की सीमाएं काबुल से रांची व आसाम तक, हिमालय से आन्ध्र तक, काठियावाड़ से बंगाल तक सुदृढ़ तथा सुरक्षित थी।

मिहिर भोज ने अपनी विशाल, सुप्रशिक्षित और सुसज्जित सेना को चार भाग में बांट दिया था। उनमें से एक सेना कनकपाल परमार गुर्जर के नेतृत्व में गढ़वाल नेपाल के राघवदेव की तिब्बत के आक्रमणों से रक्षा करती थी। इसी प्रकार एक सेना अल्कान देव के नेतृत्व में पंजाब के वर्तमान गुर्जराज नगर के समीप नियुक्त थी जो काबुल के ललियाशाही राजाओं को तुर्किस्तान की तरफ से होने वाले आक्रमणों से रक्षा करती थी। इसकी पश्चिम की सेना मुलतान के मुसलमान शासक पर नियंत्रण करती थी। दक्षिण की सेना मानकि के राजा बल्हारा से तथा अन्य दो सेना दो दिशाओं में युद्धरत रहती थी।सम्राट मिहिरभेाज प्रतिहार इन चारों सेनाओं का संचालन, मार्गदर्शन तथा नियंत्रण स्वयं करते थे।अपने पूर्वज गुर्जर-प्रतिहार सम्राट नागभट् प्रतिहार प्रथम की तरह सम्राट मिहिरभोज ने अपने पूर्वजों की भांति स्थायी सेना खड़ी की जोकि अरब आक्रान्ताओं से टक्कर लेने के लिए आवश्यक थी।अगर नागभट् प्रतिहार प्रथम के बाद के अन्य सम्राटों ने भी स्थायी, प्रशिक्षित व कुशल तथा देश भक्त सेना न रखी होती तो भारत का इतिहास कुछ और ही होता और भारतीय संस्कृति व सभ्यता नाम की कोई चीज बची नहीं होती। जब अरब सेनाएं सिन्ध प्रान्त पर अधिकार करने व उसको मुस्लिम राष्ट्र में बदलने के बाद पूरे भारत को मुस्लिम राष्ट्र बनाने के लिए सेनापति मोहम्मद जुनेद के नेतृत्व में आगे बढ़ी, तो उन्हें सिन्ध से मिले गुर्जर प्रतिहारों द्वारा रक्षित प्रदेश को जीतना जरुरी था। जहाँ सम्राट भोज की सेना चट्टान की तरह अड़ी हुई थी।

एक तरफ अरब, सीरिया व ईराक आदि के बर्बर इस्लामिक सैनिक थे, जिनका मकसद पूरी दुनिया में इस्लामी हुकूमत कायम करना था और दूसरी तरफ महान हिन्दू-धर्म व संस्कृति के रक्षक गुर्जर-प्रतिहार सम्राट भोज थे,जो उनके परम शत्रु थे।अरबी धर्मांध योद्धा ’अल्लाह हूँ अकबर” के उद्घोष के साथ युद्ध में आते तो मिहिरभोज की सेना जय महादेव, जय विष्णु, जय महाकाल की ललकार के साथ टक्कर लेने और काटने को तैयार रहती थी। इस प्रकार के भयानक युद्ध अरबों व प्रतिहारों में निरन्तर चलते रहे।पर हिन्दू धर्म व संस्कृति के रक्षक वीरों ने हिम्मत नहीं हारी। मिहिरभोज के समय अरबों ने भारत में अपनी शक्ति बढ़ाने का खूब प्रयास किया लेकिन वीर हिन्दू सम्राट ने अरबों को कच्छ से भी निकाल भगाया जहाँ वे आगे बढ़ने लगे थे। इस प्रतापी सम्राट ने अपने बाहुबल से अरबों को सिन्ध से भी भगा दिया।

साहस,शौर्य,पराक्रम और वीरता के प्रतीक और संस्कृति के रक्षक सम्राट मिहिर भोज पचास वर्ष सफलतापूर्वक राज्य करने के बाद जीवन के अंतिम वर्षों में सनातन धर्म की सन्यास परम्परा के अनुसार अपने बेटे धर्मपाल को राजसिंहासन सौंप कर सन्यास वृति के लिए वन चले गए।समझा जाता है कि नर्मदा नदी के तट पर उनका देहान्त हुआ।

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