“सद्गुरु जग मंह परगटिया
मिटी धुंध जग चानन भया।”
जगत में जब कोई सद्गुरु अवतार लेते हैं, तब उनके लोकोत्तर प्रभाव से इस संसार की असहिष्णुता, वैमनस्य, दुर्भाव, दुष्प्रवृतियाँ आदि दुर्गुणों की धुंध मिट जाती है और सहिष्णुता, सद्भाव, सद्वृति, बंधुत्व, प्रेम, करुणा आदि दिव्य गुणों का प्रकाश चारों ओर व्याप्त हो जाता है। सद्गुरु की महिमा अपार है। परमात्मा को सद्गगुरु के माध्यम से ही जाना जा सकता है। गुरु वाक्य ही नाद है, गुरु वाक्य ही वेद है, क्योंकि गुरु की रसना में ही परमात्मा समाया हुआ है। गुरु ही शिव, ब्रह्म और पार्वती है।
“गुरुमुखी नाद, गुरुमुखि वेद, गुरुमुखि रहिया समाई। गुरु इसरु, गुरु गोरखु, बरमा गुरु, पारबती माई।”
— नानकवाणी
गुरु ही सीढ़ी है, गुरु ही नाव है, गुरु ही सरोवर है सागर है, जहाज है और सरिता है। गुरु के बिना बंधन नहीं छूटता, गुरु की कृपा से ही सहजावस्था का सुख प्राप्त होता है, गुरु के उपदेश से सुख मिलता है, गुरु के बिना ज्ञान प्राप्त नहीं होता, गुरु के समान अन्य कोई तीर्थ नहीं है।
ऐसे ही एक महिमाशाली सद्गुरु नानक देव थे, जिनका जन्म 15 अप्रेल, 1469 को लाहौर से तीस मील दक्षिण-पश्चिम सें स्थित तिलवंडी नाम के गाँव में हुआ था। यह गाँव आजकल नानकाना साहब के नाम से प्रसिद्ध है और सिक्खों का प्रसिद्ध तीर्थस्थल है। इनके माता का नाम तृप्तादेवी और पिता का नाम कालूचंद था। पिता गांव के पटवारी थे और कृषि भी करते थे। वे जाति के खत्री थे। गुरु नानक से बड़ी एक बहन थी, जिसका नाम नानकी था।
प्राय: सभी अवतारी पुरुष बचपन से ही असाधारण व्यवहार और विलक्षण बुद्धि वाले होते हैं। बालपन से ही उनके अलौकिक गुणों का परिचय मिलना शुरू हो जाता है। बालक नानक भी दिव्य गुणों से युक्त थे। वे अपना समय समवयस्कों के समान खेलकूद में न लगाकर चिंतन-मनन में लगाते थे। उनके मुखमंडल पर दिव्य आभा को देखकर और उनके स्पर्शमात्र से आनंद का अनुभव कर सबको आश्चर्य होता था। सात वर्ष की आयु में नानकदेव को पाठशाला भेजा गया। वैसे भी अध्यापक नानकदेव को ऐसा कुछ भी न पढ़ा सके, जो उन्हें न आता हो। प्रतीत होता है कि पाठशाला से दूर रहने के बाद भी गुरुदेव ने फारसी का अच्छा अध्ययन किया था।
गुरु नानक के पिता बालक की ‘अन्तर्मुखी प्रवृति’ को देखकर चिंतित रहने लगे। हर कामकाजी पिता की तरह उनका उद्देश्य भी पुत्र को सांसारिक कार्यकलाप में पटु बनाना था। किन्तु, गुरुदेव का मन सत्संग और हरिभजन में ही रमता था। बालक नानक की उदासीनता से चिंतित पिता ने उन्हें वैद्य को दिखलाया। वैद्य ने उन्हें पूरी तरह निरोगी घोषित किया। बढ़ती हुई विरक्ति को देखते हुए पिता ने वर्ष 1485 में गुरुनानक का विवाह बटाला निवासी भूला की कन्या ‘सुलक्षिणी’ से कर दिया। इनके गृहस्थ जीवन में दो पुत्र श्रीचंद और लक्ष्मीचंद हुए। श्रीचंद ने पिता का अनुगमन किया और उदासीन सम्प्रदाय का संस्थापक हुआ।
गुरुनानक जी के बहनोई जयराम सुल्तानपुर में नवाब दौलतखां के यहाँ नौकर थे। उन्होंने गुरुनानक को भी अपने पास बुला लिया और नवाब से कह-सुनकर
नौकरी लगवा दी। इन्हें मोदीखाना में तौल का काम सौंपा गया। इन्होंने अपनी बहन का मन रखने के लिए प्रेमपूर्वक तीन वर्ष तक नौकरी की। वे नौकरी द्वारा अर्जित अपना सारा धन साधु और निर्धनों को खिला देते थे। एक दिन एक साधु मोदीखाने में इनके पास आटा लेने आया। किन्तु, वे तेरा की संख्या पर अटक गए। सब कुछ तेरा ही तेरा, इस भाव से वे बार-बार तेरा-तेरा कह कर तौलने लगे। जब यह बात दौलतखां को मालूम हुई तब वह स्वयं जांच के लिए मोदीखाना आया। पर स्टाक में आटा कम होने के स्थान पर अधिक पाकर अत्यधिक आश्चर्यचकित और आनंदित हुआ।
जब गुरु सुल्तानपुर में थे तब ही उनका एक साथी मरदाना तिलवंडी में उनके पास आया और साथ ही रहने लगा। वह रवाब बजाने में निपुण था। मरदाना रवाब बजाता और गुरु नानक भजन गाते। धीरे-धीरे गुरुनानक के दिव्य संगीत की कीर्ति सर्वत्र फैलने लगी। लोग भजन और उपदेश सुनने के लिए एकत्र होने लगे। गुरुनानक ने संदेश देना प्रारंभ किया।
इसी बीच एक चमत्कार हुआ। एक बार वे स्नान करते समय नदी में अन्तर्धान हो गए। लोगों ने इनकी बहुत खोज की पर न मिले। अन्त में उन्हें मृत समझ कर सभी बहुत निराश हो गए। अचानक तीन दिन बाद वे वापिस आए। उन्होंने बताया कि इन तीन दिनों में वे ‘सच्चखंड’ में पहुँच गए थे। जहाँ परमात्मा ने उन्हें उपदेश दिया और अमृत पिलाया। साथ ही यह भी कहा कि मैंने तुम्हें आनंदित किया अब तुम्हारे सम्पर्क में आने वाले सभी आनंदित होंगे। जाओ, नाम स्मरण करो और दान दो। उपासना करो और लोगों को उपदेश दो। तब से गुरु नानक ने अकाल पुरुष अपरम्पार,परब्रह्म, परमेश्वर को अपना गुरु माना।
इस घटना के बाद गुरु नानक ने भ्रमण प्रारंभ किया। सिक्खधर्मावलम्बी उनके परिभ्रमण को उदासी कहते हैं। यात्रा में मरदाना भी उनके साथ रहता था। उन्होंने 1507 से 1511 सम्पूर्ण भारत में और बाहर भी भ्रमण किया। पहली उदासी में उन्होंने पूर्व देश की यात्रा की। यात्रा में हरिद्वार,मथुरा, अयोध्या, काशी, पटना, राजगिरी, बुद्धगया, आसाम, जगन्नाथपुरी, जबलपुर, कुरुक्षेत्र आदि स्थानों के दर्शन किए। इसी यात्रा में काशी में उन्होंने संत कबीर और रैदास से भी सत्संग किया। दूसरी उदासी दक्षिण की ओर प्रारंभ हुई। इसमें उन्होंने बीकानेर, जोधपुर, अजमेर, पुष्कर, उज्जैन, नागपुर, विदर्भ, केरल, पंडरपुर, तंजौर, तिरुचनापल्ली, रामेश्वरम् और लंका आदि का भ्रमण किया। तीसरी यात्रा में उन्होंने उत्तराखंड की यात्रा की और कांगड़ा, ज्वालामाई, कुल्लू, चम्पा, उत्तरकाशी, गोरखपुर, नेपाल, सिक्किम, भूटान, मिथिला, जनकपुर आदि स्थानों पर गए। चौथी उदासी में पश्चिमी देशों की यात्रा की और बहावलपुर, मक्का, मदीना, बगदाद,बल्ख, बुखारा, गोरखहटी, कंधार, एमनाबाद आदि स्थानों का भ्रमण किया।
देश-विदेश की यात्राओं में इन्होंने कई साधु, सन्यासियों, महात्माओं, विद्वानों, तत्वज्ञों से सत्संग किया। हर देश के आचार-व्यहार को इन्होंने निकट से देखा, समझा और जाना। इसीलिए उनका दृष्टिकोण इतना उदार और सर्वसमावेशी रहा। इस प्रकार समस्त भारत को उपदेशामृत पिलाने के पश्चात् उन्होंने अपना अंतिम समय कर्तारपुर में बिताया। वर्ष 1539 इसवीं में गुरु अंगद को गुरुगद्दी का भार सौंप कर गुरुदेव परमज्योति में लीन हो गए।
उनका व्यक्तित्व असाधारण, सरल और दिव्य था। वे सच्चे अर्थों में सद्गुरु थे। उन्होंने लोगों को अध्यात्म की ओर प्रवृत किया। लोगों के लिए उनके उपदेश बोधगम्य होते थे और सिद्धाँत सहज,सरल और अनुकरणीय होते थे। वे किसी वर्ग विशेष के ही नहीं,मानव मात्र के गुरु थे। वे जहाँ भी गए वहीं वे प्रेम, करुणा, भक्ति, सेवा, त्याग, वैराग्य आदि का उपदेश लेकर गए। वे एक महान उपदेशक और धर्म सुधारक थे। साथ ही वे अपूर्व योगी और गृहस्थ संत भी थे। उनमें परदु:खकातरता की भावना गहरे में समाई थी इसलिए वे मानवमात्र को दुष्प्रवृतियों से उपर उठाकर समान रुप से सन्मार्ग पर लाना चाहते थे। उनके लिए हर व्यक्ति समान था। उनके मन किसी के लिए भी ऊँच-नीच की कोई भावना नहीं थी। वे एक महान कवि, संगीतज्ञ, दार्शनिक और विश्वबंधुत्व की उदात्त भाव से परिपूर्ण थे।
वस्तुत: गुरुनानक जैसी विभूतियाँ संसार में कभी-कभी ही अवतरित होती है। जो संसार को शांति, सहिष्णुता और प्रेम का संदेश देकर सन्मार्ग की ओर प्रवृत करती हैं।

