1.13 एक पत्नीव्रतधारी राम

1.13 एक पत्नीव्रतधारी राम

समाज की सबसे छोटी इकाई, परिवार का निर्माण,पालन और उत्थान की आधारशिला ‘एक पत्नीव्रत’ के पालन पर ही टिकी हुई है।यही आदर्श स्थिति है।प्राचीनकाल से ही भारतीय समाज इस आदर्श पर चलता रहा है।किन्तु,तब बहुविवाह निषिद्ध भी नहीं था और राजन्यवर्ग में बहुविवाह सामान्य बात समझी जाती थी।क्योंकि, युद्ध-संधियों, समझौतों के कारण बहुविवाह तब अक्सर राजनैतिक जरूरत बन जाती थी।पर,सभी राजा ऐसा करते हों,ऐसा भी नहीं था।तब भी नल-दमयंती,हरीशचन्द्र-तारामती एक पत्नीव्रत के आदर्श उदाहरण थे।श्रीराम ने अपनी चारीत्रिक दृढ़ता का परिचय देते हुए इसी आदर्श को अपनाया।यद्यपि,वे ऐसा नहीं भी करते तो भी उन्हें कोई दोष नहीं देता।क्योंकि उनकी स्वयं की तीन माताएँ थीं।किन्तु,वे चाहते थे कि मात्र उपदेश देकर नहीं,अपितु स्वयं के आचरण के द्वारा जीवन के हर क्षेत्र में वे मर्यादाएँ स्थापित करें।ताकि,समाज में सर्वोत्कृष्ट नैतिकतापूर्ण आचरण की स्थापना हो सके। इसीलिए तो वे मर्यादा-पुरुषोत्तम कहलाए।

माना जाता है कि राजा दशरथ की तीन रानियाँ थीं फिर भी उनकी पत्नियों की संख्या को लेकर सारे ग्रंथ एकमत भी नहीं है।वाल्मीकि रामायण और बाद की अधिकांश रामकथाओं में दशरथ की तीन पटरानियां ही मानी गईं हैं।पर वाल्मीकि रामायण के अनुसार ही राम ने वन में प्रस्थान करते समय अपनी ३५० माताओं से विदा ली थी।पउमचरियं में दशरथ की पांच सौ,आनंद रामायण में ७०३,कृतिवास रामायण और सारलादास के महाभारत में दशरथ की ७५० स्त्रियां मानी गईं हैं।असमिया बालकाण्ड में इनकी संख्या सात सौ है।जबकि,दशरथ जातक में दशरथ की सोलह हजार स्त्रियों की चर्चा है।

वाल्मीकि ने राम को ‘सत्यपराक्रम’, आज्ञाकारी पुत्र और ‘स्वदारनिरत’ पति के रूप में चित्रित किया है।बाद की रामकथाओं में राम को प्राय: ‘एकपत्नीव्रत’ ही माना गया है।आदिकाव्य के एक स्थल पर राम के ‘एक पत्नीव्रत’ की प्रशंसा की गई है।राम के साथ वन जाने के लिए अनुरोध करती सीता यह तर्क देेती है कि धर्म-विधि के अनुसार विवाह होने पर स्त्री परलोक में भी अपने पति की होकर रहती है:

‘इहलोके च पितृर्भिया स्त्री यस्य महाबल।

आदि्भर्दत्ता स्वधर्मेण प्रेत्यभावेअपि तस्य सा।।

मानस में इस भाव को कुछ इस तरह से वर्णित किया गया है:

‘जँह लगि नाथ नेह अरु नाते।

पिय बिनु तियहि तरनिहु ते ताते।।

तनु धनु धामु धरनि पुर राजू।

पति विहीन सब सोक समाजू।।

सीता राम को ‘स्वदारनिरत’ और अपने प्रति ‘स्थिरानुराग’ मानती हैं और यह विश्वास भी प्रकट करती हैं कि राम का प्रेम कभी नष्ट नहीं हो सकता।यहाँ तक कि जिस माता कैकेयी ने राम को वनवास दिया था,वह भी भरत के यह आशंका प्रकट करने पर कि-‘कच्चिन्न परदारान्वा राजपुत्रोअभिमन्यते’ कहती हैं कि-‘न राम: परदारांश्च चक्षुर्भ्यामपि पश्यति।’

भागवत पुराण में राम के विषय में लिखा है- ‘एकपत्नीव्रतधारो राजर्षिचरित: शुचि:।आनंद रामायण में राम स्वयं कहते हैं कि सीता को छोड़ सभी नारियाँ उनके लिए कौशल्या के समान ही हैं।

‘अन्यत्सीतां विनाअन्या स्त्री कौशल्या सदृशी मम।

न क्रियते परा पत्नी मनसाअपि च चिंतये।।’

आदिकाव्य में राम के इस चरित्र-चित्रण के आधार पर उत्तरकाण्ड के रचनाकारों ने यह माना कि सीता-त्याग के बाद राम ने दूसरा विवाह नहीं किया।यहाँ तक कि सीता जी के भूमि-प्रवेश के बाद यज्ञ में उनकी स्वर्णमूर्ति बनवाकर यज्ञ सम्पन्न किए गए।

‘न सीताया: परां भार्यां वद्रे स रघुनंदन:।

यज्ञे यज्ञे च पत्न्यर्थं जानकी कांचनीभवत्।।

रघुवंश से लेकर बाद की रामकथाओं में भी इस स्वर्णमयी सीता का उल्लेख है।

राम और सीता के बीच अनन्य प्रेम था।दोनों एक दूसरे का विछोह सह नहीं सकते थे।वन में सीता के हरण से राम गहन शोक में डूब गए थे और व्याकुल होकर सीता के गुणों का वर्णन करते हुए लता-पत्रों,खग-मृग से जानकी का पता पूछने लगे थे:

‘हा गुन खानि जानकी सीता।

रूप सील ब्रत नेम पुनीता।।

हे खग-मृग हे मधुकर श्रेनी।

तुम्ह देखी सीता मृगनैनी।।

लंकादहन के बाद लौटे हनुमान जी से सीता की खबर सुनकर भी: ‘सुनि सीता दुख प्रभु सुख अयना।भरि आए दल राजिव नयना।।’

मानस के अनुसार रामराज्य में श्रीराम का अनुकरण करते हुए उनके न केवल सभी भाई,अपितु सारे पुर-वासी भी एक पत्नीव्रत का पालन करते थे:

एक नारि ब्रत रत सब झारी।

हालांकि तब जनसंख्या वृद्धि कोई समस्या नहीं थी,तब भी राम सहित चारों भाईयों ने ‘हम दो-हमारे दो’ का आदर्श प्रस्तुत किया और सभी भाईयों के यहाँ दो-दो पुत्र उत्पन्न हुए।

‘दुइ सुत सुंदर सीता जाए।

लव कुस बेद पुरानन्ह गाए।।

दुइ दुइ सुत सब भ्रातन्ह केरे।

भए रूप गुन सील घनेरे।।’

यद्यपि, हिंदू समाज ‘एक पत्नीव्रत’ का पालन स्वयमेव करता रहा है।तथापि,’हिन्दु विवाह अधिनियम’ बन जाने के बाद इसका पालन अनिवार्य हो गया है।इस कानून के अनुसार पहली पत्नी के जीवित रहते,उससे बिना तलाक लिए,दूसरा विवाह करने पर सात वर्ष के जेल की सजा का प्रावधान है।अन्य धर्मों में भी जो पढ़ा-लिखा समझदार तपका है,वह एक पत्नी की धारणा को पसंद करता है।किन्तु,देश की बेलगाम बढ़ती आबादी और उससे होने वाले तमाम सामाजार्थिक समस्याओं को देखते हुए ये मसला ऐसा नहीं लगता है कि इसे केवल लोगों की इच्छा और विवेक पर छोड़ा जाए।इसलिए जरूरी हो गया है कि ‘हम दो-हमारे दो’ के फार्मूले को अब देश में अनिवार्यरूप से लागू किया जाए।

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