8.7 किनके पुत्र थे हनुमान्

8.7 किनके पुत्र थे हनुमान्

प्रभु राम ने जिस भी कल्प में जिस भी कारण से जन्म लिया हो,हर जन्म में उनके माता-पिता कौशल्या और दशरथ ही रहे। किन्तु,उनके परम् भक्त और अनन्य सेवक हनुमान् किनके पुत्र थे,यह कुछ निश्चित नहीं है और इस सम्बंध में अनेक कथाएँ प्रचलित हैं। गोस्वामी तुलसीदास ने भी ‘हनुमान् चालीसा’ में उन्हें अंजनि-पुत्र,पवनसुत, शंकर सुवन,केसरी नंदन जैसेे नाम से पुकारा है। वे भी यह तय नहीं कर पाए कि वास्तव में हनुमान् जी के जनक थे कौन?

वाल्मीकीय रामायण की कथावस्तु में हनुमान् का स्थान अपेक्षाकृत महत्वपूर्ण है। वे राम-लक्ष्मण को सुग्रीव के पास ले जाते हैं, वर्षाऋतु के बाद सुग्रीव को राम के प्रति उसके कर्तव्य की याद दिलाते हैं, राम की अँगूठी लेकर सीता जी की खोज में वानरों के दल के साथ दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थान करते हैं, समुद्र लांघ कर सीता का पता लगाते हैं और उनका संदेश लेकर राम के पास लौटते हैं। वे राम-रावण युद्ध में भी प्रमुखता से भाग लेते हैं। रावण वध के बाद वे ही सीता के पास और बाद में भरत के पास राम-विजय का संदेश ले जाते हैं। इसके अतिरिक्त हनुमान् के दो कृत्य भी बहुत प्रसिद्ध है,एक है लंकादहन और दूसरा हिमालय से औषधि पर्वत को ले आना।

हनुमच्चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता उनकी जन्मकथा के विविध रूपों का बाहुल्य है। रामायणीय कथा जिसके अनुसार हनुमान् अंजनी के पुत्र हैं, निर्विवाद रूप से मान्य है। किन्तु, उनके जनक के रूप में किसके नाम की मान्यता अधिक है और क्यों, यह कथा भी रोचक और जानने योग्य है। आइए,इनका सिंहावलोकन भी किया जाए।

वायुपुत्र- वाल्मीकि रामायण में हनुमान् को वायुपुत्र अथवा इसके पर्यायवाची शब्द की उपाधि दी जाती है। वायुपुत्र नाम की उत्पत्ति के संबंध में एक धारणा यह भी है कि पहले ही ‘वायुपुत्र’ एक निश्चित अर्थ में प्रचलित था। ‘सुमग्गा’ जातक में एक ‘वायुस्स पुत्त’ अर्थात् विद्याधर की कथा मिलती है। इसमें न हनुमान् का उल्लेख है न किसी अन्य वानर का। यह विद्याधर ‘ऐन्द्रजालिक है। महाभारत में भी ‘वातिक’ इससे मिलता-जुलता अर्थ रखता है। रामायण में हनुमान् समुद्र लांघते हैं,सीता का पता लगाते हैं और अन्य वानरों की अपेक्षा बुद्धिमान और कार्यकुशल माने जाते हैं। इसलिए कुछ विद्वानों का अनुमान है कि अद्भुत रस से परिपूर्ण उनके इस चरित्र-चित्रण के कारण संभवत: उनको ‘वायुपुत्र’ (अर्थात् विद्याधर, ऐन्द्रजालिक) की उपाधि मिल गई होगी। बाद में ‘वायुपुत्र’ नाम के आधार पर प्रचलित जन्मकथा विकसित हुई होगी, जिसके अनुसार वायु ने किसी शाप-भ्रष्टा अप्सरा से हनुमान् को उत्पन्न किया है।

आंजनेय (अंजनी-पुत्र) प्रचलित रामायण के किष्किंधाकांड के अनुसार ‘पुंजिकस्थला’ नामक अप्सरा को शापवश वानर-योनि प्राप्त हुई थी। वह कुंजर की पुत्री अंजना के रूप में प्रकट होकर केसरी की पत्नी बन गई। कामरूपिणी होने के कारण उसने किसी दिन रूप-यौवन-सम्पन्न-सम्पन्न मानव शरीर धारण कर लिया। मारुत ने उसे इस रूप में देखा और उस पर आसक्त होकर आलिंगन किया। अंजना के आपत्ति करने पर मारुत ने उसको एक वीर्यवान, बुद्धसम्पन्न पुत्र को उत्पन्न करने का वरदान दिया, जिसकी गति वायु के समान होगी:

‘ मनसास्मि गतो यत्वां परिष्वज्य यशस्वनि।

वीर्यवान् बुद्धसम्पन्नस्तव पुत्रो भविष्यति।।

महासत्वो महातेजा महाबलपराक्रम:।

लंघने प्लवेन चैव भविष्यति मया सम:।।

इस वरदान के फलस्वरूप अंजना गर्भवती हुई और उसने गुफा में हनुमान् को जन्म दिया। उदयमान् सूर्य को देखकर और उसे फल समझकर शिशु उसे पकड़ने के लिए आकाश में कूद पड़ा। इन्द्र ने उसे वज्र से मारा तथा पर्वत पर गिरने के कारण शिशु की बाई ठोड़ी (हनु) टूट गई। इससे उसका नाम हनुमान् पड़ा:

तथा शैलाग्रशिखरे वामो हनुरभज्यत।

ततोभिनामधेयं ते हनुमानिति कीर्तितम्।।

अपने पुत्र की यह दशा देख वायु ने क्रोध में आकर अपनी गति बंद कर दी,जिससे समस्त प्राणी अत्यंत व्याकुल हुए और देवता आकर वायु को मनाने लगे। ब्रह्मा ने हनुमान् को ‘अशस्त्र-वध्यता’ का तथा इन्द्र ने इच्छानुसार मरण का वरदान दिया।

यही कथा प्रकारान्तर से युद्धकांड में और थोड़े विस्तृत रूप में उत्तरकांड में आई है।

हनुमान् के बाल-चरित का कुछ चित्रण ब्रह्मपुराण,स्कंद पुराण,भविष्य पुराण, आनंद रामायण आदि में हुआ है।

केसरीनंदन- हनुमान् की जन्मकथा में केसरी का हनुमान् के पिता के रूप में कहीं-कहीं ही उल्लेख हुआ है। सीता-हनुमान्-संवाद में हनुमान् सीता से कहते हैं कि मैं केसरी की पत्नी से उत्पन्न हनुमान् हूँ:

माल्यवान्नाम वैदेहि गिरीणामुत्तमो गिरि:।

ततो गच्छति गोकर्ण पर्वतं केसरी हरि:।।

प्रचलित वा.रामायण में केसरी का नाम भी बहुत कम मिलता है। किष्किंधा या सुंदरकांड में कहीं भी केसरी का नाम नहीं आया है। जबकि इन कांडों में चार बार वानर प्रमुखों की लम्बी-लम्बी सूची दी गई है, किन्तु, उनमें भी केसरी का नाम नहीं है। केवल युद्धकांड में एक स्थान पर केसरी को वानर मुख्य की उपाधि मिल पाई है— मुख्यो वानरमुख्यानां केसरी नाम यूथप:।

रुद्रावतार:(शंकरसुवन) अनेक शैव पुराणों में और बहुत सी बाद की कथाओं में हनुमान् को शिव का अवतार माना गया है। स्कंदपुराण के अवन्तिखंड में हनुमान् को ‘रुद्रांश’ कहा गया है। महाभागवतपुराण के अनुसार, जिस समय विष्णु रावण के नाश के लिए अवतार लेने की प्रतिज्ञा करते हैं,उस समय शिव ने विष्णु से कहा था कि मैं वायु का पुत्र बनकर वानर के रूप में तुम्हारी सहायता करूँगा। (अहं वानररूपेणसंभूय पवनात्मज: सहाय्यं ते करिष्यामि।) वृहद्धर्मपुराण, ब्रह्मवैवर्तपुराण आदि में भी ऐसा ही उल्लेख है। महानाटक में रावण यह देखकर रुद्रावतार हनुमान् द्वारा लंका जलाई जा रही है, कहता है—“मैंने अपने दस सिर चढ़ाकर दस रुद्रों को प्रसन्न किया था,किन्तु यह ग्याहरवें रुद्र के अवतार हैं।

कृतिवासीय रामायण के अनुसार सीता रामाभिषेक के बाद हनुमान् जी को भोजन परोसती थीं। हनुमान् जी को भोजन से तृप्त करने में स्वयं को असमर्थ पाकर वह आश्चर्यचकित हुईं तथा ध्यान लगाकर समझ गईं कि हनुमान् शिव के अवतार हैं। फिर उन्होंने शिव की वन्दना की,जिससे हनुमान् जी तृप्त हो सके।

विष्णु के अंशावतार: आनन्द रामायण में एक सुवर्चला नामक अप्सरा की कथा मिलती है। नृत्यदोष के कारण ब्रह्मा ने उसे गृध्री बन जाने का शाप दिया था साथ ही उसे शापमुक्ति का यह उपाय भी बताया था कि कैकेयी का पायस अंजनी पर्वत पर फेंकने से वह फिर अप्सरा बन जाएगी। समय आने पर गृध्री ने कैकेयी के हाथ से पायस छीन लिया और उसे अंजनी पर्वत पर फेंक दिया और फिर वह निज स्वरूप प्राप्त कर स्वर्ग चली गई। केसरी की पत्नी अंजनी ने गृध्री के मुंह से गिरा हुआ पायस तो खाया किन्तु उसने वायु के साथ रमण भी किया। मराठी भावार्थ रामायण में भी ऐसी ही कथा है। इस तरह पायस पाकर राम की अन्य माताओं जैसी अंजनी भी गर्भवती हो गई और विष्णु के अंशावतार हनुमान् को जन्म दिया।

प्रचलित रामायण की कथा ‘वायुपुत्र’ के नाम पर ही आधारित है, इसके अनुसार हनुमान् वास्तव में वायु देवता के पुत्र हैं और केसरी की पत्नी अंजना से जन्म लेते हैं। हनुमान् के जन्म की यह कथा सबसे प्राचीन,व्यापक और अन्य कथाओं का मूल स्त्रोत है। ऐसा माना जाता है कि आठवीं से दसवीं शती के बीच हनुमान् रुद्र के अवतार माने जाने लगे थे। यद्यपि मूल रामकथा में शिव सम्मिलित नहीं थे किन्तु रामायण की बढ़ती लोकप्रियता को देखकर शैवों ने सुंदरकांड के नायक हनुमान् को अपना लिया और उन्हें रुद्र का अवतार बना लिया। आगे चल कर रुद्रावतार हनुमान् की अन्य जन्मकथाओं की कल्पना कर ली गई। कुछ नई जन्मकथाओं में हनुमान् का संबंध दशरथ यज्ञ के पायस से जोड़ दिया गया। किन्तु,यह कथा अधिक प्रचलित नहीं है।इन सभी कथाओं हनुमान् जी की माता अंजना (अंजनी) ही है और वायु उनकी उत्पत्ति में सहायक माने जाते हैं।

लौकिक दृष्टि से भले ही उन्हें किसी की भी पुत्र बताया जाए पर सही तो यह है कि जनमानस उन्हें सर्वकालिक,सार्वभौमिक और सर्वव्याप्त् देवता मानता है, जो उसे सच्ची श्रद्धा से पुकारने पर सभी प्रकार के संकटों से उबारता है। जनमानस को इससे बड़ा सहारा और क्या चाहिए। इसीलिए हनुमान् जी हमारे यहाँ हर गली-गली, गाँव-गाँव में (रक्षा का आश्वासन देते से) विराजित मिल जाते हैं।

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