8.21 कृष्ण से राधा के प्रेम की कल्पना कहाँ से आई

8.21 कृष्ण से राधा के प्रेम की कल्पना कहाँ से आई

निष्काम,निर्विकार और पवित्र प्रेम को यदि किसी नाम से पहचाना जा सकता है तो वह है ‘राधा-कृष्ण।’माना जाता है कि राधा श्रीकृष्ण की आह्लादिनी शक्ति हैं और दोनों एक दूसरे के पूरक हैं।भक्तों का मानना है कि ब्रजमंड़ल के कण-कण में राधा-कृष्ण समाए हुए हैं।वास्तविकता तो यह है कि वहाँ राधा नाम की ही प्रधानता है।ब्रजमंड़ल का कोना-कोना राधा के नाम से सदा गुंजायमान रहता है।ऐसा लगता मानों कृष्ण और राधा इस प्रकार एकाकार हो गए हैं कि कृष्ण को याद करने के लिए राधा का नाम लेना ही पर्याप्त है।वृन्दावन के हर मंदिर में श्रीकृष्ण के साथ राधिका जी भी विराजमान नजर आती हैं।

किन्तु,जब भावनाओं से हटकर हम प्राचीन तथ्यों पर नजर ड़ालते हैं,तब कहानी थोड़ी अलग मिलती है।विद्वानों का कथन है कि प्राचीनतम भारतीय साहित्य और शिल्प में श्रीकृष्ण की श्रृंगार-लीलाओं का कोई प्रमाण नहीं मिलता।इस विषय की विशद विवेचना करते हुए पं.हजारी प्रसाद द्विवेदी ने अपनी पुस्तक ‘मध्यकालीन धर्म-साधना’ में लिखा है कि “श्री कृष्णावतार के मुख्य दो रूप हैं।एक वे यदुकुल के श्रेष्ठ रत्न हैं,वीर हैं,राजा हैं,कंसारी हैं।दूसरे में वे गोपाल हैं,गोपी-जन-वल्लभ हैं,’राधाधर-सुधापान-शालि-वनमालि’हैं।प्रथम रूप का पता हमें बहुत से पुराने ग्रंथों से चल जाता है।पर,दूसरा रूप अपेक्षाकृत नवीन है।धीरे-धीरे वह दूसरा नवीन रूप ही प्रधान हो गया और पहला गौण।

वैष्णवों के तीन प्रसिद्ध पुराण हरिवंश,विष्णुपुराण और भागवत हैं।किन्तु,विद्वानों के अनुसार इनमें किसी में भी राधा के नाम का उल्लेख नहीं है।भागवत में कथा आई है कि कृष्ण ने सभी गोपियों को छोड़कर एक गोपी से अलग से भेंट की।बस,लगता है कि भक्तों की कल्पना ने इसी बात को आधार बनाकर उस गोपी को राधा का नाम दे दिया।पंड़ितों का यह भी विचार है कि कृष्ण-चरित के साथ बाल-लीला की कथा पहले से ही थी।पर,राधा तथा अन्य गोपियों के साथ उनकी प्रेम-लीला की कहानियाँ बहुत बाद में आई हैं।

राधा का नाम कैसे चला,यह गहरे विवाद का विषय है।भागवत सम्प्रदाय और माध्व संप्रदाय राधा को नहीं मानते हैं।असम में भी वैष्णवों के बीच राधा की पूजा का चलन नहीं है।अपनी उक्त पुस्तक में पंड़ित हजारी प्रसाद द्विवेदी यह भी लिखते हैं कि प्रेम-विलास और भक्ति-रत्नाकर के अनुसार, “नित्यानंद प्रभु की छोटी पत्नी जाह्नवी देवी जब वृन्दावन गईं,तो उन्हें यह देखकर दु:ख हुआ कि श्रीकृष्ण के साथ राधा नाम की मूर्ति की कहीं पूजा नहीं होती थी।घर लौटकर उन्होंने नयनभास्कर नाम के कलाकार से राधा की मूर्तियाँ बनवाईं और उन्हें वृन्दावन भिजवाया।जीव गोस्वामी की आज्ञा से ये मूर्तियाँ श्रीकृष्ण के पार्श्व में रखी गईं और तब से श्रीकृष्ण के साथ राधिका की पूजा भी होने लगी।

एक मत यह भी है कि आर्यों के वैष्णव धर्म में कृष्ण की बाल-लीला और राधा से उनके प्रेम की कल्पना किसी आर्येत्तर जाति से आई हो।इस संबंध में एक सोच यह भी है कि बाल-लीला की कल्पना आभीर-जाति के किसी बाल-देवता से मिली है और राधा भी,सम्भवत:,दक्षिण के किसी आर्येत्तर समाज की कोई प्रेम की देवी रही होंगी।कालक्रम से ये दोनों कथाएँ वासुदेव धर्म से आ मिलीं और धीरे-धीरे,कृष्ण का वह रूप हो गया,जो आज हम देखते हैं।इस धारणा को एक समर्थन तो इस बात से भी मिलता है कि राधावाद के प्रचारक निम्बार्क महाराज दक्षिण के ही थे और उत्तर भारत में फैलने के पहले कृष्ण भक्ति के सिलसिले में राधा-भक्ति का भी प्रचार दक्षिण में ही हुआ,जिसके प्रचारक आलवार संत थे।दक्षिण की भक्तन ‘आण्ड़ाल’ अपने आप को राधा ही मानती थीं।कथा यह भी है कि इनका सायुज्य भी विष्णुरूपी श्रीकृष्ण के विग्रह में हुआ था।

अस्तु,राधा जी की कथा कहीं भी अवतरित हुई हो,आज वे भागवत धर्म की अनन्य नायिका हैं और श्रीकृष्ण की सहचरी भी।अब लोगों की श्रद्धा-भक्ति उन्हें श्रीकृष्ण से अलग नहीं देखती।

No photo description available.
Back To Top