आमतौर पर हम सब ऐसा मानते हैं कि आदिवासी ही यहाँ के मूल निवासी हैं। आजकल आदिवासी खेती-बाड़ी से गुजारा करते हैं। घरों के छोटे-छोटे समूह बना रहते हैं। पशुओं का पालन करते हैंं। मिट्टी के बरतन वापरते हैं। पर अब शहरी समाज के सम्पर्क में आते रहने के कारण उनकी जीवनशैली, उनकी सोच और उनके कामकाज के तरीकों में बहुत अंतर आ गया है। किन्तु, पहले वे पूरी तरह प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर थे। भोजन के लिए वे पशुओं के शिकार करते थे। साथ ही कंद, फल-फूल, शहद आदि उनके भोजन में प्रयुक्त होने वाली वस्तुएँ थीं।
किन्तु, जब अंग्रेज भारत आए तब उन्होंने आदिवासियों को भी यहाँ के मूल निवासी मानने से इंकार कर दिया। उन्होंने प्रजाति का सिद्धांत (रेस थ्योरी) प्रस्तुत की। जो कि भारतीयों के लिए नई और चौंकाने वाली थी। जिसके अनुसार कोई भी प्रजाति भारत मूल की नहीं है। यहाँ तक कि आदिवासी भी नहीं। सभी बाहर से आए हैं। हो सकता है कि अपने आने का औचित्य सिद्ध करने के लिए भी वे यह सिद्धांत लाए हों। पर जो भी हो, यह सही है कि यहाँ नीग्रो, औष्ट्रिक,द्रविड़, आर्य, यूनानी, यूची,शक, आभीर, हूण, मंगोल और तुर्क (मुस्लिम आक्रमण के पहले) ये सभी समूहों में इस देश में आए और कालांतर में हिंदू समाज में दाखिल होकर उसके अंग हो गए। पर जहाँ तक आदिवासी समाज की बात है,मोटे तौर पर यह माना जाता है कि वह औष्ट्रिक (आग्नेय) जाति का विस्तार है। जिसमें मुंड़ या शबर और भील जातियाँ शामिल हैं।
अटकल और अनुमान के अनुसार यह समझा जाता है कि भारत में पहला आगमन नीग्रो जाति का था। यह जाति भारत में अरब-ईरान के किनारे-किनारे चलकर पश्चिम में अथवा अफ्रीका से आई थी। इसकी एक शाखा भारत से निकलकर आस्ट्रेलिया भी गई थी, जहाँ उसके वंशज अब तक मौजूद हैं। भारत से आस्ट्रेलिया जाते हुए रास्ते में इंडोनेशिया, पोलीनेशिया और मलेनेशिया भी इस जाति की टुकड़ियाँ रह गईं। मलाया, फिलीपाइन, न्यूगिनी और अंडमन में भी जो नीग्रो हैं, वे भारत से गए हुए ही हैं। किन्तु, भारत में नीग्रो लगभग समाप्त ही हो गए हैं। अनुमान यह है कि या तो वे अपने पीछे आने वाले आग्नेय लोगों द्वारा मार डाले गए अथवा उनमें मिलकर एक हो गए। नीग्रो लोग सभ्यता के आदि सोपान पर थे। नीग्रो लोगों का काल विद्वान आज से सात से दस हजार वर्ष पूर्व तक मानते हैं।
औष्ट्रिक या आग्नेय जाति के बारे में सामान्यत: यह समझा जाता है कि देश में आदिवासियों की जनसंख्या का बड़ा भाग इन्हीं जातियों का है। इनका औष्ट्रिक या आग्नेय नाम इसलिए पड़ा कि ये लोग योरोप के अग्निकोण में पाए जाते हैं। इस वंश के लोग मेडागास्कर और विंध्य मेखला से लेकर प्रशांत महासागर के ईस्टर द्वीप तक फैले हुए हैं। इनका आगमन नीग्रो जाति के बाद हुआ और इस जाति के लोग भारत से होकर कई बार गुजरे थे। भारत में कोल और मुंडा जाति के लोग, असम, म्यामार और हिंदचीन की मौन-खमेर जाति, निकोबार द्वीप के निकोबरी, इंडोनेशिया, मलेनेशिया और पोलीनेशिया के लोग इसी औष्ट्रिक वंश की मिश्रित संताने हैं।
कहा जाता है जब आर्य आए, आग्नेय लोग सिंधु की तराई में भी विद्यमान थे। आर्यों ने उन्हीं का नाम निषाद रखा और उनके काले रंग व चपटी नाक की हंसी भी उड़ाई। निषाद-वंश के अन्य नाम कोल, गोंड और भील भी मिलते हैं। पंद्रह सौ वर्ष पूर्व ही उत्तर भारत के बहुत से आग्नेय लोग आर्य हो गए, फिर भी, बौद्धकाल में भी चांड़ालों की बस्ती और स्वतंत्र भाषा के प्रमाण मिलते हैं। अब तो केवल कोल और मुंडा जाति की भाषा ही ऐसी भाषा है, जो औष्ट्रिक परिवार की समझी जाति है। किन्तु, जब आर्य भारत आए थे, तब औष्ट्रिक भाषा देश में खूब प्रचलित थी और उस भाषा के अनेक शब्दों ने आर्य भाषा संग्रह में भी प्रवेश पा लिया। विशेषकर वन और वनजन्तु सम्बन्धी ऐसे कितने ही शब्द हैं, जिनका मूल औष्ट्रिक भाषा का है।
इन चार हजार वर्षों के मिश्रण और समन्वयन के बाद भी, हमारे देश में जो आदिवासी जातियाँ हैं, संभावना यही है कि वे आग्नेय वंश की हैं। केवल वनवासी ही नहीं, गाँवों के पास रहने वाली अनेक निम्न जाति के लोगों का विशाल समुदाय है (जैसे, डोम, भुइयाँ, मुसहर) आदि, जो औष्ट्रिक भंडार से आया हुआ है। रक्त-मिश्रण के कारण इनके रंग-रूप और कद-काठी बिल्कुल बदल गई है और उनमें से प्राय: सबने अपने मालिकों की भाषा सीख ली है अथवा कंजरों के समान कुछ घुमक्कड़ जातियाँ हैं, जिनकी भाषा में अनेक भाषाओं का मिश्रित रूप है।
