अशोक वाटिका की बात चलते ही हमें लंका की अशोक वाटिका का स्मरण हो आता है, जो स्वाभाविक ही है। क्योंकि, इस अशोकवाटिका के अतिरिक्त किसी और अशोक वाटिका के बारे में कभी सुना ही नहीं गया। इसी वाटिका में महाबली रावण ने अपहरण के बाद माता सीता को कैद में रखा था, जहाँ उन्हें लगभग डेढ़ वर्ष की अवधि बितानी पड़ी थी। यद्यपि यह उद्यान अत्यंत विशाल, मनोरम, आश्चर्यजनक शिल्प रचनाओं से युक्त था। उसमें आमोद-प्रमोद के साधनों की भी कोई कमी नहीं थी। फिर भी यह माता सीता के विरह-जनित शोक को कम करने में तनिक भी सहायक नहीं हुआ।
कैसी थी लंका की अशोक वाटिका–
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माता सीता की खोज में जब हनुमान् अशोक वाटिका पहुँचे उन्होंने देखा कि वह सोने और चांदी के समान वर्ण वाले वृक्षों से सब ओर से घिरी हुई थी। उसमें विविध प्रकार के पक्षी कलरव कर रहे थे,जिससे वह सारी वाटिका गूँज रही थी। तरह-तरह के मृग समूहों से उसकी विचित्र शोभा हो रही थी।
उस वाटिका में उन्होंने जहाँ-तहाँ विभिन्न प्रकार की बावड़ियाँ देखीं, जो उत्तम जल से भरी हुई और मणिमय सोपानों से युक्त थीं। उनके भीतर मोती और मूंगों की बालुकाएँ थीं। जल के नीचे की फर्श स्फटिक मणि की बनी हुई थी और उन बावड़ियों के तटों पर तरह-तरह के विचित्र सुवर्णमय वृक्ष शोभा दे रहे थे।
वहाँ विचरते हुए वानरवीर ने पृथक्-पृथक् ऐसी मनोरम भूमियों का दर्शन किया, जिनमें मणि, चाँदी और सोने जड़े गए थे।
वहाँ जो कोई भी वृक्ष थे, वे सब फल-फूल देने वाले थे, छत्र की तरह घनी छाया किए रहते थे । उन सब के नीचे चाँदी और उसके उपर सोने की वेदियाँ बनी हुई थी। वह वाटिका लंका के वैभव और सम्पन्नता की प्रतीक थी।
रघुकुल तिलक श्रीराम की अशोक वाटिका
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इधर अयोध्या की अशोक वाटिका या वनिका प्रभु राम और माता सीता के मन में उत्साह और आनंद बढ़ाने वाली थी। यह अन्त:पुर के विहार योग्य उपवन था।
इसमें चन्दन, अगरु, आम, नारीयल, रक्तचंदन और देवदारु के वन सब ओर से उसकी सुंदरता बढ़ा रहे थे। चम्पा, अशोक, पुनांग, महुआ, कटहल, असन और पारीजात से वह वाटिका सुशोभित थी।
चम्पकाशोक पुनांनागमधूकपनसासनै:।
शोभितां पारिजातैश्च विधूमज्वलनप्रभै:।।
सदा फूल और फल देने वाले रमणीय, मनोरम, दिव्य रस और गंध से युक्त और नूतन अँकुर-पल्लवों से अलंकृत वृक्ष भी उस अशोकवनिका की शोभा बढ़ा रहे थे।
सर्वदा कुसुमै रम्यै: फलवृद्धिर्मनोरमै:।
दिव्यगन्ध रसोपेतैस्तरुणाअँकुरपल्लवै:।।
कोकिल, भृंगराज आदि सैकड़ों पक्षी उस वाटिका की शोभा थे, जो आम्रवृक्ष डालियों पर बैठ कर वहाँ विचित्र सुषमा की सृष्टि कर रहे थे।
उद्यान में उत्तम जल से भरी हुई तरह-तरह की बावडियाँ थीं, जिनमें माणिक्य की सीढ़ियाँ बनी हुई थीं।
माणिक्यकृत सोपाना: स्फटिकान्तरकुट्टिमा:।
फुल्लपद्मोत्पलवनाश्चक्रवाकोपशोभिता:।।
जिनके बाद कुछ दूर तक जल के भीतर की भूमि स्फटिक मणि से बँधी हुई थीं। उन बावड़ियों के भीतर खिले हुए कमल और कुमुदों के समूह शोभा बढ़ा रहे थे। वहीं वनप्रान्त में नीलम के समान रंग वाली हरी-भरी घास उस वाटिका का श्रृंगार कर रहीं थी।
जैसे इन्द्र का नन्दन और कुबेर का चित्ररथ वन सुशोभित होता है, उसी प्रकार सुंदर भवनों से विभूषित श्रीराम का क्रीड़ा-कानन शोभा पा रहा था।
नन्दनं हि यथेन्द्रस्य ब्राह्मं चैत्ररथं यथा ।
तथाभूतं हि रामस्य काननं संनिवशम्।।
वहाँ अनेक ऐसे भवन बने थे, जिनके भीतर बैठने के लिए बहुत से आसन सजाए गए थे। वह वाटिका अनेक लतामंडपों से सम्पन्न दिखाई देती थी। उस समृद्धशालिनी अशोक वनिका में प्रवेश करके रघुकुलनंदन श्रीराम पुष्पराशि से विभूषित एक सुंदर आसन पर बैेठे, जिस पर कालीन बिछा था।
बह्वासनगृहोपेतां लतागृहसमावृताम् ।
अशोकवनिकां स्फीतां प्रविश्य रघुनन्दन:।।
जैसे देवराज इन्द्र शची को सुधापान कराते हैं, उसी प्रकार रघुकुलभूषण श्रीराम ने अपने हाथ से पवित्र पेय सीताजी को पिलाया।
सीतामादाय हस्तेन मधु मरेयकं शुचि ।
पाययामास काकुस्थ: शचीमिव पुरंदर:।।
सेवकगण श्रीराम के भोजन के लिए वहाँ तुरंत ही राजोचित भोज्य पदार्थ तथा नाना प्रकार के फल ले आए।
उस समय राजा राम के समीप नृत्य और गीत की कला में निपुण अप्सराएँ और नाग-कन्याएँ किन्नरियों के साथ मिलकर नृत्य करने लगीं।
उपानृत्यंश्च राजानं नृत्यगीत विशारदा:।
अप्सरोरगसंघाश्च किंनरीपरिवारिता।।
यों श्रीराम प्रतिदिन देवताओं के समान आनंदित रहकर देवकन्या के समान सुन्दरी विदेहनंदिनी सीता के साथ रमण करते थे।
एवं रामो मुदा युक्त: सीतां सुरसुतोपमाम्।
रमयामास वैदेहीमहन्यहनि देववत्।।
इस प्रकार सीता और रघुनाथ जी चिरकाल तक उस अशोक वनिका में विहार करते रहे।
यदि वर्तमान अयोध्या में नवीन मंदिर के आसपास कोई ऐसी वाटिका न हो तो वाल्मीकि रामायण के इन विवरणों को ध्यान में रखकर राम वाटिका का निर्माण कराया जा सकता है। जय श्रीराम।
