8.22 क्या प्राचीन काल में हिन्दुओं में भी तलाक होता था?

8.22 क्या प्राचीन काल में हिन्दुओं में भी तलाक होता था?

हिन्दुओं का आमतौर पर यह मानना है कि ‘तलाक’ की प्रथा भारतीय संस्कृति में कभी नहीं रही। यह प्रथा विदेशी और विधर्मी लोगों के प्रभाव से हमारे यहाँ आ गई है। इसलिए कुछ लोगों का कथन है कि हिन्दी शब्दकोष में तलाक का समानार्थी कोई शब्द नहीं मिलता। पर यह बात पूरी तरह सही नहीं है।

वास्तव में हिंदू या सनातन संस्कृति में विवाह कोई समझौता न होकर सामाजिक, सांस्कृतिक और पारिवारिक संस्कार है। जो धार्मिक विधियों और पारंपरिक रीति-रिवाजों से युक्त हैं। इसलिए विवाह के समय वर-वधु को अनेक तरह के संस्कार करना होते हैं और साथ ही उनके द्वारा ऐसे सात वचन लेना भी आवश्यक माना जाता है, जिससे वैवाहिक जीवन को एक मजबूत और पवित्र आधार मिल सके। वैसे समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से भी देखें तो भी “विवाह” नामक संस्था इसलिए आवश्यक है, क्योंकि, इसी से परिवार का गठन होता है, जो समाज के विकास के लिए अति-आवश्यक है। संतानों की अच्छी परवरिश,उनके सामाजिकरण और उनमें संस्कारों की नींव को मजबूत करने के लिए यह बहुत जरूरी है। इसी के माध्यम से संयुक्त परिवार के छोटे-बड़े सदस्यों की देखभाल हो सकती है। हमारे यहाँ विवाह को सात जन्मों का गठबंधन मानने संबंधी धारणा के पीछे भी यही सोच है कि इसे वर-वधु और परिवार बहुत गंभीरता से लें।

इसलिए भारतीय समाज में तलाक का चलन कभी भी आम नहीं रहा है। किन्तु, इसका अर्थ यह भी नहीं है कि प्राचीन भारतीय समाज में तलाक होते ही नहीं थे। कई बार ऐसी अपरिहार्य स्थितियाँ बन जाती थीं जब विवाह-विच्छेद होते भी थे, जिन्हें सामाजिक और कानूनी मान्यता प्राप्त थी। आज से लगभग ढ़ाई हजार वर्ष पूर्व कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में तलाक के लिए “मोक्ष” शब्द का प्रयोग किया है। किन्हीं विशेष परिस्थितियों में पुरुष और स्त्री दोनों को ही विच्छेद का अधिकार प्राप्त था। यह भी संभव है कि विवाह-विच्छेद अर्थात् ‘मोक्ष’ को कौटिल्य के बहुत समय पूर्व से मान्यता मिली हो, इसी कारण कौटिल्य ने भी इसका उल्लेख किया हो।

कौटिल्य अथवा चाणक्य ने “अर्थशास्त्र” में उस समय प्रचलित आठ प्रकार के विवाहों की जानकारी दी है। जो इस प्रकार हैं:-

(१) ब्राह्म (कन्या को अलंकृत और सुसज्जित कर वर को पिता द्वारा सौंपना)

(२) प्राजापत्य (संतान के लिए विवाह जिसके अनुसार धर्म,अर्थ और काम में कन्या और वर का अधिकार समान होता था),

(३) आर्ष (इसमें वर पक्ष से गौओं का एक जोड़ा लेकर कन्या का पिता दान में पुन: वर को दे देता था),

(४) दैव कार्य में लगे योग्य और सुशील वर को कन्या देना),

(५) आसुर (द्रव्य लेकर लड़की को ब्याहना),

(६) गांधर्व (कामवश बिना माता-पिता की आज्ञा से वर और कन्या का संयुक्त होना),

(७) राक्षस (कन्या को उसके परिवार से बलात् छीन लेना),

(८) पैशाच (छल अथवा बल से सोई या मादक वस्तु से मत्त कन्या का उपभोग करना।) इनमें से पहले चार प्रकार के विवाह प्रशस्त और पिछले चार अप्रशस्त माने जाते थे।

आज हिन्दुओं में सामान्यत: “ब्राह्म विवाह” ही होते हैं। पर आधुनिकता के चक्कर में “गांधर्व विवाह” भी होने लगे हैं। उसका भी और विकृत स्वरूप ‘लिव इन रिलेशनशिप’ अर्थात् बिना विवाह के साथ-साथ रहना’ भी दिखाई पड़ने लगा है। इसी तरह “समान लिंग विवाह” और बड़ी विकृति के रूप में सामने आ रहा है। समाज और कितना नीचे उतरेगा, कहा नहीं जा सकता।

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