2.2 “क्या माता कौशल्या के संताप का कारण कैकेयी थी”

2.2 “क्या माता कौशल्या के संताप का कारण कैकेयी थी”

युग चाहे कोई भी रहा हो, हर युग में पति की दूसरी पत्नी अर्थात् सौत पहली पत्नी के लिए सदैव दु:खदायी रही है । क्योंकि उसे सौत से सतत् चुनौति मिलती रही है। भले ही प्रत्यक्ष दिखाई न देता हो, पर उनके बीच अधिकारों और वर्चस्व को लेकर प्राय: शीतयुद्ध चलता रहता है। यदि सौतने एक से अधिक हों तो पहली पत्नी स्वयं को सदैव संकट में पाती है।

श्रीराम का काल भी इससे अछूता नहीं था। उनकी भी तीन माताएँ थीं, जिनके बीच यूँ तो सौहार्द दिखाई देता था, पर अंदर ही अंदर राजा दशरथ से विशेष महत्व, उनका ध्यान,समय और प्रेम पाने के लिए होड़ सी चलती रहती थी। जिसमें जीत अधिकतर मंझली रानी कैकेयी की होती थी। क्योंकि वे अधिक सुंदर, युवा, स्वाभिमानी और साहसी थी। रणकौशल में भी प्रवीण थी और राजा के साथ देवासुर युद्ध में भाग ले चुकी थी । अपने साहस से संकट की परिस्थिति में राजा को उबार लाई थी। राजा भी उन्हें विशेष महत्व देते थे और उनकी बात मानते थे। यद्यपि, इससे महारानी कौशल्या स्वयं को बहुत उपेक्षित महसूस करती थीं।

किन्तु, आदर्शवाद और मर्यादा के पक्षधर गोस्वामी तुलसीदास ने राम की माता के चरित्र को मानस में बहुत अधिक उदात्त और गरिमामयी बना दिया और उन्हें अधिक करुणामयी, सहनशील व सबके प्रति समानभाव रखने वाली महिला के रूप में चित्रित किया है। पर इससे उनका सहज मानवीय रूप, उनके दर्द और भावनाएँ छिप गई हैं।

यथा मानस में वर्णित इस प्रसंग को देखिए। जब श्रीराम को राज्य के स्थान पर चौदह वर्ष का वनवास दे दिए जाने के बाद वे अपनी माँ को यह सूचना देने और वन जाने की आज्ञा लेने के लिए जाते हैं, तब माता कौशल्या श्रीराम से कहती हैं– ” जौ केवल पितु आयसु ताता। तो जनि जाउ जानि बड़ी माता।। जौ पितु-मातु कहेउ बन जाना। तौ कानन सत अवध समाना।। (अर्थात् हे तात; यदि केवल पिता जी की ही आज्ञा हो, तो मुझ माता को [पिता से] बड़ी जानकर वन को मत जाओ। किन्तु, यदि माता-पिता दोनों ने वन जाने को कहा हो, तो वन तुम्हारे लिए सैकड़ों अयोध्या के समान है।) इसका अर्थ यह है कि उन्होंने अपनी सौत कैकेयी को भी अपने समकक्ष रखा था। अब यहाँ विचार करने योग्य बात यह है कि क्या सचमुच कोई माता इतनी उदार हो सकती है कि जो अपने पुत्र को वन जाने की आज्ञा देने वाली सौत को अपने समान ही मानेगी? और उसके वचन का पालन करने के लिए कहेगी। लौकिक जीवन में ऐसा संभव तो नहीं लगता। ऐसा प्रतीत होता है कि यह श्रीराम की माता के चरित्र को एक नई ऊँचाई पर पहुँचाने का कवि का अनोखा प्रयास है।

इसी प्रसंग को अब यथार्थवादी कवि महर्षि वाल्मीकि की दृष्टि से देखिए। जिसमें उन्होंने माता कौशल्या को सहज चरित्र वाली लौकिक महिला ही रहने दिया, जो ऐसी घटना से वैसी ही आहत और पीड़ित होती है, जैसी कोई अन्य माता हो सकती थीं। उन्होंने अपनी ओर से ऐसा कोई प्रयास नहीं किया कि वे (कौशल्या) महान् दिखाई दें। वाल्मीकि रामायण में इस प्रसंग को मार्मिक, किंतु, अलग प्रकार से दिखाया गया है।

जब राम माँ कौशल्या के पास पहुँचे तब वे राम को युवराज पद मिलने के आनंद में थीं। उस समय वे पुत्र की मंगलकामना से रातभर जाग कर सवेरे एकाग्रचित्त हो भगवान विष्णु की पूजा कर रही थीं।

“कौशल्यापि तदा देवी रात्रिं स्थित्वा समाहिता।

प्रभाते चाकरोत् पूजां विष्णो: पुत्रहितैषिणी।।”

वे रेशमी वस्त्र पहन कर बड़ी प्रसन्नता के साथ निरंतर व्रत पारायण होकर मंगल कृत्य पूर्ण करने के पश्चात् मंत्रोच्चारण पूर्वक उस समय अग्नि में आहुति दे रही थीं।

श्रीराम को निकट आया देखकर वे बड़ी प्रसन्नता से उठीं और राम को गले लगाया। राम ने माँ के चरणस्पर्श किए। फिर उन्होंने माँ को सारी बात सुनाते हुए वन जाने की आज्ञा मांगी। जिसे सुनते ही कौशल्या अचेत होकर पृथ्वी पर गिर पड़ीं। राम ने माँ को उठाया और धीरज बंधाया।

तब वे बोलीं ‘बेटा राम, पति के प्रभुत्वकाल में एक ज्येष्ठ पत्नी को जो कल्याण या सुख प्राप्त होना चाहिए, वह मुझे पहले कभी देखने को नहीं मिला। सोचती थी, पुत्र के राज्य में मैं सब सुख देख लूँगी और इसी आशा सेे मैं अब तक जीती रही।’

“न दृष्टपूर्वं कल्याणं सुखं वा पतिपौरुषे।

अपि पुत्रे विपश्येयमिति रामास्थितं मया।।”

‘बड़ी रानी होकर भी मुझे अपनी बातों से हृदय को विदीर्ण कर देने वाली छोटी सौतों से बहुत से अप्रिय वचन सुनने पड़ेंगे।’

‘ स्त्रियों के लिए इससे बढ़कर महान दु:ख और क्या होगा; अत: मेरा शोक और विलाप जैसा है, उसका कोई अन्त नही है।’

“अतो दु:खतरं किं प्रमदानां भविष्यति।

मम शोको विलापश्च यादृशोयमनन्तक:।।”

‘ तात; तुम्हारे निकट रहने पर भी मैं इस प्रकार सौतों से तिरस्कृत रही हूँ, फिर तुम्हारे परदेस चले जाने पर मेरी क्या दशा होगी? उस दशा में तो मेरा मरण निश्चित है।’

‘ पति की ओर से मुझे सदा अत्यंत तिरस्कार अथवा कड़ी फटकार ही मिली है, कभी प्यार और सम्मान प्राप्त नहीं हुआ है। मैं कैकेयी की दासियों के बराबर अथवा उनसे भी गयी-बीती समझी जाती रही हूँ।’

“अत्यन्तं निगृहितास्मि भर्तुर्नित्यमसम्मता।

परिवारेण केकेय्या: समा वाप्यथवावरा।।”

‘जो कोई मेरी सेवा में रहता या मेरा अनुसरण करता है, वह भी कैकेयी के बेटे को देख कर चुप हो जाता है, मुझसे बात नहीं करता है।

बेटा, इस दुर्गति में पड़कर सदा क्रोधी स्वभाव के कारण कटु वचन बोलने वाली उस कैकेयी के मुख को कैसे देख सकूँगी।

“नित्यक्रोधतया तस्या कथं नु खरवादि तत्।

कैकेय्या वदनं द्रष्टं पुत्र शक्ष्यामि दुर्गता।।”

राघव, इस बुढ़ापे में इस तरह सौतों का तिरस्कार और उससे होने वाले महान् अक्षय दु:ख को मैं अधिक काल तक नहीं सह सकती।’

“तदक्षयं महद्दु:खं नोत्सहे सहितुं चिरात्।

विप्रकारं सपत्नीनामेवं जीर्णापि राघव।।”

‘सबसे अधिक दु:ख की बात तो यह है कि पुत्र के सुख के लिए मेरे द्वारा किए गए व्रत, दान और संयम सब व्यर्थ हो गए। मैंने संतान की हित कामना से जो तप किया है, वह भी उसर में बोए हुए बीज की भाँति निष्फल हो गया।’

“इदं तु दु:खं यदनर्थकानि मे व्रतानि दानानि च संयमाश्च हि।

तपश्च तप्तं यदपत्यकाम्यया सुनिष्फलं बीजमिवोप्तमूषरे।।”

‘हे राम, तुम्हारे बिना यदि मेरी मृत्यु नहीं होती है तो तुम्हारे बिना यहाँ व्यर्थ कुत्सित जीवन क्यों बिताऊँ? बेटा, इससे अच्छा तो यह होगा कि मैं तुम्हारे साथ ही वन को चली चलूँ।’

“अथापि किं जीवितमद्य मे वृथा त्वया विना चन्द्रनिभाननप्रभ।

अनुव्रजिष्यामि वनं त्वयैव गौ: सदुर्बला वत्समिवाभिकांक्षया।।”

‘ यदि तुम मुझे शोक में डूबी हुई छोड़कर वन को चले जाओगे तो उपवास करके प्राणत्याग दूँगी।’

‘ मेरी सौत की कही हुई अधर्मयुक्त बात सुनकर मुझ शोक से संतप्त हुई माता को छोड़कर तुम्हें यहाँ से नहीं जाना चाहिए।(अर्थात् उन बातों की तुम्हें अवहेलना कर देनी चाहिए।)

“न चाधर्म्य वच: सपत्न्या मम भाषितम्।

विहाय शोकसंतप्तां गन्तुमहर्सि मामित:।।”

इसलिए यदि धर्म का पालन करना चाहो तो यहीं रहकर मेरी सेवा करो और इस प्रकार परम उत्तम धर्म का आचरण करो।’

‘ जैसे गौरव के कारण राजा तुम्हारे पूज्य हैं, उसी प्रकार मैं भी हूँ। मैं तुम्हें वन में जाने की आज्ञा नहीं देती। अत: तुम्हें यहाँ से वन में नहीं जाना चाहिए।’

“यथैव राजा पूज्यस्ते गौरवेण तथा ह्यहम्।

त्वां साहं नानुजानामि न गन्तव्यमितो वनम्।।

अंतत: शोकसंतप्त माता को समझा-बुझाकर, उन्हें पतिव्रत धर्म का पालन करने की राय देकर, उनकी सम्मति प्राप्त कर श्रीराम, लक्ष्मण और सीता के साथ चौदह वर्ष के लिए वन को चले गए।

Back To Top