लगभग सौ-ढेड़ सौ साल पहले तक समाज में जिंदगी लगभग ठहरी हुई सी थी। यह ठहरना कई सौ साल का था । आप पूछेंगे कि क्या समय भी कभी ठहरता है ? यह सच है कि समय कभी किसी के लिए नहीं ठहरता । वह तो अपनी गति से गुजरता रहता है । पर यहाँ बात समाज में परिवर्तन की है, वह या तो होता ही नहीं था अथवा इतनी घीमी गति से होता था कि नजर ही नहीं आता था। आज बदलाव की तेज गति के सामने पुराना समाज में ठहरा हुआ ही नजर आता है।
पहले यह दृढ़ धारणा थी कि समाज में जो वर्ण और जातीय व्यवस्था है, वह अपरिवर्तनशील है । जो जिस जाति में पैदा हुआ है, उसे सदैव उसी में बने रहना होगा । उस जाति के लिए जो काम तय किया गया है, सदियों तक उसे वही करना होगा । यद्यपि इसके पीछे यह तर्क दिया जाता है कि ऐसा करने से उस काम में नई पीढ़ी को एक पारम्परिक कुशलता हासिल होती है । जिसे उतनी सुगढ़ता और कुशलता से कोई दूसरा नहीं कर सकता । वैसे यह सच है, पर यदि वे काम पर्याप्त् आय देने वाले नहीं हुए तो उस जाति के लोग सदैव गरीबी में जीने और आर्थिक रूप से समर्थ लोगों का मुँह जोहने के लिए अभिशप्त होते थे और इसका मतलब होता है, दबंग लोगों द्वारा उनका स्थायीरूप से अधिकारपूर्वक शोषण।
तब किसान, जो कि सदियों तक एक ही तरीके से खेती करने को मजबूर था। क्योंकि, खेती लगभग असिंचित होती थी। खेती करने के साधन भी वे ही होते थे, जो कि उनके पुरखों के समय होते थे। कोई तकनीकि परिवर्तन नहीं होता था। लोग सोच भी नहीं पाते थे कि इनमें कोई सुधार हो भी सकता है और इन्हें अधिक कार्यक्षम बनाया जा सकता है। उतनी ही जमीन से अधिक उपज ली जा सकती है और अपनी माली हालत सुधारी जा सकती है। समाज के निचले तपके को शिक्षा से वंचित कर दिया जाता था। वैज्ञानिक दृष्टिकोण का लगभग अभाव था। ऐसे ही हालात छोटे-मोटे काम धंधे करने वालों के भी थे। कुछ काम तो सीजनल होते थे । कुछ काम चलते रहते थे पर उनकी सही कीमत नहीं मिल पाती थी। बेगारी करना उनकी किस्मत में लिखा होता था।
उच्चवर्ग भी सदियों पुराने घिसे-पिटे ज्ञान से संतुष्ट था। उनमें भी कोई नयी सोच नहीं उपजती थी। उच्चवर्ग में विदेश यात्राओं पर लगभग प्रतिबंध था। इसलिए वे न तो दूसरी संस्कृतियों के सम्पर्क में आते थे और न उनकी भाषा, उनका रहन-सहन, उनकी तकनीक, उनकी सोच, उनकी नई खोजों को जान और सीख पाते थे। इसलिए वे उन तमाम बातों से वंचित रह गए जो दूसरे देशों को आगे बढ़ा रही थी।
उदाहरण के लिए एक छोटी सी खोज का प्रभाव देखें। जर्मनी में गुुटनबर्ग नामके एक खोजकर्ता ने 1450 में प्रिंटिंग मशीन का निर्माण कर लिया था और उसकी यह अनोखी मशीन अगले पचास साल में पूरे योरोप में छा गई। छापाखाना की इस छोटी सी एक खोज ने ज्ञान की दुनिया में क्रांति ला दी। विद्वान लेखकों की लिखी हुई रचनाएँ, जो कभी मात्र एक प्रति तक सीमित थी, छापाखाने के कारण हजार गुना होकर लोगों के सामने आ गई। वहाँ कुछ ही समय में बाईबिल सहित विभिन्न विषयों की लाखों पुस्तकें प्रकाशित हो गईं। पर यह मशीन हमारे यहाँ ढ़ाई सौ साल बाद आ सकी। क्योंकि तब हमें मालूम ही नहीं था कि शेष दुनिया में कहाँ क्या हो रहा है। अगर हमारे लोगों का सम्पर्क योरोप से होता तो हमारे यहाँ भी यह मशीन और उसकी तकनालाजी बहुत जल्दी आ गई होती। जिससे हजारों ग्रंथ और पांडुलिपियाँ प्रकाशित हो चुकी होती जो आज विलुप्त सी हैं। तुलसीदास अपने जीवन काल में ही “रामचरित मानस” की प्रकाशित प्रतियाँ देख लेते। पहले किसी भी महत्वपूर्ण ग्रंथ की प्रतिलिपि हाथ से लिखकर तैयार की जाती थी। यह बहुत समयसाध्य और कष्टसाध्य प्रक्रिया थी। इसमें त्रुटियाँ होने की संभावना भी बहुत अधिक होती थी। पर उन नवीनताओं से हमारे शासक/व्यापारीगण अनजान थे। साथ ही उनमें जानने की कोई जिज्ञासा भी नहीं थी, जो पश्चिमी देशों में हो रहे थे।
सच तो यह है कि हम लोग अधिकतर इस मुगालते में रहे कि हम सर्वश्रेष्ठ हैं और हमारी संस्कृति जैसी कोई संस्कृति दुनिया में नहीं है इसलिए हमें किसी और से सीखने-जानने की जरूरत ही नहीं है। हमारे ग्रंथों और मंत्रों में इतनी शक्ति है कि हम जो चाहे, वो कर सकते हैं। पर हम इतनी शक्ती स्वयं में कभी भी पैदा नहीं कर पाए जिससे वह ज्ञान कार्यरूप में परिणित हो जाता।
दुर्भाग्य से हमारे यहाँ जो विदेशी आक्रमणकारी आए, वे भी लगभग बर्बर और जाहिल थे। उनकी रुचि लूट-खसौट, मार-काट में अधिक थी। इनमें युनानी, शक, पल्हव, कुषाण, हूण, तुर्क आदि। जिनमें हूण तो निहायत ही बर्बर और युद्ध पिपासु थे। कालान्तर में ये सभी हिन्दू समाज में समा गए ।
पर बारहवीं शताब्दी में जो मुस्लिम आक्रांता आए, वे भारतीय समाज और संस्कृति से अलग हटकर थे। उनके एक हाथ में तलवार और दूसरे में कुरान थी। उनका उद्देश्य इस्लाम धर्म का प्रसार और गैर मुस्लिमों का संहार था। मुगलों का मूल उद्देश्य भी यही था, पर वे अपेक्षाकृत अधिक समन्वयवादी थे। बाद में आए युरोपियन। जिनका लक्ष्य भी भारतीय सम्पत्ति से अपना घर भरना ही था। फिर भी वे भौतिक और वैचारिक रूप से अधिक समृद्ध थे और नई संस्कृति और नए विचार लेकर आए। जिसका भारत के मानस पर भी भरपूर असर पड़ा। यद्यपि उन्होंने भी भारत को लूटने में कोई कसर नहीं छोड़ी। पर उनके द्वारा निर्मित रेल, डाक-तार, संचार, टेलीफोन के नेटवर्क, प्रिंटिंग मशीनों आदि से विकास की नई राहें खुलीं। कहा जा सकता है यह सब उन्होंने अपने साम्राज्य को मजबूत करने के लिए किया था। पर उससे देश ने एक नई करवट ली। इनका लाभ स्वतंत्रता आंदोलन में भी खूब मिला।
