सीता जी के अपहरण के बाद राम विरह वेदना से व्याकुल हो जाते हैं। उन्हें नहीं मालूम होता है कि सीता को कौन और कहाँ ले गया है। वे व्याकुलता में वृक्षों,लताओं, पक्षियों,पशुओं से जानकी के बारे में पूछते फिरते हैं कि वे कहाँ हैं अथवा उन्हें कौन और कहाँ ले गया है। उनकी इस मनोदशा और इस प्रसंग का मानस में इस प्रकार चित्रण किया गया है:- “हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी।तुम देखी सीता मृगनयनी।” पर उन्हें कहीं से उत्तर नहीं मिलता। वे सभी संभावित जगहों को खोज लेते हैं,जहाँ सीता जी के मिल पाने की जरा भी संभावना नजर आती है। किंतु,हर जगह से निराशा हाथ लगती है। वाल्मीकि रामायण के अनुसार अंत में हिरणों का एक झुंड़ उन्हें दिखाई देता है,जो बार-बार आकाश की ओर देखता हुआ दक्षिण दिशा की ओर जाता है। मृग मुड़-मुड़ कर यह भी देखते हैं कि राम उनके पीछे आ रहे हैं या नहीं। इससे राम अनुमान लगते हैं कि हो न हो कोई सीता को दक्षिण दिशा की ओर ले गया है और ये मृग उसी का संकेत दे रहे हैं।बाद में मानस में राम के पत्नी-विरह जनित इस सहज विलाप को परब्रह्म की नर-लीला मान लिया गया।
“एहि बिधि खोजत बिलपत स्वामी।
मनहुँ महा बिरही अति कामी।।
पूरनकाम राम सुख रासी।
मनुज चरित कर अज अबिनासी।।”
कहा जाता है कि संकट के समय आप किसी की सहायता यदि न कर पाएँ तो कोई बात नहीं किन्तु, उसका उपहास भी नहीं करना चाहिए,अन्यथा आपको कुछ और नहीं भी, तब भी उसका दिल दुखाने का पाप तो लगेगा ही। राम भी जब सीता को खोजते और विभिन्न प्राणियों से सीता जी के बारे में पूछते फिर रहे थे तब उन्हें भी कईयों के उपहास का पात्र बनना पड़ा था। जिन्होंने उनकी सहायता की वे उनकी कृपा और जिन्होंने हँसी उड़ाई उन्हें कोप का भागी बनना पड़ा। इन्हें बोधकथाओं के रूप में भी लिया जा सकता है। कृतिवास रामायण में एक ऐसी ही कथा आती है। सीताहरण के बाद घायल जटायु से मिलने के पहले एक चक्रवाक से राम-लक्ष्मण की भेंट हुई। राम ने चक्रवाक से पूछा कि जनकनंदिनी को कौन ले गया है।किंतु,चक्रवाक ने परिस्थिति समझने के बाद राम का यह कह कर उपहास किया–“तुम दो मनुष्यों के होते हुए भी एक स्त्री की रक्षा नहीं कर पाए? मैं अकेला पक्षी हूँ,फिर भी दो मादाओं की देखभाल कर लेता हूँ। तुम लोगों ने स्त्री को खो दिया और अब इधर-उधर भटक कर उसके विषय में पूछते हो। क्षत्रिय समाज तुम्हें क्या समझेगा।”
राम ने क्रोध में आकर उसे शाप दिया कि आज से तुम रति सुख से वंचित रहोगे,रात में आहार खोजते तुम्हें मादा से अलग रहना पड़ेगा। इस पर चक्रवाक पतित पावन भक्तवत्सल नारायण के रूप में राम की स्तुति करते हुए अनुनय-विनय करने लगा।अंत में राम ने उस पर तरस खा कर कहा कि तुम्हें द्वापर युग में व्याध जाल में फँसाएगा,तब तुम मेरे शाप से मुक्त हो जाओगे।
बलरामदास रामायण के अनुसार राम और लक्ष्मण ने पम्पा सरोवर के पास पहुँचकर चकवा-चकवी के जोड़े को क्रीड़ा करते हुए देखा। राम ने पास जाकर दोनों से पूछा कि सीता कहाँ है। चक्रवाक ने राम की निंदा करते हुए क्या तुम यह भी नहीं जानते कि इस समय बाधा डालना उचित नहीं है। इस पर राम ने शाप दिया कि तुम दोनों का मिलन फिर कभी नहीं होगा। जब वे राम को भगवान जानकर आराधना करने लगे तब राम ने अपना शाप बदल कर कहा कि वे केवल दिन में ही मिल सकेंगे। बाद में किसी व्याध ने उन दोनों को फँसाकर एक टोकरी में बंद कर दिया,वे आपस में कहने लगे कि हमारे साथ रहने से राम का शाप झूठा ही साबित होगा। किन्तु,रात होने के पूर्व ही टोकरी अपने आप खुल गई और दोनों अलग हो गए। इसी रामायण के किष्किंधा काण्ड में वक और कुक्कुट की कथाएँ भी मिलती है। वर्षाऋतु के अंत में जब लक्ष्मण किष्किंधा चले गए थे और राम अकेले ही माल्यवंत पर्वत पर रह गए थे, तब एक बगुले ने उनका विरह देखकर कहा “तुम कैसे महात्मा हो,ऐसे तो अज्ञानी ही रोते हैं,तुम क्यों रोते हो?” उत्तर में राम ने अपनी हरण की गई पत्नी का समाचार पूछा। बगुले ने राम को आश्वासन दिया कि लंका का राजा रावण सीता को ले गया है।मैंने उन्हें रोते हुए देखा था। उनका अश्रुजल मुझ पर गिर गया था और मैं सफेद हो गया हूँ। दुर्गा तुम पर प्रसन्न होंगी और सीता तुम्हें मिल जाएँगी। राम उस पर प्रसन्न हुए और उन्होंने उसे वर दिया। वर पाकर बगुले ने कहा “वर्षा में भोजन एकत्र करने में कठिनाई होती है। मुझे यहाँ बैठे हुए आहार मिलना चाहिए।” इसपर राम ने उत्तर दिया– तुम्हारी मादा तुम्हें बरसात में भोजन लाकर देगी।” बगुले ने आपत्ति की–“वह मुझसे छोटी है,उसका झूठा खाकर मैं उपहास का पात्र बन जाऊँगा।” राम ने उसे समझाते हुए कहा–“पति-पत्नी दोनों एक हैं,कोई बड़ा-छोटा है ही नहीं।”अंत ने राम कहा कि कार्तिक शुक्ल दशमी से पूर्णिमा तक कोई भी आमिष का सेवन नहीं करेगा और तुम्हारे आदर में इस व्रत का नाम बकपंचक रखा जाएगा। बाद में एक कुक्कुट ने भी सहानुभूति प्रकट करते हुए राम से कहा कि तुम क्यों रोते हो और अकेले क्यों रहते हो। राम ने उत्तर में अपना परिचय दिया और वनवास,सीताहरण की सारी कथा सुनाई। राम ने यह कह कर उसे वरदान दिया कि तुम्हारे सिर पर सप्तशाखा लाल मुकुट रहेगा और जो तुम्हें मारेगा वह मेरा भी शत्रु होगा। संभवत: इसी कथा के कारण उड़ीसा में कुक्कुट रामपक्षी कह कर पुकारा जाता है।
कुछ आदिवासी जातियों में भी सीता के खोज के वर्णन में बगुले,गिलहरी और बेर के वृक्ष का वर्णन किया गया है। राम ने एक बगुले से सीता का पता पूछा था। बगुले ने उनकी अवज्ञा करके उत्तर दिया “मुझे सीता से क्या,केवल अपने पेट भरने की चिंता है।” इस पर लक्ष्मण ने उसकी गर्दन पकड़ कर खींच दी और तब से बगुले की गर्दन लम्बी होने लगी। संथाली राम कथा के अनुसार राम ने एक वृक्ष पर फूट-फूट कर रोती हुई गिलहरी से सीता का समाचार पूछा।गिलहरी ने उत्तर दिया “उन्हीं के कारण तो मैं रो रही हूँ। रावण ने सीता का अपहरण किया है और वह इसी रास्ते निकल गया है। “तब राम ने उसकी पीठ थपथपाकर कहा कि तुम कितनी भी ऊँची जगह से गिरो,तुम्हें चोट नहीं लगेगी।” मुंडा और बिर्होर जातियों में राम के गिलहरी के पीठ पर तीन रेखाएँ खींचने का उल्लेख मिलता है। संथाली रामकथा के अनुसार राम ने बेर के पेड़ पर लटका हुआ कपड़े का एक टुकड़ा देखा। बेर ने राम से कहा–“रावण इसी रास्ते सीता को ले गया है। मैंने सीता को छुड़ाने का प्रयास किया था,किंतु मुझे उनकी साड़ी के टुकड़े के अलावा कुछ नहीं मिल सका।” राम ने बेर को आशीर्वाद देते हुए कहा–” तुम्हें कोई कितना भी काटे,कोई तुम्हारा नाश नहीं कर सकेगा।”तब से बेर के पेड़ को अमर माना जाता है।
