ऐसा कौन सा परिवार होगा, जहाँ पति-पत्नी के बीच चुहुलबाजी, नोंक-झौंक या कहा सुनी न होती हो। पर अच्छे और सुलझे गृहस्थ घर की बात को घर में ही निपटा-सुलझा लेते हैं। किन्तु, यह बात भोलेनाथ की है, जो नहीं जानते थे कि घर-परिवार में शाँति बनाए रखने के लिए क्या-क्या करना चाहिए। जैसे हर पति को,चाहे उसकी पत्नी कैसी भी हो, उसके रूप-रंग, आकार-प्रकार, स्वभाव, चाल-चलन, उसकी बुद्धिमता और समझदारी, मितव्ययता और उसके मायके की सदैव प्रशंसा करते रहना चाहिए। भगवान शंकर द्वारा ऐसा न करने के कारण ही एक बार माता भवानी उनसे रूठ कर अलग हो गई थीं।
वैसे भोलेनाथ तो ठहरे सदा के बैरागी। उन्हें तो तपस्या और ध्यान में डूबे रहना भाता था। गृहस्थी संभालना न उनके बस का था और न ही वे इस झंझट में पड़ना चाहते थे। वह तो देवताओं के बहुत प्रार्थना और अनुनय-विनय करने के बाद विवाह करने को राजी हुए थे। दूसरी ओर शैलपुत्री पार्वती उन्हें पतिरूप में पाने के लिए घनघोर तपस्या में लीन थीं। उनका हठ था कि “जन्म कोटि लगि रगर हमारी। बरउ संभु न त रहउँ कुआरी।।” परिणाम यह रहा कि बाध्य होकर सदाशिव माता पार्वती को ब्याह कर निज निवास ले आए।
एक बार जब शंभु-पार्वती आसपास बैठे हुए थे, तब प्रेमवश पार्वती उनके गले में हाथ डाल कर उनसे लिपट गईं। तब भगवान शंकर ने उनसे विनोद में कहा–‘ पार्वती; जब कृष्णकांति युक्त तुम मेरे श्वेत शरीर से लिपटती हो तो ऐसा लगता है जैसे काली नागिन चंदन के वृक्ष से लिपट गई हो। (ध्यान देने की बात है कि उन दिनों माता पार्वती कृष्णवर्णा थीं) बस, इतना सुनते ही पार्वती जी की आँखें लाल और भृकुटी टेड़ी हो गई। भगवान शंकर द्वारा ऐसा कहे जाने पर पार्वती उनके गले से अलग हो गई। देवी ने कहा–चन्द्रभूषण ! दीर्घकालिक तपस्या द्वारा आपको पाने की मैंने जो इच्छा की थी, उसी के कारण मुझे पग-पग पर यह तिरस्कार प्राप्त हो रहा है।
हे जटाधारी शंकर! न मैं कुटिल हूँ और न ही विषम ही हूँ। आप स्वयं ही विषयुक्त हैं। आपने मुझे ‘कृष्णा’ के नाम से संबोधित किया है, सो आप भी तो महाकाल के नाम से विख्यात हैं। अत: ऐसा अपमान सह कर यहाँ जीवित रहने की अपेक्षा अब मैं तपस्या करने के लिए वन में जाना उचित समझती हूँ।
तब भगवान शिव उन्हें मनाते हुए बोले, हे पार्वती! मैं तुम्हारी निंदा करने पर उतारू नहीं हूँ। मैंने तो केवल सहज परिहास की बात कही है। यदि तुम इस प्रकार कुपित हो गईं तो अब मैं पुन: परिहास की बात नहीं करूँगा। तुम क्रोध छोड़ दो। देखो, मैं तुम्हारे सामने हाथ जोड़कर सिर झुकाए हूँ। इस प्रकार महादेव जी अनेक विनम्र और मधुर बातों से अपनी प्रिया पार्वती के क्रोध को शाँत करने का प्रयास करते रहे,पर सती का वह उत्कट क्रोध शाँत नहीं हुआ; क्योंकि उस व्यंग से उनका मर्मस्थल पर चोट लगी थी।
उसके बाद पार्वती शंकर जी के हाथ से पकड़े हुए अपने वस्त्रों को छुड़ाकर बाल बिखेरे हुए वेगपूर्वक वहाँ से जाने की चेष्टा करने लगीं। क्रोधावेश से जाने को उद्धत हुई पार्वती से त्रिपुरारी ने पुन: कहा– ‘ तुम सचमुच तुम पर्वतराज की पुत्री हो। तुम्हारे हृदय में भी पर्वत जैसी कठोरता आ गई है। तुम वन मार्गों जैसी ही कुटिल और दुर्गम हो। यह सुनकर क्रोध के कारण पार्वती के ओंठ कांपने लगे। तब वे फिर से शंकर जी से बोलीं।
उमा ने कहा- भगवन्! आप सभी अन्य सभी गुणीजनों पर दोष लगाकर उनकी निंदा न करें, क्योंकि आप में भी तो सभी गुण दुष्टों की निकटता के कारण आ गए हैं। आप में सांपों के संसर्ग से अधिक टेड़ापन, भस्म से प्रेमहीनता, चन्द्रमा से हृदय की कालिमा और वृषभ से दुर्बोधता भर गई है। आप श्मशान में निवास करने के कारण निर्भीक हो गए हैं। नग्न रहने के कारण आपमें लज्जा नहीं रह गई है। कापाली होने के कारण निर्मम हो गए हैं और दया तो चिरकाल से नष्ट हो गई है। ऐसा कह कर पार्वती उस भवन से निकल गईं।
उनको इस प्रकार जाती देखकर देवेश के गण रोते हुए उनके पीछे दौड़े और कहने लगे- ‘माँ! हम लोगों को छोड़कर आप कहाँ जा रही हैं?’ तब वीरक देवी के दोनों चरणों को पकड़ कर बोला- यह क्या हो गया? आप क्रुद्ध होकर कहाँ जा रही हैं? मैं भी आपके पीछे चलूँगा। तब माता पार्वती ने स्नेहयुक्त वचनों से उसे समझाया और बोली-मैं जिस कार्य से जा रही हूँ, वह सुनो। मेरे अनिन्द्य होने पर भी शंकर जी ने ‘कृष्णा’ कहकर मेरी निंदा की है। इसलिए अब मैं तपस्या करूँगी, जिससे गौरवर्ण प्राप्त कर सकूँ। मेरे चले जाने के बाद यहाँ कोई स्त्री प्रवेश न कर सके, इसलिए तुम्हें बहुत सावधान रहना चाहिए। सभी द्वारों की निगरानी करनी चाहिए। (महिलाओं में पुरुषों के प्रति जो सहज आशंका होती है, इस बात से उसी का बोध होता है।)
संक्षेप में आगे कथा यह है कि माता पार्वती वन में पहुँचकर घोर तपस्या करती हैं। जैसा कि वे पूर्व में भी कर चुकी थीं। जिसके फलस्वरूप ब्रह्मदेव उन पर प्रसन्न होते हैं और उन्हें इच्छित गौरवर्ण प्रदान करते हैं। जिससे उनकी काँति अद्भुत हो गई। गौरवर्ण पाकर माता मुदित मन भगवान शंकर के पास लौटती हैं और सुखपूर्वक गृहस्थ जीवन व्यतीत करती हैं।
मत्स्य पुराण इस रोचक कथा से यह भी पता लगता है कि गौरवर्ण पाने की इच्छा सभी तरह की महिलाओं में, वे चाहे देवी हों या मानवी, सदा से रही है और उसे पाने के लिए वे विविध उपाय करती आ रही हैं। आज भी महिलाओं में इसी चाहत को और अधिक उभार कर सौंदर्य प्रसाधन बनाने वाली कम्पनियाँ “दिन दूना, रात चौगुना” विकास कर रही हैं। अब तो इस मामले में पुरुषवर्ग भी महिलाओं से पीछे रहना नहीं चाहता। अभी नवरात्रि में होने वाले गरबा नृत्यों में देखिए, स्त्री-पुरूष दोनों कितना बनाव-श्रृँगार करते हैं। मानो होड़ चल रही हो एक-दूसरे से आगे आने की। भले ही इसमें सांस्कृतिक गौरव, गरिमा, शालीनता और भक्ति-भाव पिछड़ जाएँ।
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(दोपहर मेट्रो,भोपाल में 18 अक्टूबर,2023 के अंक में प्रकाशित)

