2.4 जाबालि-राम संवाद: जब अधर्म ने चाहा धर्म को समझाना

2.4 जाबालि-राम संवाद: जब अधर्म ने चाहा धर्म को समझाना

चित्रकूट में जब गुरु वसिष्ठ सहित भरत,शत्रुध्न और माताएँ भी श्रीराम को अयोध्या वापस चलने के लिए मनाने और राम को चौदह वर्ष वन में बिताने के संकल्प से डिगाने में असफल रहे तब लोकायत दर्शन के आचार्य जाबालि सामने आए। लोकायत दर्शन एक भौतिकवादी विचारधारा है जिसके अनुसार इन्द्रियों से अनुभव किए जाने वाले ज्ञान को ही सत्य माना जा सकता है। संसार की जिन वस्तुओं का हमारी ज्ञानेद्रियों के माध्यम से बोध होता है, उसे ही सत्य माना जाना चाहिए। लोकायत या चार्वाक दर्शन के अतिरिक्त अन्य दर्शन अनुमान को भी प्रमाण मानते हैं। लेकिन चार्वाक उसे विश्वसनीय नहीं मानते। लोकायत मत के अनुसार स्थायी/अनश्वर कहे जाने वाले किसी आत्मा-परमात्मा आदि का प्रत्यक्ष नहीं होता इसलिए इनका अस्तित्व नहीं माना जा सकता। चूँकि अनश्वर आत्मा जैसी कोई चीज नहीं होती और स्वर्ग, नर्क और पुनर्जन्म की अवधारणा कपोल कल्पित है इसलिए मरण ही मोक्ष है। इस कारण चार्वाक का उपदेश है कि जब तक जीओ सुख से जीओ, उधार लेकर भी घी पिओ क्योंकि एक बार राख हो जाने के बाद यह शरीर वापस नहीं आ सकता।

आचार्य जाबालि जो इसी मत के प्रवक्ता हैं,वे भी भरत जी के मंडली के साथ ही थे,उन्होंने अपने मत के अनुसार राम को समझाना शुरु किया—हे राघव, आपकी तो पामरजनो जैसी निरर्थक बुद्धि नहीं होनी चाहिए। क्योंकि आप केवल श्रेष्ठ बुद्धि वाले ही नहीं, किन्तु मनस्वी भी हैं।भला सोचिए तो, कौन किसका बन्धु है और कौन किसका बना या बिगाड़ सकता है। प्राणी अकेला ही जन्म लेता है और अकेला ही नष्ट भी होता है।

क: कस्य पुरुषो बन्धु: किमाप्यं कस्य केनचित्।

यदेको जायते जन्तुरेक एव विनश्यति।।

जिस प्रकार कोई मनुष्य अपने गांव से दूसरे गांव को जाता हुआ, कहीं मार्ग में ठहर जाता है और अगले ही दिन उस स्थान को छोड़कर चल देता है। इसी प्रकार माता-पिता,घर और धनादि सम्पत्ति के साथ मनुष्य का थोड़े देर का ही टिकाउ संबंध है। अतएव,सज्जन लोग इसमें आसक्त नहीं होते। इसलिए हे नरोत्तम आप दु:ख देने वाले इस कंटकाकीर्ण मार्ग को छोड़कर अयोध्या वापिस चलिए और अपना अभिषेक करवा कर समृद्ध अयोध्या के राज्य का आनंद उठाइए। जिस तरह इन्द्र अमरावती में विहार करते हैं वैसे ही आप अयोध्या में विहार करें।

न तो दशरथ आपके कोई थे और न आप उनके कोई हैं। दशरथ कोई और थे,आप कोई और हैं। वैसे भी प्राणी के जन्म में पिता तो शुक्राणु का एक कारण मात्र है।क्योंकि ऋतुमति माता के गर्भ में एकत्र हो मिले हुए शुक्राणु और रज ही जीव के जन्म का हेतु है। दशरथ को जहाँ जाना था,वहाँ चले गए। आप वृथा ही इस झूठे संबंध को लेकर पीड़ित होते हैं।

जो लोग प्रत्यक्ष मिलते हुए सुख को त्याग कर आगे सुख मिलने की आशा से कष्ट भोगकर धनोर्पाजन करते हैं और ऐसा करते-करते नष्ट हो जाते हैं,मुझे उन्हीं लोगों के लिए दु:ख होता है औरों के लिए नहीं। उनके लिए भी मुझे दु:ख है, जो धन कमाने के पश्चात् भी उनका उपभोग नहीं कर पाते और नष्ट हो जाते हैं। देखिए, लोग जो अष्टकादि श्राद्धकर्म पितरों के लिए प्रतिवर्ष किया करते हैं,उससे लोग अन्न का कैसा नाश करते हैं। भला कोई मरा हुआ भी कहीं भोजन करता है। हे राम,अन्य उपायों से धन उपार्जन में क्लेश देख, दूसरों का धन हरने के लिए चतुर लोगों ने दान द्वारा लोगों को वश में करने के लिए धर्म ग्रंथों में लिखा है कि यज्ञ करो,दान दो, दीक्षा लो,तप करो,संन्यास लो। अर्थात् लोगों को धोका देकर उनका धन हरण करना ही उन धर्मग्रंथों की रचना का मुख्य उद्देश्य है।

दानसंवनना ह्येते ग्रंथा मेधाविभि: कृता:

यजस्व देहि दीक्षस्व तपस्तप्यस्व सन्त्यज।।

हे महामते; वास्तव में इस लोक के अतिरिक्त परलोक आदि कुछ भी नहीं है।अत: जो सामने है उसे ग्रहण कीजिए और जो प्रत्यक्ष नहीं है, उसे पीठ पीछे कीजिए। प्रत्यक्ष में सुखदायक राज्य को ग्रहण कीजिए और परोक्ष को भुला दीजिए। इसलिए भरत जी आपसे प्रार्थना करते हैं, अत: सर्व जनानुमोदित सज्जनों के मत को स्वीकार कर, राज्य ग्रहण कीजिए।

जाबालि की बातें सुन, सत्यभाव वालों में श्रेष्ठ श्रीराम अपनी अविचल बुद्धि से विचारे हुए, वैदिक धर्म में श्रद्धा उत्पन्न करने वाले वचन बोले। आपने मुझे प्रसन्न करने के लिए जो बाते कहीं, साधारण दृष्टि से देखने पर, न्यायानुमोदित और करने योग्य जान पड़ती हैं। तथापि वे कार्य रूप में परिणत करने के लिए अनुपयुक्त और न्याय मार्ग के विरुद्ध हैं। क्योंकि मर्यादा रहित, पापाचरण से युक्त, चरित्रहीन, साधु सम्मत शास्त्रों के विरुद्ध आचरण करने वाले पुरुष का सज्जनों के समाज में आदर नहीं होता।

कुलीनमकुलीन वा वीरं पुरुषमानिनम्।

चारित्रमेव व्याख्याति शुचिं वा यदि वाअशुचिम्।।

यदि आपके उपदेशानुसार मैं सत्य-प्रतिज्ञ-पालन-हीन वृति का सहारा ले लूँ तो, मैं किस कर्म के द्वारा स्वर्ग प्राप्त करूँगा। जब मैं ही स्वेच्छाचारी हो गया,तब सब लोग अपना मनमाना काम करने लगेंगे। क्योंकि राजा का जैसा आचरण होता है, वैसा ही आचरण प्रजा का भी हो जाता है। देखिए, ऋषि लोग और देवतागण भी सत्य को उत्कृष्ट मानते हैं; क्योंकि सत्यवादी पुरुष को अक्षय ब्रह्मलोक प्राप्त होता है। सत्य से ही ईश्वर की प्राप्ति होती है, सत्य ही से लक्ष्मी,धन-धान्य मिलता है। सत्य ही सब सुखों का मूल है, सत्य से बढ़कर कोई और वस्तु नहीं है जिसका आश्रय लिया जाए।

सत्यमेवेश्वरे लोके सतयं पद्माश्रिता सदा।

सत्यमूलानि सर्वाणि सत्यान्नास्ति परं पदम्।।

दान, यज्ञ, तप और वेद–ये सब सत्य हैं, अतएव सब को सदा सत्य पालन के लिए तैयार रहना चाहिए। इसलिए मैं सत्य का पालन करने की प्रतिज्ञा करके, सत्यप्रतिज्ञ और सदाचारी पिता की सत्य रूप उस आज्ञा का, जिसकी प्रतिज्ञा सत्यतापूर्वक की गई है,पालन क्यों न करूँ। अतएव मैं न तो राज्य पाने के लोभ से, न लोगों के भुलावे में आकर और न अज्ञान से क्रोध के वश में हो, पिता की सत्यरूपी मर्यादा को तोडूँगा, क्योंकि मैं स्वयं सत्यप्रतिज्ञ हूँ।

जो लोग सत्य व्रतधारी हैं, उन्हें केवल राज्य, कीर्ति, यश और धन ही नहीं मिलता, किन्तु मरने पर उन्हें स्वर्ग भी प्राप्त होता है। इसीसे लोगों को सत्य बोलना और सत्य व्यव्हार करना उचित है। श्रीराम ने जाबालि के नास्तिक विचारों की और कई तरह से भर्त्सना की और अपने विचारों पर दृढ़ रहने का संकल्प दोहराया।

राम की इस सत्यप्रतिज्ञा को सुन कर जाबालि बोले–हे राम, मैं नास्तिकों जैसी बात नहीं करता और न मैं स्वयं नास्तिक हूँ। मेरे कहने का न यह अभिप्राय ही है कि परलोक आदि कुछ भी नहीं है। परन्तु समय के प्रभाव में पड़ अथवा समय की आवश्यकतानुसार मैं आस्तिक या नास्तिक हो जाता हूँ। हे राम, यह समय ही ऐसा था कि, मुझे नास्तिकों जैसे वचन कहने पड़े। मैंने यह वचन आपको प्रसन्न करने तथा आपको वन से लौटाने के लिए ही कहे थे।

अध्येताओं के अनुसार जाबालि का वृतान्त निश्चित रूप से प्रक्षिप्त है। क्योंकि राम अयोध्या न लौटने का दृढ़ संकल्प पहले ही व्यक्त कर चुके थे। प्रचलित पाठों में राम के संकल्प के पश्चात् जाबालि लोकायत दर्शन का प्रतिपादन करने लगते हैं। राम जाबालि को प्रत्युत्तर देकर अपना संकल्प फिर से प्रकट करते हैं। यह समस्त १०९ वां सर्ग पश्चिमोत्तर पाठ में नहीं मिलता। संभवत: किसी अन्य रामकथा में भी जबाली-राम- संवाद का प्रसंग नहीं है। किन्तु,आश्चर्य है कि आज अधिकांश लोग चार्वाक के अनुयायी बने हुए हैं और उनका जीवन-दर्शन है “खाओ-पीयो और मौज करो।”

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