
अभिनेता और नेताओं की बात अलग है, जिनका जेल से छूटने पर भव्य स्वागत होता है,भारी भीड़ उन्हें लेने पहुँच जाती है, केमरे चमकने लगते हैं, ढ़ोल-नगाड़े बजने लगते हैं, जयकार के नारे लगने लगते हैं, चेनल वाले बाईट लेने के लिए आगे-पीछे ड़ोलने लगते हैं, विजयी जुलूस निकलता है और फूल बरसने लगते हैं। हार-फूल, मालाओं के ढ़ेर लग जाते हैं,नेता मुस्कराता,सबका अभिवादन स्वीकारता,हाथ हिलाता विजयी भाव चला जाता है। जेल में भी उन्हें घर-बाहर की सभी सुविधाएँ अमूमन मिल ही जाती हैं।
नेताओं-अभिनेताओं की दुनिया में चाहे जो भी हो,पर हक़ीकत की दुनिया में ऐसा कुछ नहीं होता। जेल से रिहा होने वाले कभी किसी बंदी को लेने उसके परिवार के दो-चार लोग भले ही पहुंँच जाएँ, अन्यथा तो दुनिया की कठोर सच्चाई का सामना करने के लिए वह अकेला ही होता है। खासकर लम्बी सजा भुगत कर बाहर आए बंदी को एक नई दुनिया का सामना करना पड़ता है।क्योंकि उसकी जानी-पहचानी दुनिया तब तक बदल चुकी होती है। उसे हर जगह उपेक्षा और तिरस्कार का सामना करना पड़ता है। ज्यादातर मामलों में उसकी सम्पत्ति खुर्द-बुर्द हो चुकी होती है। उसे काम-धँधा ढूँढ़ने में भारी मुश्किल होती है। कोई उस पर यकीन नहीं करता। घर में भी उसे कोई अपनापन नहीं मिलता। तब उसे लगता है कि इससे तो अँदर की दुनिया अच्छी थी। हालांकि,तमाम तरह की बंदिशें थीं,पर रहने, ओढ़े-बिछाने, खाने-पीने, दवा-दारू जैसी जरूरी बातों का मुक्कमल इंतजाम तो था। जबकि बाहर तो हर बातों के लिए ठोकरें खाना पड़ती हैं।
जाने-माने फिल्मकार बिमलराय की एक प्रसिद्ध फिल्म “बंदिनी” में जेलर जब एक बंदिनी कल्याणी (नूतन)से कहता है कि उसे रिहा किया जा रहा है,तब कल्याणी कहती है “पर रिहा होने के बाद मैं जाऊँगी कहाँ, मेरा तो इस दुनिया में कोई भी नहीं है।” तब मानो वह न सिर्फ खुद की ही नहीं वरन उन तमाम बंदी महिलाओं की व्यथा भी बता रही होती है,जो किसी वजह सेे जेल में बंद हैं। क्योंकि उन्हें मालूम होता है कि अब उनका अपना घर भी पराया जैसा हो जाएगा। जहाँ उसे दम-कदम पर घोर अपमान, उपेक्षा और निरादर का सामना करना पड़ेगा। जीवन भर उसे ताने सुनने होंगे और उसे लांछित जीवन जीना होगा।
जेल से छूटने वाले कैदियों को अपने पैरों पर खड़े हो सकने के लायक बनाने के लिए समाजशास्त्रियों ने एक हल तो ये बताया है कि जेलों में उन्हें हुनरमंद बनाया जाए, ताकि बाहर निकलकर अपने हुनर के भरोसे अपनी जिंदगी गुजार सकें। कई जेलों में ऐसे इंतजाम हैं भी। जहाँ कैदियों को कई तरह के हुनर सिखाए जाते हैं और उनके काम का निश्चित मुआवजा भी दिया जाता है। पर हर जेल में ऐसी सुविधा नहीं है। इसकी एक वजह यह है कि हमारी जेलों में अक्सर भीड़-भाड़ होती है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आँकड़े बताते हैं कि जेलों में क्षमता से अधिक कैदी रखे जा रहे हैं। देश की सभी 1382 जेलों में कुल मिलाकर 3 लाख 32 हजार 782 लोगों को रखने की क्षमता है,जबकि एनसीआरबी की रिपोर्ट के अनुसार 4 लाख 11 हजार से ज्यादा लोग बंद हैं। अर्थात् 114.4 प्रतिशत। जबकि,मध्यप्रदेश की भी 123 जेलों में एनसीआरबी के अनुसार 2015 में 27 हजार 507 बंदियों को रखने की गुंजाईश है और 38 हजार 458 कैदी रखे गए हैं।
हमारे यहाँ स्कूल,अस्पताल और जेल ऐसी जगहे हैं जहाँ भर्ती से मना नहीं किया जा सकता। चाहे उनमें क्षमता हो न हो। जाहिर है,जहाँ ज्यादा भीड़ होगी वहाँ संसाधनों की कमी पड़ेगी ही और लोगों को कठिनाईयों का सामना करना पड़ेगा। फिर जेल यदि कोई यंत्रणागृह नहीं तो कम से कम पिकनिक मनाने की कोई जगह भी नहीं हैं,जहाँ किसी तरह की कठिनाईयाँ न हों।एनसीआरबी के मुताबिक जेलों में बंद कुल बंदियों में से 67.6 बंदी ऐसे हैं जिनके मामले अदालतों में विचाराधीन हैं। इनमें से ज्यादातर ऐसे हैं,जिन पर बहुत मामूली आरोप हैं । गरीबी के कारण वे अपनी जमानत तक नहीं करा पा रहे हैं। ऐसे कैदियों के लिए कोई विशेष प्रावधान किए जाने चाहिए,ताकि वे छूट सकें।यह भी जरूरी है कि जजों के खाली पदों को भरा जाए, ताकि मुकदमों का निपटारा जल्दी से जल्दी हो सके। यद्यपि, मान. सुप्रीम कोर्ट ने कहा भी है कि विचाराधीन बंदियों क़ी जमानत को सामान्य प्रक्रिया समझा जाना चाहिए।
वास्तव में एक सभ्य समाज में जेलों का उद्देश्य किसी अपराधी को उसके अपराध के लिए दंड़ित करने के साथ उसे स्वयं में सुधार लाने का अवसर देना भी होता है।जेल सुधारों से यह कह कर मुँह नहीं मोड़ा जा सकता है कि उनमें समाज के अपराधी रहते हैं।
