1.17 तपस्वी,मनस्वी,यशस्वी,थे ऋषि…..!

1.17 तपस्वी,मनस्वी,यशस्वी,थे ऋषि…..!

रावण की त्रैलोक्य विजय -22 @

आर्य और अनार्य, मात्र “दो “शब्द नहीं। दो संस्कृतियों का प्रतिनिधित्व करने वाले उत्कृष्ट और निकृष्ट विचार हैं। मन और मष्तिस्क से पवित्र, उत्कृष्ट पक्ष प्रकृति,मनुष्य और जीवन मात्र से प्रेम करता था।और निकृष्ट पक्ष पशुओं को तो छोडिंये ,मनुष्यों तक को मार कर, भूनकर और रांधकर भक्षण कर जाता था।

प्रकृति पोषक ऋषि,महर्षि और सबसे सर्वोच्च मुनि गण मात्र जल लेकर ही मानव कल्याण और आत्मोत्सर्ग के लिये कठोर से कठोर तप किया करते थे। ऐसा भी होता था कि

कभी कभी तो यह तपस्वी मात्र वायु पीकर ही रह जाते थे। उत्तर में हिमालय की पावन धरा,विज्ञान और शोध की केन्द्र भूमि थी। हिमालय क्षेत्र में ही महान ऋषियों के पवित्र आश्रम थे। आश्रम से अधिक यह दिव्य और देवास्त्रों के शोध स्थान थे।आर्यों के विज्ञान का आधार मन और मष्तिस्क था।वे किसी खोखली

वस्तु में मात्र बारूद भरकर शतघ्नी की तरह उपयोग नहीं करते थे। वे तो मन की मारक क्षमता को विकसित करने में लगे रहते थे।

पुष्पक विमान मन से संचालित होता था। महान सुदर्शन चक्र का भी नेत्र मूंद कर मंत्र द्वारा आव्हान किया जाता था। यह दोनों यंत्र मन की गति से चलते थे। सुदर्शन चक्र परिणाम मूलक था। ब्रह्मास्त्र,और नारायणास्त्र जैसे देवास्त्र भी अति प्रभावी थे। अनार्यों के पास लोकास्त्रों, भाले, बरछी, परिघि, मौसल, गदा आदि ,होते।बाद में शिव और ब्रह्मा की मान मनौवल करके उन्होंने भी कुछ देवास्त्र प्राप्त कर लिये थे। देवास्त्र क्या होता था। उसका आव्हान और सटीक संचालन कैसे किया जाता था। तात्कालिक कौन,कौन से ऋषि थे, वे इस विज्ञान के सृजनहार थे। यह उच्च विज्ञान किन उच्च पर्वतों की सीमाओं में मर्यादित था।

आर्यावर्त के दक्षिण में स्थित महान ऊंचा पर्वत विंध्य एक सीमा थी।जबकि उत्तर में विश्व का सबसे उन्नत पर्वत हिमालय।इन्हीं, दो पर्वतों के गौरव शाली भूभाग में कुरूक्षेत्र,पुष्करावर्त,कुशावर्त और ब्रह्मावर्त जैसे पुण्य भू भाग थे।सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात तो यह कि हमारी इस वैज्ञानिक संपत्ति की दाता प्रदाता और जन्मदाता तब के महान ऋषि बाल्मीकि,अगस्त्य,वशिष्ठ ,दुर्वाशा और विश्वामित्र नामधारी पीठ थीं। इंद्र जनक और परशुराम नामधारी पद हुआ करते थे । महान ऋषि बाल्मीकी को ही लें.. तब के पौराणिक इतिहास में छह बाल्मीकि मिलते है -शुक्राचार्य (उशनि बाल्मीकी), च्यवन बाल्मीकी, प्राचेतस, सुपर्ण, ऋष और रत्नाकर नामधारी बाल्मीकि।और यह सब भृगु ब्राह्मण थे।

आर्यों में मन और मष्तिस्क की पवित्रता पर कितना बल दिया जाता रहा होगा। वे देवास्त्र भी मन से ही संचालित करते थे। यहां हम ज्ञान, प्रज्ञान और विज्ञान का अंतर भी समझ लें।ज्ञान को विज्ञान में परिणित करने के लिये प्रज्ञान का उपयोग करना पड़ता है। प्रज्ञान हमारा शरीर है। कंठ से पांव तक। विज्ञान हमारे मस्तिष्क में है, जिसको हम परमेष्ठिमंडल कहते हैं। विश्व का ज्ञान तो परमेष्ठिमंडल में ही है। मष्तिस्क कहता है कि हाथ उठाओ,, आप हाथ उठा लेंगे। किंतु हाथ कभी मष्तिस्क से कुछ कह सकता है ।

युद्धों में लोकास्त्र (हथियारों) का उपयोग, मारकर, फेंककर और फिर दोबारा भी उठाकर किया जा सकता है। परन्तु दिव्यास्त्र और देवास्त्र मन और मस्तिष्क की अनुमति के बिना संचालित ही नहीं हो सकते। देखिये धनुष और बाण का संचालन। कोई भी योद्धा धनुष और बाण चला लेता था। किंतु पारंगत तो श्रीराम और श्री लक्ष्मण ही थे।महाभारत के समय श्रीकृष्ण, अर्जुन,अश्वत्थामा,उद्वव,सात्यिकी दुर्योधन, कर्ण और भीम ही कुशल थे। और अन्य सब योद्धा तो धनुष संचालन में प्रवीण नहीं थे। मन की शक्ति का विज्ञान बहुत सरल है। धनुष चलाने में सामान्य शक्ति लगती है। किंतु उस बाण को दूरस्थ गंतव्य तक पहुंचाने के लिये हाथ को अतिरिक्त शक्ति चाहिये। जो सिर्फ मन ही दे सकता है। हमारे ध्यान का एकाग्र होना आवश्यक है । हनुमान जी ने लंकिंनी को जो मुक्का मारा था, वह भी तो मन की संचित शक्ति ही थी। और भी सरल भाषा में ले लें। श्रीराम जब वन में गये थे,अपने साथ कुछ लेकर तो नहीं गये थे…! … परन्तु दृढ़ इच्छा शक्ति से उन्होंने विशाल सेना तैयार करली, समुद्र में सेतु बना लिया और त्रैलोक्य विजयी रावण का वध करने में सफलता भी प्राप्त करली।

इतना अवश्य है कि पर हितार्थ कुछ करने के लिए ह्रदय की पवित्रता चाहिये। ऋषियों के विज्ञान का एक उदाहरण और देखें । वे कितने त्रिकालदर्शी,होते थे।अपने यज्ञ की सुरक्षा हेतु विश्वामित्र जब श्रीराम को लेने दशरथ के पास पहुंचे। उन्होंने पूरे आत्म विश्वास (गारंटी) से एक …! बात कही —

‘ त्रयाणामपि लोकानां येन ख्यातिं गमष्यति ।

न च तौ राममासाद्य शक्तो स्थातुं अकंचन।। ‘

अर्थात, राम और लक्ष्मण को इतना श्रेय मिलेगा कि ये तीनों लोकों में विख्यात हो जायेंगे। और जब वे दोनों भाइयों को लेकर सिद्धाश्रम के लिए चले तो दूरदृष्टा ब्रह्मर्षि ने सरयू पार होते ही उन्हें सर्वोत्कृष्ट देवास्त्र और दिव्यास्त्रों का ज्ञान देना प्रारंभ कर दिया। विपत्ति और भूख की स्थिति में निर्वाह करने के लिये भी

बला और अतिबला नामकी विद्या सिखाई। समाज की उपेक्षित महिलाओं के सम्मान हेतु अलग थलग बहिष्कृत स्थिति में रह रही अहल्या से मिलवाने ले गये। फिर सीता (गर्भ) बचपन में ही त्यागी गई और राजा जनक को हल चलाते हुए भूमि से प्राप्त संतान से विवाह कराने भी श्रीराम को मिथिला ले गये। मानों श्रीराम के लिये भविष्य की कोई भूमिका तैयार कर रहे हैं। आश्चर्य… अरे…! भाई जिस राजा के वृद्धावस्था में बमुश्किल से संतान हुई। आपने उसके अरमानों को भी नही समझा। सीधे विवाह कराने ल चले। फिर पिता को सूचना कि बारात ले आओ। वाह रे ब्रह्मर्षि…..! अभी यह चर्चा अधूरी ही है। किंतु आज बस यहीं तक। तो मिलते हैं कल प्रातः। इसी समय। तब तक विदा। धन्यवाद।

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