8.23 कृष्ण भक्ति में लीन संत “आण्ड़ाल”

8.23 कृष्ण भक्ति में लीन संत “आण्ड़ाल”

आज भगवान कृष्ण के प्रकटोत्सव के अवसर उन महिला संतों को याद करने की इच्छा हो रही है,जिन्होंने अपना सारा जीवन अपने आराध्य श्रीकृष्ण को समर्पित कर दिया और उनमें ही विलीन हो गईं।एक का नाम तो हमें सहजता से याद आ जाएगा,जिनके कृष्ण प्रेम में पगे पद हम प्राय: सुनते रहते हैं।जी,वे मीराबाई हैं,जो भक्तिकाल की प्रमुख संत कवियित्री थीं।किंतु,उनके भी कई सौ साल पहले भी दक्षिण भारत में एक और मीरा हो गई हैं,जोकि कृष्ण की परम भक्त थीं।उनका नाम ‘आँडाल’ था।

दक्षिण भारत में कावेरी नदी के तट पर एक गांव में महान वैष्णव विष्णुचित्त हुए जिन्हें पेरि-आलवार कहा जाता है ।

एक दिन प्रात:काल जब वह तुलसी वन सींच रहे थे, तुलसी क्यारी में उन्हें एक सुन्दर नवजात कन्या दिखाई दी । उन्होंने कन्या को भगवान नारायण के चरणों के रखकर कहा—‘प्रभो ! यह तुम्हारी सम्पत्ति है, तुम्हारी ही सेवा के लिए यह आई है, इसे अपने चरणकमलों में स्थान दो ।’तब

मूर्ति से आवाज आई—‘इस लड़की का नाम ‘कोदई’ रखो और अपनी पुत्री की तरह इसका पालन करो ।’कोदई या गोदा का अर्थ है—फूलों के हार के समान कमनीय । इसी कोदई को जब आगे चलकर भगवान श्रीरंगनाथ ने अपनाया तो ये ‘रंगनायकी’ व ‘आण्डाल’ के नाम से जानी गयीं।जब वह कन्या बोलने लगी, तब उसके मुख से ‘विष्णु’ के अतिरिक्त कोई दूसरा नाम निकलता ही नहीं था । बड़ी होने पर वह भगवान के भजन गाते हुए फूलों के हार गूंथती । विष्णुचित्त उसकी बनायी माला लेकर भगवान श्रीरंगनाथ को चढ़ा आते।

बड़ी होने पर आण्डाल भगवान रंगनाथ को अपने पति के रूप में भजने लगी । भगवान के प्रेम में वह इतनी सुधबुध खो देती कि भगवान के लिए गूंथे हुए हार को स्वयं पहनकर दर्पण के सामने खड़ी हो जाती और अपनी सुन्दरता की प्रशंसा करते हुए कहती—‘क्या मेरा सौंदर्य मेरे प्रियतम को आकर्षित कर सकेगा ?’ आण्डाल भगवान के प्रेम में खोई रहती ।

एक दिन मन्दिर के पुजारी ने विष्णुचित्त को यह कहकर माला लौटा दी कि यह मुरझाई हुई है और इसे किसी ने पहना है। यह सुनकर विष्णुचित्त को बहुत दु:ख हुआ । दूसरे दिन भी पुजारी ने विष्णुचित्त से कहा कि तुम्हारी माला कुछ मुरझायी हुई है । विष्णुचित्त ने सोचा जरुर इसमें कुछ रहस्य है । जब वे इसका कारण ढूंढ़ने में लगे थे, तभी उनकी दृष्टि परदे के पीछे खड़ी आण्डाल पर पड़ी जो भगवान के लिए बनाए गए हार को पहनकर दर्पण के सामने खड़ी होकर भगवान से बातें कर रही थी । वे चिल्ला कर बोले—‘अरे तू बावली तो नहीं हो गयी है जो भगवान के लिए बनाए गए हारों को स्वयं पहन रही है ।पर आण्डाल तो अपने आप को भगवान के चरणों में पूर्ण समर्पित कर चुकी थी ।

रात्रि में भगवान रंगनाथ ने विष्णुचित्त को स्वप्न में आदेश दिया—मुझे कोदई की पहनी हुई माला धारण करने में विशेष प्रसन्नता होती है, इसलिए तुम मुझे वही हार चढ़ाया करो ।

विष्णुचित्त को आण्डाल का भगवान के प्रति निश्चल प्रेम समझ आ गया । अब वे उसकी धारण की गयीं मालाओं को ही भगवान को निवेदन करने लगे । धीरे-धीरे आण्डाल को भगवान का वियोग असह्य हो गया । उसकी आंखों में, हृदय में, प्राणों में, रोम-रोम में श्रीरंगनाथजी ही छाए हुए थे ।आण्डाल की मधुर भाव की उपासना चरम पर पहुंच गयी । वह सदा अपनी सुध-बुध भूल जाती। एक दिन जब उसकी विरह-व्यथा असीम हो गयी, तब भगवान रंगनाथ ने मन्दिर के पुजारियों व विष्णुचित्त को स्वप्न में दर्शन देकर कहा—‘मेरी प्रियतमा आण्डाल को मेरे पास ले आओ, मैं उसका पाणिग्रहण करुंगा ।’ दूसरे दिन मन्दिर से आण्डाल व विष्णुचित्त को लेने के लिए पालकियां आईं । शंख-ध्वनि होने लगी, ढोल बजने लगे।प्रेम में मगन होकर जैसे ही आण्डाल ने मन्दिर में प्रवेश किया, वह भगवान की शेषशय्या पर चढ़ गयी । चारों ओर दिव्य प्रकाश फैल गया और लोगों के देखते-ही-देखते आण्डाल सबके सामने भगवान श्रीरंगनाथ में विलीन हो गयी । तब से उन्हें रंगनायिकी के नाम से याद किया जाने लगा।दक्षिण के वैष्णव मन्दिरों में आज भी भगवान रंगनाथ और रंगनायकी के विवाह का उत्सव हर साल मनाया जाता है ।

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