कहावत है कि मुसीबत कभी अकेले नहीं आती,जब भी आती है,अपने संगी-साथियों के साथ आती है।पर जो कोई इनका सामना धीरज और साहस से करता है तो उसे इनमें से ही उसे आगे का रास्ता मिल जाता है।श्रीराम के साथ भी ऐसा ही कुछ हो रहा था।सीता हरण और जटायु के मरण के बाद वन में दुखी मन वे अभी दो-तीन कोस आगे बढ़े ही थे कि एक नया संकट सामने आ कर खड़ा हो गया।पहाड़ जैसा विशाल और विचित्र प्राणी, जिसका न सिर था न पैर।उसका सिर उसके पेट में बना था।उसकी भुजाएँ विशाल थीं,जिनसे वह वन्य पशुओं को पकड़ कर खा जाया करता था।कबंध नाम के इस प्राणी ने वनवासी राम और लक्ष्मण को भी किचकिचा कर पकड लिया।इस संकट से श्रीराम तो अपनी धीरता और वीरता के कारण नहीं घबराए,पर लक्ष्मण बालक होने के कारण पकड़े जाने से घबरा गए और बोले कि हे वीर,देखो तो मैं इस राक्षस के फँदे में फँस गया हूँ।इसलिए अब आप इस राक्षस को मेरी बलि देकर और अपने को छुड़ा कर सुखपूर्वक चले जाईए।हे भाई, मुझे विश्वास है कि आपको सीता मिलेगी।आप पुरखों का राज पाकर और सिंहासन पर बैठ कर मुझे सदा याद करते रहिए, भूल मत जाईएगा।
“तत्र मां राम राजस्य स्मर्तुमर्हसि सर्वदा।
लक्ष्मणे नैव मुक्तस्तु राम: सौमित्रिम् ब्रवीत।।
तब रामचंद्र बोले-हे वीर,भयभीत मत हो।क्योंकि तुम जैसे वीर और पराक्रमी पुरुष को इस तरह घबराना उचित नहीं है।तब कबंध ने उन दोनों का परिचय और आने का कारण पूछा और खाने को तत्पर हुआ।तब राम और लक्ष्मण ने उसकी भुजाएँ कंधे से काट डालीं।वह गर्जना करते हुए पृथ्वी पर गिर पड़ा।अपनी व्यथा-कथा कहने और परिचय देने के बाद लक्ष्मण ने उससे पूछा कि तुम कौन हो।
वाल्मीकि रामायण में यह प्रसंग अधिक विस्तार से मिलता है।भूमि पर गिर जाने पर कबंध ने अपने दो शापों का वर्णन किया है।पहले के अनुसार वह था तो बहुत सुंदर,किन्तु ऋषियों को डराने के लिए अत्यंत भयानक रूप धारण कर लिया करता था।एक बार उसने स्थूलशिरा पर आक्रमण किया था,जिस पर मुनि ने यह शाप दिया कि तुम भयंकर रूप धारण किए रहो।किन्तु,शापमुक्ति के लिए उसकी प्रार्थना करने पर ऋषि ने कहा कि जब राम तुम्हारी भुजाएँ काट कर तुम्हारा स्थूल शरीर जला देंगे तभी तुम अपना शुभ रूप फिर से धारण कर सकोगे।दूसरी कथा के अनुसार वह दनु का सुंदर पुत्र था,जिसने उग्र तप करके ब्रह्मा से दीर्घायु होने का वर प्राप्त किया था और इस वर के बल पर उसने इन्द्र को चुनौती दी थी।इन्द्र ने उसके हाथ-पैर काट दिए और सिर पर वज्र मारा जिससे उसका सिर उदर में धँस गया।ब्रह्मा के वरदान को सत्य प्रमाणित करने के लिए इन्द्र ने उसे एक योजन लम्बी भुजाएँ देकर और उदर में मुँह बनाकर आश्वासन दिया कि राम-लक्ष्मण द्वारा तुम्हारी भुजाएँ काट देने पर तुम स्वर्ग प्राप्त करोगे।बाद में राम-लक्ष्मण ने उसका शरीर जला दिया और चिता में से एक दिव्य पुरुष उत्पन्न हुआ और वह आकाश में विराजमान होकर वह बोला-हे राम,तुम सुग्रीव के पास जाओ,वह ऋष्यमूक पर्वत पर निवास करता है जो पम्पा सरोवर के पास है।वह वानरों का राजा सुग्रीव बड़ा बलवान, तेजस्वी,अमित प्रभा वाला,सत्य प्रतिज्ञ,विनीत,धैर्यवान, बहुत बुद्धिमान और इच्छारूप धारी है।इस समय उसे भी आपके सहायता की आवश्यता है,आप उससे मित्रता करो।वह सीता जी को ढूँढ़ने में आपकी सहायता करेगा।साथ ही उस दिव्य पुरुष ने राम को पम्पा सरोवर और ऋष्यमूक पर्वत का मार्ग बताकर स्वर्ग की ओर प्रस्थान किया।
महाभारत के रामोपाख्यान में भुजाएँ कट जाने पर कबंध भूमि पर गिर गया और उसके शरीर से तत्काल एक दिव्य पुरुष उत्पन्न हुआ जिसने आकाश में स्थित होकर अपना परिचय इस तरह दिया–मैं विश्वावसु नाम का गंधर्व हूँ जो ब्राह्मण के शाप से राक्षस बन गया था।उसने यह भी बताया कि रावण ने सीता का हरण किया है और सुग्रीव के पास जाने का परामर्श दिया।
अध्यात्म रामायण और आनंद रामायण के अनुसार कबंध ‘रूप-यौवन-दर्पित’ गंधर्वराज था,जिसने ब्रह्मा से अवध्यता का वर प्राप्त किया था।बाद में उसने अष्टावक्र मुनि का उपहास किया और उनके शाप से राक्षस बन गया।इस कथा के अनुसार कबंध के राक्षस बनने के बाद ही इन्द्र ने उसके सिर पर वज्र मारा था,जिससे उसके सिर और पैर पेट में घुस गए थे।उसके शरीर के जल जाने के बाद उसमें से एक दिव्य पुरुष उत्पन्न हुआ,जिसने राम को परब्रह्म परमात्मा के रूप में जानकर उनकी स्तुति की।राम ने उसकी भक्ति से संतुष्ट होकर उसे अपने परम-धाम को भेज दिया।अंत में उसने राम को शबरी के पास जाने का परामर्श दिया और विष्णुलोक के लिए प्रस्थान किया।
रामचंद्रिका के अनुसार वह पहले इन्द्र के शाप से राक्षस बन गया था तथा बाद में इन्द्र से उसका युद्ध हुआ था।इन्द्र ने उससे कहा था कि श्रीराम द्वारा उसका उद्धार हो सकेगा।रामचरित मानस में माना गया है कि दुर्वासा ने कबंध को शाप दिया था और राम के चरणों के दर्शन से वह शापमुक्त हुआ।राम ने कबंध को ब्राह्मणों की सेवा का महत्व समझा कर परमपद प्रदान किया।
‘सुनु गंधर्व कहऊँ मैं तोही।
मोहि न सोहाई ब्रह्मकुल द्रोही।।
कहि निज धर्म ताहि समुझावा।
निज पद प्रीति देखि मन भावा।।
रघुपति चरन कमल सिरु नाई।
गयऊ गगन आपनि गति पाई।।

