एक समय में हिंदी जगत की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘दिनमान’ के संपादक रघुवीर सहाय हुआ करते थे। तब दिनमान ने एक नई ऊँचाई को छुआ था। इस पत्रिका को खरीदना और पढ़ना बुद्धिमान और सुरुचिपूर्ण पाठक होने की निशानी मानी जाती थी। पाठकों की सहभागिता बढ़ाने के लिए पत्रिका प्राय: नए प्रयोग किया करती थी। इसी सिलसिले में रघुवीर सहाय जी ने एक प्रतियोगिता शुरू की थी, जिसमें पाठकों को एक विषय दिया जाता था। उस विषय पर दो-ढ़ाई सौ शब्दों में विचार आमंत्रित किए जाते थे। एक बार एक विषय दिया गया था ” यदि कुछ दिन के लिए आपको किसी जानवर के साथ एकांतवास करना पड़े तो आप किसके साथ रहना पसंद करेंगे।” इस विषय पर पत्रिका को ढ़ेरों (513) पत्र प्राप्त हुए। तब इस प्रतियोगिता में मेरा पत्र प्रथम चुना गया था और एक सौ एक रुपए का पुरस्कार भी दिया गया था। यह मेरे लिए बहुत उत्साह और गौरव बढ़ाने वाली बात थी। क्योंकि उन दिनों दिनमान में छपना बहुत बड़ी बात मानी जाती थी। साथ ही उस सस्ते जमाने में पुरस्कार राशि भी कुछ कम न थी।
‘दिनमान’ के चयनकर्ताओं ने पत्र को प्रथम चुनने का कारण बताते हुए लिखा था कि लेखक ने एक अलग शैली में बहुत दिलचस्प और रोमांचक तरीके से इसे लिखा है और पत्र के अंतिम शब्द तक रहस्य बरकरार रखा है। इसलिए यह पत्र प्रथम पुरस्कार के योग्य पाया गया।
धन्यवाद, दिनमान और रघुवीर सहाय साहब। जिससे मुझे लिखते रहने के लिए प्रोत्साहन मिला और यह सिलसिला आज भी जारी है।
उक्त पत्र की छाया नीचे प्रस्तुत है। चूँकि, प्रिंट बहुत धुंधला पड़ गया है, इसलिए इसका मूलपाठ भी संलग्न है।
(मूलपाठ– वैसे तो मुझे किसी का भी साथ पसंद नहीं,क्योंकि मैं स्वयँ के प्रति ही आश्वस्त नहीं कि मैं किसी का भी साथ दे भी पाऊँगा या नहीं, किन्तु, फिर भी मेरे लिए किसी जानवर की संगति अनिवार्य ही हो जाए तो मैं किसी ऐसे जानवर को चुनना अधिक पसंद करूँगा, जिसमें, मुझ में और उस में कुछ स्वभाव साम्यता हो। जिसके होने से मुझे कोई परेशानी न हो, और मेरी लापरवाही से वह कुछ तकलीफ (यदि कुछ हो भी तो) महसूस न करे। मैं अनावश्यक भीड़-भाड़ के अलग रहना पसंद करता हूँ। इसलिए मुझे ऐसा ही जानवर पसंद आएगा, जो एकांतप्रिय हो और अपने सिर पर दुनिया भर की चिंता लादने का यत्न न करे।
मुझे श्वेत रंग अधिक प्रिय है, मेरे विचार में यह रंग पवित्रता, शुचिता और शाँति का प्रतीक है, अत: मेरा श्वेतवर्णी जानवर के प्रति आसक्त होना स्वाभाविक है। मैं शुद्ध शाकाहारी हूँ, इसलिए अपने साथी (जानवर) का माँसाहारी होना मुझे कदापि पसंद नहीं होगा।
मुझे ऐसा जानवर अधिक पसंद आएगा जो कि छोटी-मोटी बातों की, मानापमान की चिंता न करे। जो अपना कार्य कर्तव्य-भावना से करे, रूखी-सूखी खा कर भी संतोष करे, साथ ही जो सौम्य व शालीन स्वभाव वाला हो। जिसे मैं समय असमय भार वाहक भी बना सकूँ, इच्छा होने पर कभी-कभी सवारी भी कर सकूँ, किंतु फिर भी जो मुझ जैसे नौसिखिए के लिए खतरनाक न हो, और अपनी निश्चित गति से,मार्ग के प्रलोभनों से बचता हुआ, अपनी मंजिल तक पहुँच जाए, साथ ही जिसमें यह विशेषता भी हो कि सवारी का आनंद प्राप्त करने के लिए न रास थामना पड़े और न ऐड़ लगाना पड़े।
मुझे स्वयं में लीन रहना पसंद है। मैं न तो किसी के काम में बाधा डालता हूँ और न मुझे यह पसंद है कि कोई मेरे काम में टाँग अड़ाए। यदि मुझे किसी का काम करना पड़ ही जाए तो मैं बिल्कुल नि:संगता से, निष्काम व निर्लिप्त भाव से करता हूँ। उसके बदले मैं न धन्यवाद लेना पसंद करता हूँ और न ही आलोचना सुनना। इसलिए मैं अपना साथी (जानवर) चुनने में ऐसी सावधानी बरतूँगा, जिसमें उपरोक्त गुण हों। यद्यपि यह हो सकता है कि मेरे कुछ जान-पहचान वाले मेरी पसंदगी से खुश न हों, वे मेरी आलोचना करें, मुझ पर व्यंग करें, यहाँ तक कि यह भी हो सकता है वे मुझ पर उस जानवर का नाम अभिरोपित करने का प्रयत्न करें, किन्तु, मैं ऐसी बातों से विचलित होने वाला नहीं, क्योंकि मैंने अपने साथी के समान (जो कि मैं चुनूँगा) अपनी आदतें बना ली हैं।
शायद अभी तक आपके ध्यान में नहीं आया होगा कि वह मेरे ख्यालों का साथी कौन है, किन्तु वह और कोई नहीं, वह है आपका चिरपरिचित, आपका ही “——“।
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शासकीय महाविद्यालय, खरगोन, म.प्र.
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दिनमान, 21 सितम्बर,1975 ।

