“फँसून गेलो रे मामा”

“फँसून गेलो रे मामा”

आपके आसपास कभी-कभी कुछ ऐसी घटनाएँ घट जाती हैं, जिनके याद आने पर आपके चेहरे पर मुस्कान तैर जाती है। हमारे देखने में भी कुछ समय पहले एक ऐसा ही प्रसंग आया था।

किस्सा कुछ यूँ था कि पहले दिन मदुराई घूमने और मीनाक्षी मंदिर के दर्शन करने के बाद दूसरे दिन टूर एंड़़ ट्रेवल्स के जरिए हम लोगों को रामेश्वरम और कन्याकुमारी जाना था। ट्रेवल एजेंट ने समझा दिया था कि हमारी गाड़ी सुबह दस बजे रामेश्वर के लिए रवाना होगी। सुबह का ब्रेकफास्ट यहाँ और लंच रामेश्वरम में हमारी ओर से रहेगा। दूसरे दिन प्रवासी लोग सुबह से तैयार होकर ब्रेकफास्ट लेकर गाड़ी की राह देखने लगे। थोड़ी देर में गाड़ी आ गई, जिसमें लोग सामान सहित लद गए।

सफर चूँकि चार घंटे का था, इसलिए ड्रायवर ने दो घंटे बाद गाड़ी एक होटल के सामने रोकी और सबसे बोला, जिसको भी नाश्ता, चाय-पानी करना हो वो यहाँ कर ले। जिन्हें चाय वगैरह कुछ लेना था, उन्होंने लिया और वापस गाड़ी में बैठ गए। हमारे बीच पांच लोगों का एक परिवार भी था। उन्होंने समझा कि यहाँ का खाना-पीना भी ट्रेवल्स वाले की ओर से है। इसलिए उन्होंने तरह-तरह के ढ़ेर सारे आयट्म्स बुला लिए और जमकर खाया। जब चलने लगे तो होटल वाले ने उन्हें लम्बा-चौड़ा बिल थमा दिया, जिसे देखकर वे सकते में आ गए। वे कहने लगे हम क्यों दें, ट्रेवल वाला देगा। होटल वाला बोला, आपने खाया है, आपको ही देना पड़ेगा। वे बोले हमने तो ड्रायवर के कहने पर खाया। उसी ने तो बोला था, जिसे भी चाय-पानी,नाश्ता वगैरह करना हो वो यहाँ कर ले। ड्रायवर ने जब पेमेंट की बात सुनी तो उसने हाथ खड़े कर दिए। वह बोला हम क्यों देंगे, मैंने यह थोड़ी ही बोला था कि यह ट्रेवल वाले की ओर से है। आप लोग तो टूट ही पड़े थे खारे-मीठे पर। ट्रेवल वाले ने अपनी ओर से रामेश्वरम में लंच रखा है। वहाँ जाकर आप आराम से लंच ले सकते हैं। यहाँ तो पेमेंट आपको ही करना पड़ेगा। और लोग भी चाय-पानी करके अपना बिल चुकाकर चले गए। आखिरकार बहुत झिकझिक करते हुए उन्होंने बिल का पैसा चुकाया। तब उनमें से एक बोल पड़ा “फँसून गेलो रे मामा”। उनकी बात सुनकर सभी लोग खिलखिलाकर हँस पड़े। पर वे रास्ते भर बड़बड़ाते रहे-हमें क्या पता था कि नाश्ते के पैसे ट्रेवल वाला नहीं देगा। नहीं तो हम इतना खाते ही नहीं।

रामेश्वरम में लंच के समय जब सब लोग लंच ले रहे थे, वो सारा परिवार लंच नहीं कर पाने का अफसोस मना रहा था। क्योंकि, पेट में खाने की जगह ही नहीं बची थी। इसीलिए कहा गया है “माले मुफ्त,दिले बेरहम” नहीं बनना चाहिए।

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