6.10 लक्ष्मण का संयम- जो मेघनाथ की मृत्यु का कारण बना.

6.10 लक्ष्मण का संयम- जो मेघनाथ की मृत्यु का कारण बना.

श्रीराम हम पर भले ही अकारण कृपा कर दें,पर हम बिना मतलब के उन्हें याद नहीं करते।उनके समय में भी ऐसे पात्र कम ही थे,जो नि:स्वार्थ सेवा की भावना से उनसे जुड़े रहे हों।ऐसे पात्रों में एक तो मारुतिनंदन हनुमान का नाम याद आता है,दूसरा सुमित्रानंदन लक्ष्मण का।राम-कथाओं में हनुमानजी काफी बाद में राम के निकट आते हैं,पर लक्ष्मण जी तो बचपन से ही उनके साथ छाया जैसे जुड़े रहे।मानस ने लक्ष्मण जी के यश को ऐसा सबल दंड़ बताया है जिस पर श्रीराम की कीर्तिरूपी विमल पताका फहरा सकी।

रघुपति कीरति बिमल पताका।

दंड समान भयहु जस जाका।।

रामकथाओं के अनुसार लक्ष्मण और शत्रुघ्न का जन्म क्रमश: राम और भरत का साथ निभाने के लिए ही हुआ था।वाल्मीकि रामायण में एक ओर राम-लक्ष्मण और दूसरी ओर भरत-शत्रुघ्न की विशेष आत्मीयता का उल्लेख किया गया है।बाद की भी सभी रामकथाओं में यह बताया गया है कि दशरथ ने सुमित्रा को पायस नहीं दिया था।किन्तु,उसे उदास देखकर कौशल्या ने पायस का जो अंश सुमित्रा को दिया था उससे लक्ष्मण उत्पन्न हुए थे। यही राम लक्ष्मण की घनिष्ठता का कारण है और कैकयी के दिए अंश से शत्रुघ्न पैदा हुए।इसकी वजह से शत्रुघ्न का अनुराग भरत के प्रति बढ़ा।

ऐसा माना गया है कि विष्णु ने चार अंशों में अवतार लिया था।हरिवंश,विष्णुपुराण,वायुपुराण आदि में विष्णु के चार रूपों में प्रकट होने का उल्लेख मिलता है:

‘कृत्वीत्मानं महाबाहुश्चतुर्धा प्रभुरीश्वर:।’ महाभारत और अन्य रामकथाओं में राम को विष्णु का पूर्ण अवतार और लक्ष्मण को अंशावतार बताया गया है।सारलादासकृत महाभारत के अनुसार विष्णु राम में अवतरित हुए,ब्रह्मा शत्रुघ्न में,इन्द्र भरत में और महादेव लक्ष्मण में।

गुरु वशिष्ठ द्वारा नामकरण के अवसर पर राम और लक्ष्मण के नामों के विषय में कहा गया है–रामस्य लोकरामस्य,लक्ष्मणो लक्ष्मीवर्धन: और लक्ष्मणो लक्ष्मीसम्पन्नो।पद्मपुराण में ब्रह्मा स्वयं आकर जातकर्म सम्पन्न कराते हैं।इस प्रसंग में राम की ‘त्रिभुवनाभिरामता’ और लक्ष्मण की ‘रूपशौर्यादिलक्ष्मीयोग्यता’ का उल्लेख किया गया है।लक्ष्मण नाम की सबसे सुंदर विशेषता रामचरित मानस में दी गई है:

‘लच्छन धाम राम प्रिय सकल जगत आधार।।

गुरु वशिष्ठ तेहि राखा लछिमन नाम उदार।।

वास्तव में लक्ष्मण, लक्षणों के धाम ही थे।अपने बड़े भाई राम के प्रति अनन्य निष्ठा रखने वाले, उनके प्रति पूर्ण समर्पित, आज्ञापालक,अटल सेवाभावी, आत्मसंयमी,सत्यनिष्ठ, पराक्रमी,शूरवीर,श्रेष्ठ योद्धा थे।जिन्होंने श्रीराम की सेवा के लिए उनके साथ जाने हेतु राजमहल के सारे सुख छोड़कर स्वेच्छा से चौदह वर्ष का वनवास स्वीकार कर लिया था।जबकि उन्हें वनवास की आज्ञा नहीं दी गई थी।

प्राचीन काल से राम-साहित्य में लक्ष्मण के संयम की प्रशंसा मिलती है।लक्ष्मण के संयम की चर्चा विविध रामकथाओं में बहुत आदर से की गई है।क्योंकि कभी कभी आत्मज्ञानियों का संयम भी शिथिल पड़ता देखा गया है।पर लक्ष्मण सदैव सुदृढ़ रहे। अध्यात्म रामायण में इंद्रजित के विषय में विभीषण राम से कहते हैैं कि जिसने बारह वर्ष तक आहार और निद्रा को छोड़ दिया हो,उसी के हाथ से ब्रह्मा ने इन्द्रजित की मृत्यु निश्चित की है।

‘यस्तु द्वादश वर्षाणि निद्राहारविवर्जित:।।

तेनैव मृत्युर्निर्दिष्टो ब्रह्मणास्य दुरात्मन:।’

आनन्द रामायण, कंब रामायण,द्विपद रामायण, तोरवे रामायण,भावार्थ रामायण में अन्न और निद्रा के अलावा स्त्री के त्याग का उल्लेख किया गया है।कृतिवास रामायण में अगस्त्य राम से कहते हैं कि इन्द्रजित के समान तीनो लोकों में कोई वीर न था,वही उसका वध करने में समर्थ था,जिसने चौदह वर्ष तक निद्रा और आहार छोड़ दिया हो और स्त्री का मुख भी न देखा हो।यह सुनकर राम को आश्चर्य होता है और वे लक्ष्मण को बुला भेजते हैं।अगस्त्य का कथन सुनकर लक्ष्मण स्वीकार करते हैं कि मैंने इस व्रत का दृढ़ता से पालन किया था। श्रीचरणों को छोड़कर मैंने सीता माता को नहीं देखा था,इसलिए मैं नूपुरों को छोड़कर उनके आभूषणों को पहचानने में असमर्थ था।वाल्मीकि रामायण में भी इस बात का उल्लेख है:

‘नाहं जानामि केयूरे नाहं जानामि कुंडले।नूपुरे त्वभिजानामि नित्यं पादभिवन्दनात्।।’

अपनी निद्रा त्याग के बारे में बतलाते हुए वे कहते हैं कि आपकी और माता जानकी की रखवाली करते समय जब निद्रा पहली-पहल मेरी आँखों में छा जाना चाहती थी तब मैंने क्रोध करके उसे बाणों से छेदित किया और चौदह वर्ष मेरे पास न आने का आदेश दिया।लक्ष्मण विश्वामित्र की मंत्रदीक्षा का भी उल्लेख करते हैं जिसके बल पर वे चौदह बरस तक अन्न का त्याग कर सके।

कम्ब रामायण के अनुसार लक्ष्मण श्रृंगवेरपुर राम की रक्षा करते हुए रात भर जागते रहे।निद्रा देवी प्रकट हुई और लक्ष्मण ने उनसे कहा कि जब हम अयोध्या लौटकर आएँगे,तब तुम मेरे पास आना।तब तक तुम दिन रात उर्मिला को अपनी शरण में लो।उस पर निद्रादेवी प्रणाम करके चली गई।कम्बोडिया की रामकथा रामकेर्ति में निद्रा नाम की लक्ष्मण की हितैषिणी की चर्चा की गई है,जो लक्ष्मण को नींद दिलाने आती थी।गुह से मिलन के बाद लक्ष्मण ने उसे बुलाकर कहा कि आज से चौदह वर्ष तक तुम्हें मुझे नींद नहीं दिलानी चाहिए।इस अवधि में मैं भोजन भी नहीं करूंगा अत: तुम क्षुधा को मुझसे दूर हटाकर मुझे स्वस्थ और सबल बनाए रखो।निद्रा ने ऐसा ही करने की प्रतिज्ञा की थी।

वाल्मीकि के आदिकाव्य में सीता-लक्ष्मण के संबंध में कोई विशेष ध्यान रखा गया हो,ऐसा प्रतीत नहीं होता है।लक्ष्मण राम और सीता,दोनों की सेवा करते हुए सीता के साथ निस्संकोच बातचीत और व्यव्हार रखते थे।एक स्थल पर इसका उल्लेख किया गया है कि लक्ष्मण ने राम और सीता दोनों के पैर धोए थे।पंचवटी में पहुंच कर लक्ष्मण के एक ही पर्णकुटी बनाने का उल्लेख है,जिसमें तीनों साथ ही निवास करते थे।किन्तु,बाद के राम साहित्य में सीता-लक्ष्मण संबंध के चित्रण में मर्यादावाद का ध्यान रखा गया है।प्रचलित वाल्मीकि रामायण के अनुसार लक्ष्मण ने चित्रकूट में दो पर्णशालाओं का निर्माण किया था।अध्यात्म रामायण के अनुसार वाल्मीकि के शिष्य एक सुविस्तीर्ण पर्णशाला बनाते हैं,जिसमें दो मंदिर हैं।तुलसीदास जी ने भी माना है कि देवता स्वयं “बरनि न जाई मंजु दुई साला।एक ललित लघु एक बिसाला” बनाने आए थे।

लक्ष्मण के संयम का एक सर्वोच्च उदाहरण भावार्थ रामायण में मिलता है।एक दिन राम सीता को लक्ष्मण की रक्षा में छोड़कर बाहर गए थे।सीता को नींद आई थी और उस नींद में उनके कपड़े अस्त-व्यस्त हो गए थे जिससे उनका शरीर अनावृत हो गया था।लक्ष्मण ने साधना में लीन होकर उस पर ध्यान ही नहीं दिया।राम ने वापस आकर लक्ष्मण से पूछा कि स्त्री का रूप देखकर किसका मन स्थिर रह सकता है।लक्ष्मण ने उत्तर दिया कि रामभक्त का ही मन इससे प्रभावित नहीं होता। रामभक्ति के कारण ही रामचरित मानस में लक्ष्मण की इन शब्दों में वंदना की गई है:

‘बंदउँ लछिमन पद जल जाता।

सीतल सुभग भगत सुखदाता।।’

वास्तव में आत्मसंयम ही वो महान गुण है,जिसकी न केवल साधकों को अपितु आम-जन को भी आवश्यकता होती है और प्राय: इसी का सर्वाधिक अभाव होता है।किन्तु,अब कोरोना जैसी महामारी से निपटने के लिए हमें लक्ष्मण जी के चरित्र से संयम और धीरज की सीख लेना होगी।तभी हम इससे पार पा सकेंगे।

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