8.14 भगवान गणेश कैसे बने गजानन

8.14 भगवान गणेश कैसे बने गजानन

आदिदेव भगवान गणेश यूँ तो समयचक्र से परे और सर्वदा-सर्वत्र विद्यमान रहने वाले देव हैं, यही कारण था कि भोलनाथ और माँ जगदम्बा के विवाह में भी उन्हें पूजा गया था। ऐसा कैसे हुआ? इस शंका के निवारण के लिए गोस्वामी जी ने मानस में लिखा–

“मुनि अनुसासन गनपतिहि पूजेउ संभु भवानि।

कोई सुनि संसय करै जनि सुर अनादि जियँ जानि।।”

फिर भी उनकी उत्पत्ति के संबंध में कई कथाएँ प्रचलित हैं। वैसे सबसे जानी-पहचानी कथा, जिसे हम पढ़ते-सुनते और फिल्मों-सीरियलों में देखते चले आ रहे हैं, वह तो यही है कि एक बार माँ जगदम्बा पार्वती जब स्नान करने जा रही थीं, उस समय बचे हुए उबटन से उन्होंने एक बालक की आकृति बना दी और उसमें प्राण डाल दिए। उस बालक ने माँ पार्वती को प्रणाम किया। तब माँ ने उसे आज्ञा दी तुम जाकर द्वार की रक्षा करो, जब तक मैं स्नान करके तैयार न हो जाऊँ, तब तक भवन में किसी को प्रवेश न करने देना। बालक शस्त्र धारण कर अपने काम पर सन्नध हो गया। कुछ देर बाद भोलेनाथ वहाँ आए। बालक ने उन्हें अंदर जाने से रोक दिया और अपनी माँ की आज्ञा सुना दी। तब भोलेनाथ ने अपना परिचय देते हुए पूछा कि तुम कौन हो, तुम्हें पहले तो यहाँ कभी नहीं देखा। तब बालक ने अपने उत्पत्ति की कथा और माँ का आदेश सुनाया। भोलेनाथ पहले तो उसे शाँति से समझाते रहे, पर बालक ने हठ पकड़ ली,जिसे देखकर उन्हें क्रोध आ गया और उन्होंने उस पर अपना त्रिशूल चला दिया। त्रिशूल लगते ही बालक का सिर कट कर कहीं दूर जा गिरा। इतने में शोर सुनकर माता पार्वती बाहर आई और बालक की ऐसी दशा देखकर व्याकुल हो गईं और फूट-फूट कर रोने लगी। उन्होंने जिद पकड़ ली कि भोलेनाथ ने उस मासूम बालक को मारा अब वे ही वापस जीवित करें। भोलेनाथ भी सोच रहे थे कि उनसे सहसा ऐसा कैसे हो गया। वे सोच रहे थे कि अब वे क्या करें? तब ब्रह्माजी ने सुझाव दिया कि जो भी बालक माँ के दुर्लक्ष्य से अकेला सोता मिले, उसका शीष उतार लाएँ। इस सुझाव पर अमल के लिए शिवजी वन की ओर गए और वहाँ एक हाथी शिशु को अकेला सोता देखकर उसका सिर उतार लाए। जिसे मृत बालक के धड पर रखा गया और मंत्रोच्चार के साथ प्राण फूँक दिए गए। बालक जीवित हो गया किन्तु, गजानन के रूप में।

भगवान शंकर को बालक की हत्या के दोष से बचाने के लिए एक अन्य कथा में यह कार्य शनिदेव के द्वारा किया जाना बताया गया है।

भगवान शिव द्वारा क्रोधवश बालक का वध और उसे पुनर्जीवित करने की कथा किस ग्रंथ/पुराण में वर्णित है,यह तो ज्ञात नहीं है।पर इतना तय है कि यह कथा “गणेश पुराण” में नहीं है,जो कि भगवान गणेश की कथाओं और लीलाओं का संग्रह है

। इस पुराण के अनुसार भगवान गणेश ने हर युग में अवतार लिया है और अलग-अलग नाम से प्रसिद्ध हुए। इनके पीछे कारण एक ही था “यदा यदा हि धर्मस्य ग्लार्नि भवति भारत……….” या मानस के अनुसार

“जब जब होई धरम कै हानि।

बाढ़े असुर अधम अभिमानी।।

तब तब प्रभु धरि विविध सरीरा।

हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा।।

सत्ययुग में प्रभु गणेश का प्रथम अवतार महोत्कट विनायक के रूप में हुआ। विनायक की दस भुजाएँ थीं और उनका वाहन सिंह था। वे महात्मा कश्यप की परम् सती पत्नी अदिति के यहाँ प्रकट हुए थे। उस अवतार में उन्होंने देवान्तक और नरान्तक जैसे दुर्दांत असुरों का वध किया था।

त्रेतायुग में गणेश जी ने शिवप्रिया पार्वती के यहाँ अवतार लिया। उनके छ: हाथ थे और उनका वाहन मयूर था। इस अवतार में उन्होंने अनेक असुरों के साथ महादैत्य सिन्धु का वध कर धर्म की स्थापना की थी।

द्वापर युग में जब सिंदुरासुर के क्रूरतम शासन में सारा जगत विकल हो गया था। उस समय विनायक गौरी के यहाँ प्रकट हुए। अपने दिए वचन के अनुसार उन्होंने भगवान शिव से कहा कि आप मुझे माहिष्मति के राजा वरेण्य की सद्य: प्रसूता पत्नी पुष्पिका के समीप पहुँचा दें। आशुतोष शिव की आज्ञा से नन्दी उन्हें पुष्पिका के प्रसूति-गृह में रख आए। वे अरूणवर्ण के थे । उनकी चार भुजाएँ थी और उनका वाहन मूषक था। उनका नाम गजानन प्रसिद्ध हुआ।

विनायक कैसे बने ‘गजानन’

यह एक रोचक कथा है। जब माता पार्वती से गणेश हुए तब वे तेजोमय किन्तु, सामान्य शिशु के रूप में थे। जिसे देखकर माता बहुत आनंदित थी। सहसा शिशु ने दूसरा रूप धारण कर लिया। उसकी आकृति सूंड़ युक्त हाथी की हो गई। जब माता ने उनके इस रूप को देखा तब वे बहुत दुखी हुईं। वे सोचने लगीं कि सूंड़युक्त बालक तो तीनों लोकों में कहीं नहीं देखा गया। जब ब्रह्मा आदि देवगण और दूसरे लोग भी इस प्रकार के शिशु को देखेंगे तो उपहास करेंगे। तब भगवान शिव गणों सहित वहाँ आए और पार्वती को समझाया कि ये भगवान गणेश ही हैं, जो इस द्वापर युग में इस आकृति में आए हैं, जो अब ‘गजानन’ के नाम से प्रसिद्ध होंगे। तब बालरूप गजानन शिव से बोले कि मैं आपकी सेवा करने और देवताओं और सभी राजाओं को मारने वाले सिंदुरासुर का वध करने के लिए आपके घर में अवतीर्ण हुआ हूँ। अभी आप मुझे राजा वरेण्य के घर माता पुष्पिका के पास भिजवा दें। तब भगवान शंकर ने अपने गण नंदी के माध्यम से शिशु को राजा वरेण्य के घर भिजवा दिया। किन्तु, इस विचित्र आकृति के शिशु को राजा वरेण्य भी स्वीकार करने को राजी नहीं हुए और मंत्रियों की सलाह पर उसे घोर वन में छुड़वा दिया। जहाँ से महर्षि पाराशर उसे अपने आश्रम में ले आए।

‘मूषक’ गजानन का वाहन कैसे बना?

प्राचीन काल की बात है, इन्द्र की सभा में क्रोंच नाम के गंधर्व ने शीघ्रतावश वामदेव मुनि को चरणों के अग्रभाग से ठोकर मार दी। इससे मुनि कुपित हो गए और उसे शाप दे दिया कि हे गन्धर्व; तू मूषक बन जाएगा। क्रौंच ने मुनि से शापमुक्ति के लिए प्रार्थना की, तो वे बोले कि तुम मृत्यु लोक में जाकर सभी के लिए अत्यंत दुर्धर्ष मूषक बनोगे। तब भगवान गणेश सदय होकर तुम्हें नियंत्रित करके अपना वाहन बना लेंगे। उनकी संगति में तुम्हें मोक्ष की प्राप्ति होगी।

कुछ काल बाद ऐसा ही हुआ। वह गंधर्व मूषक हो गया और पाराशर मुनि के आश्रम में आ गिरा। उस विशाल आकार वाले मूषक ने पाराशर मुनि के आश्रम में भारी उपद्रव मचाना शुरू किया। हर वस्तु नष्ट-भ्रष्ट कर दी, इससे मुनि बहुत दुखित हुए। यह देखकर बालक के रूप में निवास कर रहे गजानन ने मुनि से मूषक को वश में करने और उसे अपना वाहन बनाने की अनुमति मांगी। मुनि की स्वीकृति मिलने पर बालक गणेश ने एक पाश बनाया और मूषक के गले की ओर फेंका। पाश गले में फँस गया। अब मूषक छूटने के लिए जितना जोर लगाता, फंदा उतना कसता जाता, जिससे उसका दम घुटने लगा। तब वह गणेश के चरणों पर आ गिरा। गणेश ने दया करके उसे पाश से मुक्त किया और वचन लिया कि सदैव उनका वाहन बन कर रहेगा।

कलियुग में, जब पाप का साम्राज्य व्याप्त हो जाएगा, भगवान गणेश श्याम कलेवर में अवतरित होंगे। तब उनका नाम ‘धूम्रकेतु’ होगा। उनकी दो भुजाएँ होंगी। अश्वारूढ़ धूम्रकेतु पापों का नाश कर धर्म की प्रतिष्ठा करेंगे।

Back To Top