आज हम श्रीराम को ब्रह्म का पूर्णावतार ही मानते हैं।क्योंकि तुलसीदास ने रामचरित मानस के माध्यम से इसी भावना को जन-जन में रोपित किया है।मानस में उन्होंने अथ से इति तक श्रीराम का चित्रण परब्रह्म के रूप में ही किया है।मानस में वे कभी भी और कहीं भी इससे इतर सोचने का अवकाश नहीं देते।यदि एक पंक्ति में वे राम को मानव के रूप व्यवहार करते दिखाते हैं,तो अगली ही पंक्ति में तुरंत इसे परब्रह्म की मानव लीला सिद्ध कर देते हैं।
‘एहि विधि खोजत बिलपत स्वामी।मनहुँ महा बिरही अति कामी।।पूरनकाम राम सुख रासी।मनुज चरित कर अज अबिनासी।।’उनके मन में इस बात को लेकर तनिक भी शंका नहीं थी कि उनके आराध्य परब्रह्म से भिन्न कोई और हैं।वे लिखते हैं ‘सोई रामु ब्यापक ब्रह्म भुवन निकाय पति माया धनी।अवतरेऊ अपने भगत हित निजतंत्र रघुकुलमनी।।’
किन्तु,रामभक्ति का इतना गहन वातावरण सदा से नहीं था।यद्यपि भारतीय भक्तिमार्ग का बीजारोपण वैदिक साहित्य में ही हो चुका था,फिर भी वह शताब्दियों के बाद ही भागवत सम्प्रदाय मेें पल्लवित हो सका।भागवतों के इष्टदेव वासुदेव कृष्ण विष्णु के अवतार माने जाने लगे।जिसके कारण भक्ति-भावना इन्हीं विष्णु-वासुदेव कृष्ण में केन्द्रित होकर विकसित होने लगी।बाद में राम भी विष्णु के अवतार माने गए।पर राम के अवतार स्वीकृत हो जाने के शताब्दियों बाद रामभक्ति की शुरुआत हो पाई।प्रौढ़ रामभक्ति की प्राचीनतम रचनाएँ तमिल आल्वार संतों की हैं।इसके बाद बारहवीं शती में रामानुज-सम्प्रदाय के अन्तर्गत राम भक्ति और रामोपासना से संबंधित संहिताओं और उपनिषदों की रचनाएँ शुरू हुईं।आगे चलकर रामानंद और रामावत सम्प्रदाय के कारण रामभक्ति जनसामान्य की धार्मिक चेतना का अंग बन गई।उस समय बहुत सी साम्प्रदायिक रामायणों की रचना हुई।जिनमें कंबनकृत तमिल रामायण, तेलुगु द्विपद रामायण,मलयालम रामचरितम्,कन्नड तोरवे रामायण,असमिया माधवकंदली रामायण,बंगाली कृतिवास रामायण,हिन्दी रामचरित मानस,उडिया बलरामदास रामायण और मराठी भावार्थ रामायण हैं।किन्तु,’आध्यात्म रामायण’ निर्विवाद रूप से सबसे महत्वपूर्ण है।१४ वीं सदी से समस्त रामकथा साहित्य भक्तिभाव से ओतप्रोत होता गया और इसका समस्त वातावरण बदल गया।राम विष्णु के अँशावतार न रहकर परब्रह्म के पूर्णावतार माने जाने लगे, सीताहरण और रावणवध को नया रूप दिया गया और कथानक के अन्य गौण प्रसंगों का दृष्टिकोण भी बदलने लगा।
वाल्मीकि रामायण,हरिवंश, विष्णुपुराण आदि के अनुसार राम,भरत आदि चारों भाई विष्णु के एक-एक चतुर्थांश से समन्वित हैं।भक्तिभाव के पल्लवित होने पर राम परब्रह्म के पूर्णावतार माने जाने लगे और लक्ष्मण,भरत और शत्रुघ्न क्रमश: शेष,शंख और सुदर्शन के अवतार।प्राचीन महापुराणों में सीता और लक्ष्मी को एक नहीं बताया गया है।पर आगे चलकर लक्ष्मी सीता के रूप में अवतरित मानी गईं।यहाँ तक कि रामभक्ति के प्रादुर्भाव के बाद सीता परमशक्ति अथवा मूल प्रकृति के रूप में स्वीकृत होने लगीं।
भक्तिभाव के कारण, सीता राक्षस रावण के वश में हुई थीं,यह विचार भक्तों को असह्य मालूम होने लगा।इसलिए माता सीता की मर्यादा की रक्षा के लिए भक्तों ने सीता की एक छाया मात्र का हरण स्वीकार किया।मूल रामकथा में रावण ने कामवासना से प्रेरित होकर सीता का हरण किया था और दंडस्वरूप राम द्वारा पराजित होकर मारा गया था।भक्ति की भावना बढ़ने पर यह धारणा भी बनी कि कृष्ण और राम का नाम स्मरण मात्र से ही मुक्ति प्रदान करता है चाहे वह वैर भाव से ही क्यों न हो।जो कोई कृष्ण या राम के हाथों मारा जाता है वह परम पद प्राप्त कर लेता है।इसलिए यह माना गया कि रावण ने मोक्ष पाने के उद्देश्य से ही सीता का अपहरण किया था (सुर रंजन भंजन महि भारा, जो भगवंत लीन्ह अवतारा।।तौं मैं जाई बैरु हठि करऊँ।प्रभु सर प्रान तजें भव तरऊँ।।)और राम के हाथों मर कर सायुज्य मुक्ति प्राप्त की थी।
इस तरह रामकथा अनेक सोपानों को पार करती हुई धीरे-धीरे सम्पूर्ण भारतीय संस्कृति में व्याप्त हो गई।मानव हृदय को आकर्षित करने की जो शक्ति रामकथा में मौजूद है,वह अन्यत्र दुर्लभ है।

