निश्चित तौर पर आपने एक अटपटा सा नाम नहीं सुना होगा। ट्रायजेमिनल न्यूरोल्जिया। यह किसी युनिवर्सिटी की डिग्री का नाम नहीं, बल्कि एक बीमारी का नाम है। इसका नाम भला सुनेंगे भी कैसे? यह सर्दी-जुकाम जैसी कामन बीमारी तो है नहीं। यह तो हजारों में किसी एक को होने वाली बीमारी है। भगवान बचाए आपकौ इस बीमारी से। पर न जाने क्यों इस दुर्लभ बीमारी ने मुझे चुन लिया है और पंद्रह सालों से मुझ पर महरबान है। शुरू-शुरू में आप समझते हैं कि यह दातों से संबंधित कोई बीमारी है, पर बाद में पता चलता है कि यह गालों के नसों से संबंधित है। तब आप न्यूरोलाजिस्ट के पास जाते हैं जो बताते हैं कि इसका कोई पक्का इलाज तो है नहीं सिवाय दवाई लेते रहने के।
यह बहुत जिद्दी और जानलेवा बीमारी है। इसके कारणों का पता लगाना भी बहुत मुश्किल है। कब कौन सी बात ट्रिगर कर जाएगी, इसका पता लगाना कठिन है। दवाईयों के सेवन के बावजूद बीमारी अपना असर दिखाती रहती है। इसमें दाएं या बाएं ओर के गालों में तेज झनझनाहट के साथ असहनीय तरंगे उठती हैं। बिजली के झटकों जैसी। ऐसी स्थिति में आप हिल भी नहीं सकते। ऐसे जानलेवा झटके कितनी देर तक आते रहेंगे, कुछ नहीं कहा जा सकता। इस बीमारी को सुसाइडल टेंडेंसी की बीमारी भी कहते हैं। क्योंकि कई लोग दर्द सहन न कर पाने के कारण आत्महत्या तक कर लेते हैं। नामचीन हस्तियों में हीरो सलमान खान भी इससे पीड़ित है.
डाक्टर जो दवाईयां देते हैं वे शामक दवाइयाँ होती हैं। इनसे दर्द दब तो जाता है पर मिटता नहीं। कई बार उसका डोज बढ़ाना पड़ जाता है जिससे कई नए उपद्रव शुरू हो जाते हैं। किसी अनजान आदमी के सामने यह दौरा पड़ जाता है तो न वह समझ पाता है और न तब आप समझाने की स्थिति में होते हैं। डाक्टर बतलाते हैं कि इससे पक्का छुटकारा पाने के लिए मतिष्क का आप्रेशन एकमात्र उपाय है। पर न तो यह सुविधा इतनी कामन है और न सब जगह उपलब्ध है। सस्ती तो खैर हैै ही नहीं और इसमें खतरे भी भरपूर हैं। इसलिए लोग इससे बहुत सहमें से रहते हैं। मामला दिल का न सही दिमाग का तो है भाई।
