देश के दिल में बैठे हम मध्यप्रदेश के लोग कुदरत के बहुत से कहर से बचे हुए हैं, जिनमें एक समुद्री तूफान भी है। हाँ, कभी-कभार तेज हवाएँ चलती जरूर हैं, पर वह तूफानी हवाओं केे पासंग में भी नहीं बैठतीं। इसलिए हमें तूफान की विकटता का कभी अनुभव नहीं होता। किन्तु, कभी-कभी अनचाहे “आ बैल मुझे मार” वाली स्थिति भी बन जाती है। फिर क्या हालात बनते हैं, केवल भुगतने वाला ही बता सकता है।
अगर यहाँ गृहस्थ जीवन में यदा-कदा आने वाले तूफानों की बात चल रही होती तो लोगों के दु:ख भरी कहानियों की झड़ी लग जाती। पर यहाँ सचमुच के तूफान की बात चल रही है, जिसे हमें बाईस घंटे तक झेलना पड़ा था। मुझे आभास है कि ऐसे अनुभव के मामले में अधिकांश लोग अछूते हैं।फिल्म ‘आया तूफान’ फिल्म का दारासिंह और हेलन पर फिल्माया गया ‘जिंदगी में आया तूफान’ गाना सुनने में भले ही अच्छा लगता हो, पर जब सचमुच का तूफान आता है तो ऐसे खतरनाक माहौल में कोई गाना याद नहीं आता,बल्कि नानी याद आती है।
यह किस्सा लगभग तीस साल पुराना है। हुआ यूँ कि हमें दक्षिण भारत के सैर करने की सूूझी। किस्मत से मनमाफिक रिजर्वेशन भी मिल गए। कोई वांदा नहीं रह। हम दोनों के साथ छ: साल का बेटा और बड़ी बहन भी थीं। संक्षेप में कहानी यूूँ है कि तिरुपति,मदुराई, रामेश्वरम, कन्याकुमारी घूमते हुए वापस मदुराई आ गए। वहाँ से रात में चेन्नई जाने वाली बस भी मिल गई, जो सुबह चेन्नई पहुँचाने वाली थी। सोचा था चेन्नई पहुँचने पर किसी होटल में रुक जाएँगे।चूँकि वापसी की ट्रेन (जीटी एक्प्रेस) रात में आठ बजे है, दिन भर का समय हमें खाली मिलेगा, इसलिए तैयार होकर, सामान होटल में जमा करा कर किसी चेन्नई दर्शन बस से घूमने निकल जाएँगे और शाम तक होटल पहुंचकर सामान लेकर स्टेशन पहुँच जाएंगे। इस तरह पूरे दिन का सही उपयोग हो जाएगा।
पर अपनी सोची होती कहाँ है। चेन्नई पहुँच तो गए सुबह सात बजे। पर हमें तूफान के बारे में कुछ पता नहीं था। उन दिनों मौसम जानने के लिए आज जैसे साधन तो थे नहीं। वहाँ पहुँचने पर पता चला कि तूफान आया हुआ है। तेज तूफानी ठंड़ी हवाएँ चल रही थीं। सड़कें पानी से लबालब थीं। फिर भी हम होटल की तलाश में कई जगह भटके, पर अधिकतर होटल बंद मिली। जब कहीं रुकने का ठिकाना बचा नहीं तो हार-थक कर स्टेशन आ गए। स्टेशन भी तेज हवाओं से गीला हो रहा था। बहुत मुश्किल से एक सुरक्षित और सूखी जगह मिली। वहाँ ठंड़ी हवाएँ भी नहीं आ रही थीं।वहीं हमने चादर बिछाई और पसर गए। पास में ही केंटिन थी, वहाँ से ढ़ेर सारा खाने-पीने का सामान ले लिया।
बस में रात भर के जागे और थके हुए थे, इसलिए खा-पी कर वहीं लेट गए। ऐसा सोच रहे थे कि दिन ही तो गुजारना है,किसी तरह गुजर ही जाएगा। रात आठ ट्रेन मिल ही जाएगी, तब वहाँ अपनी-अपनी बर्थ पर आराम से सो जाएँगे।
पर असली परीक्षा तो अब शुरू होने वाली थी। शाम सात बजे ट्रेन की पोजीशन पता लगाने पर पता चला कि अभी कुछ पक्का नहीं कि ट्रेन कब जाएगी, जाएगी भी या नहीं। क्योंकि, तूफान की बढ़ती तेजी को देखते हुए ट्रेनें धड़ाधड़ रद्द की जा रही हैं।
प्लेटफार्म पानी में डूब रहे थे। हमारा दिल भी डूबा जा रहा था, न जाने अब क्या होगा। ट्रेन कहीं रद्द हो गई तो क्या करेंगे? होटलें भी नहीं मिल रही है। फिर इस अजनबी शहर में कैसे और कहाँ गुजारा करेंगे जहाँ न कोई हमारी बोली-भाषा समझता है न हम उनकी। दूसरी किसी ट्रेन में रिजर्वेशन मिल भी पाएगा या नहीं। मिलेगा तो कब। बार-बार पोजीशन पता लगाने की कोशिश कर रहे थे, पर कहीं से भी कोई समाधानकारक उत्तर नहीं मिल रहा था। कोई सही जवाब देने की स्थिति में नहीं था। कुछ जानकारियाँ लिखी हुई थीं, पर वे भी तमिल में थीं। इसलिए पता नहीं लग पा रहा था, लिखा क्या है। दिल की धड़कने बढ़ती जा रही थीं। हर जगह तेज तूफानी हवाएँ चल रही थीं। बाद में पता चला कि जी.टी.एक्सप्रेस रात ग्यारह बजे प्लेटफार्म पर लगने की संभावना है। तब थोड़ी जान में जान आई।
जैसे-तैसे रात के दस बजे। फिर स्थिति पता लगाने पर पता चला कि अभी तो नहीं,पर रात तीन बजे ट्रेन आने की संभावना है। गनीमत यही थी कि उसके रद्द किए जाने की खबर नहीं मिली। अब करते भी क्या,फिर अपने ठिकाने पर पहुँच गए।
जब जान सांसत में फंसी हो तो नींद किसे आती है। जैसे-तैसे रात के तीन बजे। हम लोग सारा सामान समेटकर बतलाए गए प्लेटफार्म पर आ गए। पूरा प्लेटफार्म पानी से तरबतर था। ठंड़ी हवा नश्तर जैसी चुभ रही थी। बच्चा कांपने लगा। हमने जल्दी से उसके सूखे कपड़े निकाले और तीन-तीन,चार-चार कपड़े पहना दिए। डर यह भी था कि यदि बच्चा बीमार पड़ जाए तो उसे लेकर दौडेंगे कहाँ। एक कोने में कुछ सूखी सी बैंच थी,हम सब दड़प कर उसी पर बैठ गए। समय राम-राम कर मुश्किल से कट रहा था। पर उपर वाले ने हमारी सुन ली। थोड़ी देर में एक ट्रेन प्लेटफार्म आती हुई दिखी। पास आने पर पता लगा कि जीटी एक्सप्रेस ही है। तब जान में जान आई।
हम पता लगाकर अपनी बोगी में चढ़ गए। अंदर देखा कि सारी सीटें पानी से नहाई हुई हैं। जबकि बोगियाँ बंद थीं। हमने कपड़ों से अपनी बर्थों को पोछा और चादर बिछाकर लेट गए। लेटते ही सब गहरी नींद में चले गए। लगभग दस बजे नींद खुली तो लग रहा था अब तो ट्रेन काफी दूर आ गई होगी। पर लोगों से पूछने पर पता चला कि अभी तो सिर्फ पचास किलोमीटर ही आई है। पटरियाँ पानी में डूबी हैं इसलिए धीरे-धीरे निकाली जा रही है। दो-तीन घंटे चलने पर सूखी जगह आने लगी, जहाँ तूफान का असर कम हुआ था। फिर तो ट्रेन तूफानी रफ्तार से दौड़ पड़ी। ऐसे लग रहा था जैसे वह भी जान बचा कर भाग रही हो। खैर, जैसे भी हो आखिरकार भोपाल पहुँच ही गए। भले ही बारह घंटे लेट पहुँचे हों। बहुत तसल्ली मिली अपने लोगों के बीच आकर, कम से कम यहाँ हमजुबान लोग तो हैं । उपर वाले को शुक्रिया कहा और घर पहुँचकर लग गए रोजमर्रा की जिंदगी में।
***************************** स्वदेश भोपाल,दि. 26जून,2022

