गूगल से ‘स्त्री’ नाम से बनी फिल्मों के बारे में पूछो तो वह अभी कुछ दिनों पहले बनी हारर फिल्म स्त्री-एक और स्त्री-दो की जानकारी देने लगता है। वह यह भूल जाता है कि वर्ष 1961 में भी स्त्री नाम की एक फिल्म स्त्री बन चुकी है, जो मेलोड़ी से भरपूर थी।
जी हाँ, आज हम बात करेंगे 1961 में बनी स्त्री की , जो महाकवि कालीदास की अमर कृति “अभिज्ञान शाकुन्तलम् ” की कथा पर आधारित थी। इस कथा पर शकुंतला नाम की एक फिल्म 1942 में भी बन चुकी थी पर मानव मन के कुशल चितेरे व्ही शांताराम ने 1961 में फिर यह फिल्म ‘स्त्री’ नाम से बनाई। इसके निर्माता,निर्देशक और नायक भी व्ही. शांताराम ही थे। उन्होंने राजा दुष्यंत और उनकी पत्नी संध्या ने शकुन्तला की भूमिका निभाई थी। अपने मधुर गीत-संगीत और सुंदर छायांकन के कारण यह फिल्म बहुत लोकप्रिय हुई थी।
सहज रूप से शास्रीय राग-रागनियों को अपनी धुनों में पिरोने वाले, मेलोडी भूषण श्री रामचंद्र चितलकर अथवा सी रामचंद्र इसके संगीतकार थे। उन्होंने इसमें मधुर धुनों की बरसात कर दी। इसके गीतकार थे पं. भरत व्यास,जो गीतों में शुद्ध संस्कृतनिष्ठ हिन्दी शब्दों के उपयोग के प्रबल आग्रही अथवा ध्वजवाहक थे। तथापि तद्भव अथवा देसी शब्दों का भी वे यथास्थान प्रयोग करते थे। उस समय यह धारणा थी कि उर्दू शब्दों का उपयोग किए बिना ढ़ंग का कोई हिन्दी गीत बन ही नहीं सकता है। पंड़ित जी ने इस चुनौति को स्वीकार किया और एक से बढ़कर एक हिंदी गीतों की रचना की। उनमें से कुछ गीतों की बानगी व्ही.शांताराम की फिल्म ‘स्त्री’ में है, जिनके गीत सुनकर बस आनंद आ जाता है।
वैसे तो इस फिल्म के सभी गाने अपनी मोहक धुनों और भावपूर्ण शब्दों के कारण एक से बढ़कर एक हैं और श्रोता को बहुत ऊँचे धरातल पर ले जाते हैं। इसलिए उनमें से किसी एक गीत का चयन करना बहुत कठिन है। पर आज बारी है “आज मधु वातास डोले” की। यह एक प्रणय गीत है। रात्रि का समय है, आकाश में चंद्रमा अपनी छटा बिखेर रहा है। चांदनी जगमगा रही है। नायक दुष्यंत और नायिका शकुन्तला एक सज्जित नौका में सवार हो कर जलविहार कर रहे हैं। नायक नायिका से प्राकृतिक छटा के वर्णन के माध्यम से प्रणय निवेदन कर रहा है। ऐसे में गीतकार ने वातावरण को सजीव करने हेतु कितने कोमलकांत शब्दों का उपयोग किया है, वह नीचे अंकित गीत में देखते ही बनता है। इसमें नारी स्वर लता जी और पुरुष स्वर महेन्द्र कपूर का है। कोरस का भी अच्छा उपयोग किया गया है।
लता- आज मधु वातास डोले,
मधुरिमा से प्राण भर लो.
चाँद को चुपचाप निरखो,
चांदनी में स्नान कर लो.
ये चमेली सी सुगंधित,
रात मधु मुस्का रही.
झिंगुरों की बीन की,
झंकार पर कुछ गा रही
महेन्द्र- चहचहाते विहग भोले,
किस दिशा में खो गए
मौन है प्रकृति जगत के,
सकल प्राणी सो गए
मैं कहूँ कुछ कान में,
तुम जानकर अंजान कर लो
लता- चाँद को चुपचाप निरखो,
चांदनी में स्नान कर लो,
(आज मधु वातास डोले- कोरस)
महेन्द्र-आज तुम क्यों मौन हो,
आज मुख से बोल दो.
आज अपनी चिर-लजीली,
लाज के पट खोल दो.
मूक कलियों से सुनो कुछ,
प्रणय पागल की कहानी
मद भरी गीली हवा से,
बात कर लो कुछ सुहानी
बंद कर पलकें किसी का,
आज मन मन ध्यान कर लो.
लता- चाँद को चुपचाप निरखो,
चाँदनी में स्नान कर लो.
आज मधु वातास डोले…………..
वैसे तो गीत के बोल बहुत कठिन नहीं है, फिर भी हो सकता है अंग्रेजी मिश्रित हिंदी गीत सुनने की आदी आज की पीढ़ी को इनमें से कुछ शब्द अनजाने-अनसुने से लगें। पर संस्कृत व देशज शब्दों की जानकार पीढ़ी अवश्य इसका आनंद उठा सकती है। वैसे तो इसके मीठे संगीत का जादू गीत सुनने पर ही मन-प्राण पर असर कर सकेगा।
