(वास्तव में फिल्मों और गीत-संगीत पर लिख पाना मेरे बस की बात नहीं है। इस क्षेत्र के विशेषज्ञ हैं, माननीय शशांक दुबे साहब। फिर भी कोई-कोई गीत आपको लिखने के लिए बाध्य कर ही देता है। उसी का परिणाम नीचे लिखा यह आलेख है।)
कभी-कभी कोई गीत, अपने मधुर संगीत, गायक कलाकार की भाव-भीनी आवाज और गाने के बोलों की वजह से मन में ऐसा अटक जाता है कि आप बरबस उसे बार-बार गुनगुनाने को मजबूर हो जाते हैं। खासकर 1950 से 1970 के बीच में एक से बढ़कर एक ऐसे गाने रचे गए, जो आपकी यादों में समाए हुए होंगे। अगर हम अपने पसंद के सभी मनभावन गीतों का जिक्र करें तो सूची बहुत लम्बी हो जाएगी। इसलिए यहाँ केवल एक ही गीत का उल्लेख है।
कहते हैं कि गीतों का असर आपकी मन:स्थिति पर भी होता है। बात उन दिनों की है, जब गीतों में प्रेम की अभिव्यक्ति बहुत शाँत तरीके से हुआ करती थी, तब समाज में भी शालीनता थी। तब युवा मन में एक-दूसरे के प्रति चाहत होते हुए भी प्रेम को बहुत संयत और शालीन तरीके से व्यक्त किया जाता था। “मुझे तुमसे मुहब्बत है, मगर मैं कह नहीं सकता, टाइप।” जो होती भी थी वह भी प्राय: प्रतीकों के माध्यम से। इसमें फूल,गीत, चित्र, किताबें माध्यम बन पाती थीं। कोई बहुत ही दु:साहसी हुआ (पिटने की सारी संभावनाओं के बीच) तो सामने वाले को पत्र लिख देता था। किन्तु, मुद्दे की बात फिर भी घुमा-फिरा कर ही लिखी जाती थी। ताकि, पकड़े जाने पर भी किन्तु-परन्तु के रास्ते से बचकर निकल सकें।
पर अब संकोच जैसी कोई बात ही नहीं रह गई है। बात ‘खुल्लम खुल्ला प्यार करेंगे हम दोनों’ से चलकर ‘आती क्या खंडाला’ तक पहुँच गई है। आज प्यार जताने में सभी मवाली तरीके अजमाए जाने लगे हैं। आर्केस्ट्रा के कानफोडू आवाज के बीच लड़का गला फाड़ कर गाना गाता है। जो किसी को समझ नहीं आता। यहाँ तक कि उसकी तथाकथित प्रेमिका को भी। फिर उसेे जताने के लिए डब्यू.डब्ल्यू. एफ. के सारे तरीके उस लड़की पर वह आजमाता है। दस बार उस लड़की को उठाकर उलटना-पलटना पड़ता है। तब वह भी मान जाती है कि उसका सचमुच का सच्चा आशिक तो बस यही है।
मगर मैं जिस जमाने की बात कर रहा हूँ वह आज से पचास-साठ साल पहले की है। भला आज की मिलेनियम पीढ़ी कैसे जाने कि उनके पिताजी, दादाजी लोगों ने अपने जमाने में कैसे-कैसे पापड़ बेले थे। फिर भी उनमें से अधिकतर को उनकी मनपसंद जीवन साथी नहीं मिली/मिला। पर उनकी हिम्मत नहीं है कि वे गा सकें ‘मीत न मिला रे मन का।’ इसे कहते हैं बेबसी। हार-थक कर मजबूरी में उन्हें उससे शादी करनी पड़ी थी, जिसे उनके बुजुर्गों ने चुन दिया। जो आज इन बच्चों की माँ/दादी कहलाती हैं। विवाह के बाद एड़जेस्टमेंट तो करना ही पड़ता है क्योंकि जिंदगी एडजेस्टमेंट का ही दूसरा नाम है। मीत चाहा-अनचाहा जैसा भी मिला हो। इसलिए आज की औलादें प्रेम की कम, एड़जेस्टमेंट की उपज अधिक हैं।
खैर, छोड़ें इन बातों को। मूल मुद्दा तो बीते समय के भावपूर्ण और कर्णप्रिय गीत और संगीत का है। जिन्होंने आपके दिलों पर राज किया है। उन्हीं में से एक गीत 1960 की फिल्म “गर्ल फ्रेंड” का है। ये फिल्म अपने समय में कितनी चल पाई थी, यह तो नहीं मालूम। पर उसके दो-तीन गाने आज भी बहुत पसंद किए जाते हैं। इस फिल्म में संगीत दिया था मेलोड़ी के सरताज हेमंत कुमार जी ने। जबकि, गीत लिखे थे शब्दों के जादूगर साहिर लुधियानवी ने। जिस गाने की हम बात करने जा रहे हैं, उसे आवाज के करिश्में में पिरोया था किशोर दा ने और उनके साथ थीं सुधा मल्होत्रा। अब तक आप को गीतों के बोल याद आ ही गए होंगे,अगर नहीं, तो कोई बात नहीं,आगे हम आपको बतलाते हैं। इस गीत की एक विशेष बात है कि है कि गीत के शुरुआती बोलों में ही गीतकार ने माहौल का पूरा परिचय दे दिया है, जिसमें यह गीत हौले-हौले आगे बढ़ता है। बोल कुछ ऐसे हैं-
“कश्ती का खामोश सफर है, चांद भी है तनहाई भी। दूर किनारे पर बजती है, लहरों की शहनाई भी।
आज मुझे कुछ कहना है, आज मुझे कुछ कहना है।”
गीत समाप्ति की ओर जाता रहता है, फिर भी नायिका उसके कहने की राह देखती रह जाती है। पर नायक कुछ कह नहीं पाता। अगले अंतरे में नायक न कह पाने की अपनी विवशताओं को कुछ यूँ बताता है।
“लेकिन ये शरमीली आँखें मुझ को इजाजत दे तो कहूँ। ये मेरी बेताब उमंगे थोड़ी फुरसत दें तो कहूँ।”
इस पर नायिका अपनी आशंका जताती है।
“जो कुछ तुम को कहना है,वो मेरे ही दिल की बात न हो, जो है मेरे ख्वाबों की मंजिल उस मंजिल की बात न हो।”
फिर भी नायक अपने डर का इजहार कुछ यूँ करता है–
“कहते हुए डर सा लगता है, कह कर बात न खो बैठूँ, ये जो जरा सा साथ मिला है, ये भी साथ न खो बैठूँ।”
जब (दब्बू) नायक कुछ बोलने को तैयार ही नहीं होता, तब मजबूरी में नायिका ही अपने दिल का हाल कुछ यूँ बता देती है।–
“कब से तुम्हारे रस्ते पे मैं फूल बिछाए बैठी हूँ, कह भी चुको जो कहना है मैं आस लगाए बैठी हूँ।”
नायक अब भी बातों को स्पष्टता से न कह कर कुछ यूँ कहता है।
“दिल ने दिल की बात समझ ली अब मुँह से क्या कहना है, आज नहीं तो कल कह लेंगे, अब तो साथ ही रहना है।” फिर भी नायिका आग्रह करती है
“कह भी चुको, कह भी चुको जो कहना है।”
(नायक) “छोड़ो अब क्या कहना है।”
यह थी तब प्रेम की उच्चतम अवस्था। जिसमें बिना कुछ कहे-सुने दो दिल प्रेम की गहनता और गहराई को महसूस कर लेते थे। इस गीत का सबसे मधुर पक्ष उसका संगीत है, जो बहुत शाँत गति से आगे बढ़ता है और दिल की गहराइयों में उतरता चला जाता है। किशोर दा की आवाज का कमाल तो है ही, साथ में सुधा मल्होत्रा ने भी उनका पूरा साथ निभाया है।
‘यू ट्यूब’ पर इसे सुना जा सकता है।
