‘चित्रकूट के घाट पे भई संतन की भीर’ भीड़ चाहे संतों की हो या भक्तों की, प्राय: समस्या पैदा करती है। श्रीराम को राज्यभार सम्भाने हेतु मनाने के लिए भरत जी के साथ आई अयोध्या-वासियों की भीड़ के कारण ही उन्हें उस रमणीक चित्रकूट को छोड़कर दक्षिण के सघन वनों में जाना पड़ा था।यह वह चित्रकूट था,जिसकी नैसर्गिक सुषमा पर राम स्वयं मोहित थे। एक बार सीता जी के साथ वन भ्रमण करते समय उन्होंने कहा था, हे सीते! देखो यह वन और चित्रकूट पर्वत विविध प्रकार के वृक्षों,झाड़ियों और लताओं से कितना शोभायमान हो रहा है।इन पर कितने प्रकार के पक्षी निवास कर रहे हैं, जिनकी मधुर आवाजों से यह पूरा वन कितना गुंजायमान हो रहा है। इन वृक्षों पर हर ओर मधु से भरे हुए छत्ते लटक रहे हैं साथ ही इन पर सुगंधित और स्वादिष्ट फल भी लगे हुए हैं।यहाँ हरिणों के झुंड कुलाचे मार रहे हैं और हाथियों और जंगली भैंसों के झुंड भी विचर रहे हैं।पर्वत से झरने निकल रहे हैं और मधुर जल की प्रचुरता है। कंद-मूल,फल और औषधियों की कोई कमी नहीं है।पर्वत की गुफाओं से वहाँ खिलने वाले फूलों की मनभावन सुगंध आ रही है।स्थान-स्थान पर ऋषी-मुनियों के आश्रम बने हुए हैं, जहाँ सतत वेदाध्ययन,योगाभ्यास और सत्संग चलता रहता है। हर आश्रम सें ध्यान,हवन-पूजन और प्रवचन चलते रहते हैं। हे अनन्दिते! यदि तुम्हारे और लक्ष्मण के साथ बहुत वर्षों तक भी मुझे यहाँ रहना पड़े तो मुझे जरा सा भी शोक-संताप नहीं सताएगा।
“यदिह शरदोअनेकास्त्वया सार्धमनिन्दिते।
लक्ष्मणेन च वैत्स्यामि न मा शोक: प्रद्यक्ष्यति।।”
हे सीते! यदि मैं सज्जनों के मार्ग पर स्थित हो अपने श्रेष्ठ नियमों का पालन करते हुए तुम्हारे और लक्ष्मण के साथ चौदह वर्ष तक यहाँ रह पाया तो पीछे प्रजापालन रूपी धर्म को बढ़ाने वाला राज्य सुख मुझे अवश्य प्राप्त होगा।
“इमं तु कालं वनिते विजहिवांस्त्वया च सीते सह लक्ष्मेणेन च।
रति प्रपत्स्ये कुलधर्मवर्धनी सतां पथि स्वैर्नियमै: परै: स्थित:।।”
किन्तु,ऐसा न हो सका।कहाँ तो श्रीराम की कामना वनवास के चौदह वर्ष चित्रकूट में ही बिताने की थी,कहाँ अयोध्यावासियों के आगमन के कारण उन्हें चित्रकूट से जल्दी ही जाना पड़ा।
वाल्मीकि रामायण में राम के चित्रकूट से प्रस्थान के दो कारण बताए गए हैं।एक तो चित्रकूट को देखकर भरत का स्मरण आता है,(इह मे भरतो दृष्टो मातरश्च सनागरा:।सा च मे स्मृतिरन्वेती तान्नित्यमनुशोचत:) दूसरे, भरत की सेना ने उस स्थान को मलिन कर दिया है। महाभारत के रामोपाख्यान जो कारण दिया गया है,उसका आगे चलकर बहुत उल्लेेख है। राम इसलिए चित्रकूट छोड़ देते हैं कि जनता उनके पास न आ सके (पुनराशंक्य पौरजानपदागमम्)। अध्यात्म रामायण, आनन्द रामायण तथा रामचरित मानस में यही कारण दिया गया है।
‘बहुरि राम अस मन अनुमाना। होइहि भीर सबहिं मोहि जाना।।
सकल मुनिन्ह सन बिदा कराई। सीता सहित चले द्वौ भाई।।’
किन्तु,जब भारद्वाज मुनि के बताने पर राम चित्रकूट आए थे, तब उस स्थान को देखकर राम को बहुत संतोष हुआ था। शीघ्र ही लक्ष्मण ने उस स्थान को खोज निकाला जो निवास करने के लिए सबसे उपयुक्त थी। वाल्मीकि रामायण के दक्षिणात्य पाठ में यद्यपि चित्रकूट में एक पर्णशाला बनाने का उल्लेख है किन्तु, गौडीय और पश्चिमोत्तरीय पाठ के अनुसार लक्ष्मण द्वारा दो पर्णशालाओं का निर्माण किया गया था। मानस का भी यही कथन है। ‘बरनि न जाए मंजु दुइ साला। एक ललित लघु एक बिसाला।।’
जावा के सेरी राम के अनुसार राम घास से सात लड़कियों तथा पांच लड़कों की सृष्टि करते हैं, जिससे राम, सीता लक्ष्मण तीनों निश्चिंत होकर एकाग्रता से साधना कर सकें।
चित्रकूट में घटित काक-वृतान्त का भी विभिन्न ग्रंथों में बहुत उल्लेख मिलता है। सुन्दरकांड में सीता अभिज्ञान स्वरूप हनुमान् को काक-वृतान्त सुनाती है। किसी दिन राम सीता की गोद में सो रहे थे, उस समय एक मांसलोभी काक (इन्द्र का पुत्र जयंत) सीता के स्तनों मेंं आघात करने लगा। जागकर राम ने ब्रह्मास्त्र पर दर्भ रखकर उसे काक पर चलाया। कहीं पर शरण न पाकर काक राम के पास लौटा और एक आँख ब्रह्मास्त्र को देकर बच गया। रामचरित मानस में नारद जयंत को राम के पास भेज देते हैं। (नारद देखा विकल जयंता। लागि दया कोमल चित संता।। पठवा तुरत राम पहिं ताही। कहेसि पुकारि प्रनत हित पाही।।) सीता जी हनुमान् को यही कथा सुनाती हैं (तात सक्रसुत कथा सुनाएहु) हनुमान् राम के पास लौटकर इसी वृतान्त को दोहराते हैं।
दक्षिणात्य पाठ का काक-वृतान्त थोड़ा अलग है। भोजन के बाद सीता कौवों को खिला रही थीं, कि एक कौवा उन्हें कष्ट देने लगा । इस पर राम ने इषीकास्त्र चलाकर काक को भगाया।अन्त में काक ने राम की शरण ली और एक आँख समर्पित कर बच गया। इसका एक संदेश यह भी है कि तब भी महिलाओं से दुर्व्यव्हार करने के फलस्वरूप सजा पाना निश्चित था, चाहे वह इन्द्र पुत्र जयंत हो या रावण। आज भी ऐसा ही होना चाहिए, चाहे वह कोई भी हो।
वाल्मीकि रामायण में यह प्रसंग भरत के चित्रकूट में आगमन के पूर्व रखा गया है, जबकि कालिदास ने काक-वृतान्त का वर्णन भरत के प्रस्थान के बाद किया है। जिसके कारण बहुत सी राम-कथाओं में इसक वर्णन कालिदास के अनुसार ही किया जाता है। जैसे–नृसिंहपुराण, रामायण-मंजरी, पद्मपुराण, रामचरित मानस आदि।
अध्यात्म रामायण के अनुसार काक ने सीता के पैर के अँगूठे को फाड़ डाला था (मत्पादांगुष्ठमारक्तं विददारामिषाशया)। आनन्द रामायण, रामगीतगोविंद तथा रामचरित मानस में भी ऐसा ही वर्णन मिलता है।(सीता चरन चोंच हति भागा। मूढ़ मंदमति कारन कागा।। चला रुधिर रघुनायक जाना। सींक धनुष सायक संधाना।।)
रसिक सम्प्रदाय की रचनाओं में चित्रकूट में राम की रासलीला का वर्णन है। दुर्गावर कृत असमिया गीति रामायण में राम वनवास के समय चैत्र चतुर्दशी के अवसर पर एक मायामयी अयोध्या की सृष्टि का वर्णन किया गया है। सीता,राम और लक्ष्मण पिचकारी हाथ में लिए अयोध्यावासियों के साथ मदनोत्सव मनाते चित्रित किए गए हैं। निश्चित ही इस कथा पर कृष्ण लीला का प्रभाव है।

