रामकथा को आमतौर पर दुखांत कहानी माना जाता है।महर्षि वाल्मीकि की रामायण भी इस धारणा की पुष्टि करती है।इसमें वर्णित कथा के अनुसार लोकापवाद के कारण अपनी निर्दोष पत्नी को छोड़ देने के बाद राम अश्वमेध के अवसर पर अपने पुत्रों को देखकर सीता को बुला भेजते हैं।वाल्मीकि सीता के साथ सभा में पहुँच कर सीता के सतीत्व का साक्ष्य देते हैं।किन्तु,राम जनता को विश्वास दिलाने के लिए सीता से अनुरोध करते हैं कि वह सतीत्व का प्रमाण दें।इस पर सीता शपथ खाती हैं कि उनके मन में अपने पति के अलावा किसी की कल्पना भी आई हो तो माँ पृथ्वी उन्हें अपनी गोद में ले ले।
‘मनसा कर्मणा वाचा यथा रामं समर्चये।
तथा मे माधवी देवी विवरं दातुमहर्ति।।’
तब पृथ्वी देवी एक दिव्य सिंहासन पर भूमि से प्रकट हो जाती हैं और सीता को अपनी शरण में लेकर पुन: भूमि में प्रवेश करती हैं।राम विलाप करते हैं और पृथ्वी देवी से सीता को लौटा देने का अनुरोध करते हैं।अंत में ब्रह्मा राम को सांत्वना देते हैं कि अब सीता से उनका पुनर्मिलन स्वर्ग में होगा।राम को अपना शेष जीवन सीता के बिना ही बिताना पड़ता है।
रामकथा का इस तरह का निर्वहण रघुवंश,आध्यात्म रामायण आदि अधिकतर राम कथाओं में पाया जाता है।वैसे रामकथा मनीषियों का मानना है कि वाल्मीकि ने आदि रामायण में रामकथा का समापन युद्धकांड के अंत में श्रीराम के राज-काज संभालने और रामराज्य के वर्णन के साथ ही कर दिया था।पूरा उत्तरकांड बाद के कवियों की रचना है।तुलसीदास जी ने भी वाल्मीकि के आदि रामायण का अनुसरण करते हुए रामचरितमानस में रामराज्य के अलावा सीता-त्याग और सीता जी के भू-देवी के गोद में समाने जैसे किसी दुखांत प्रसंग का संकेत नहीं किया है और:
‘दुई सुत सुंदर सीता जाए।
लव कुस बेद पुरानन्ह गाए।।’
तक कथा को सीमित रखा है।
फिर भी बहुत सी रामकथाओं को सीता-त्याग के रहते हुए भी सुखान्त बना दिया गया है।भवभूति ने उत्तररामचरित में राम-सीता के सम्मिलन का विस्तृत वर्णन किया है।इसके अनुसार वाल्मिकि ने राम तथा अयोध्यावासियों को अपना एक नाटक देखने के लिए आमंत्रित किया।उस नाटक का विषय त्याग के बाद सीता का चरित और दो पुत्रों का जन्म था।उस करुण कथा का अभिनय देखकर सारे दर्शक सीता के सतीत्व पर विश्वास करते हैं और राम अपने पुत्रों और सीता के साथ अयोध्या लौट जाते हैं।क्षेमेन्द्र की वृहतकथा मंजरी में भी रामकथा सुखान्त है।
कुन्दमाला के अंतिम अंक में सीता अपनी निर्दोषिता की शपथ देकर पृथ्वी से प्रार्थना करती है कि वह प्रकट होकर साक्ष्य देने की कृपा करें।इस पर पृथ्वी देवी प्रकट होकर सीता के सतीत्व का साक्ष्य देकर लुप्त हो जाती हैं।उसके बाद राम सीता और पुत्रों के साथ अयोध्या लौटते हैं।आनन्द रामायण के अनुसार जब पृथ्वी देवी सीता के साथ भूमि में प्रवेश कर रही थीं, तब राम ने उनसे सीता को न ले जाने का अनुरोध किया।किन्तु,अपने विनय को असफल होता उन्होंने देखकर पृथ्वी को तहस-नहस करना शुरू कर दिया।यह देखकर भयभीत पृथ्वी देवी ने सीता को लौटा दिया।
कथासरित्सागर,जैमनीय अश्वमेध,पद्मपुराण,रामचंद्रिका, रामलिंगामृत,रामजातक,ब्रह्मचक्र और सिंहली रामकथा में भी लव-कुश के युद्ध के अवसर पर सीता राम से मिलकर उनके साथ अयोध्या लौट आती हैं।इन राम कथाओं में सीता के पुन: सतीत्व का प्रमाण देने का उल्लेख नहीं किया गया है।
तिब्बती रामायण के अनुसार हनुमान अयोध्या आने का निमंत्रण पाने के बाद राम से मिलते हैं।सीता-त्याग की बात सुनकर वह वर्णन करते हैं कि किस परिस्थिति में उन्होंने सीता को लंका में देखा था।तब हनुमान् का प्रणाम स्वीकार करके राम सीता को बुला भेजते हैं,जिस पर सीता अपने पुत्रों के साथ लौटती हैं।
वास्तव में अंत में क्या हुआ था,यह तो रामजी का रामजी ही जाने।पर माता सीता ने जितना भी कष्ट भुगता,वह भी उनकी निर्दोषिता को साबित करने के लिए कुछ कम नहीं था,जो उन्होंने अपने चरित्रबल से सह लिया।हम तो रामजी से इतनी ही प्रार्थना कर सकते हैं कि अब किसी भी नारी के सामने ऐसी परिस्थिति उत्पन्न न करे कि उसे इतना बड़ा लांछन और ऐसा घनघोर कष्ट भुगतना पड़े कि वह टूट जाए।
