रामकथा के अनेक रूप हैं,एक रूप इस प्रकार भी है।कृतिवास रामायण की कथा के अनुसार राम और सीता के विवाह का जो मुहूर्त वसिष्ठ, वामदेव, जाबालि, कश्यप, मार्कण्डेय और नारद द्वारा आपसी परामर्श कर तय किया था, यदि उस शुभ मुहूर्त में वह सम्पन्न हो जाता तो उनका पूरा वैवाहिक जीवन निर्विघ्न चलता रहता। किन्तु, देवता यही तो नहीं चाह रहे थे।उन्हें आशंका थी कि यदि ऐसा हो गया तो राम वन नहीं जा पाएँगे, राम सीता का वियोग नहीं हो पाएगा और न रावण के विनाश की वजह पैदा हो पाएगी, जो उनके संकट का कारण बना हुआ है। तब देवताओं ने चन्द्रमा को विवाहोत्सव में भेज दिया। चन्द्रमा ने नर्तकी का रूप धारण कर अपने नृत्य से सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया, जिससे किसी को मुहूर्त का ध्यान नहीं रहा। अत: शुभ मुहूर्त बीत जाने के बाद ही विवाह सम्पन्न हुआ। जब देवतागण प्रभु राम के विवाह में अडंगेबाजी कर सकते हैं तो साधारण मनुष्य की बिसात ही क्या हैै।इसीलिए तुलसीदास जी ने भी देवताओं को ‘सदा स्वार्थी’ की उपाधि दी है। “आए देव सदा स्वारथी। बचन कहहिं जनु परमारथी।।”
इसके पूर्व जनक की शर्त के अनुसार राम ने शिव धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाई थी जिससे वह भंग हो गया।वाल्मीकि रामायण के अनुसार यह कार्य अन्य राजाओं की अनुपस्थिति में किया था,क्योंकि वे बहुत पहले ही अपना बल का प्रयोग कर चले गए थे। पर धनुष को तिल भर भी भूमि से उठा न सके।(तिलु भरि भूमि न सके छड़ाई।)
बाद की रचनाओं में राम प्राय: अन्य राजाओं की उपस्थिति में धनुष चढ़ाते हैं। उदाहरणार्थ–नृसिंहपुराण, भागवत पुराण, अध्यात्म रामायण, कंब रामायण, रामचरित मानस आदि। अध्यात्म रामायण के अनुसार नारद जनक के पास पहुँचकर राम तथा सीता के अवतार का रहस्य प्रकट करते हैं और दोनों के विवाह का आयोजन करने को कहते हैं।इस पर जनक सीता-स्वयंवर की घोषणा करते हैं।पद्मपुराण के अनुसार अपने पुत्रों का विवाह करने के उद्देश्य से दशरथ ने अनेक देशों में दूतों को भेज दिया था। इनमें से एक शीघ्र ही लौटकर यह समाचार ले आया कि मिथिला देश के राजा की पुत्री वैदेही राम के सर्वथा योग्य है।इस पर वसिष्ठ को भेजा जाता है जो लग्न निश्चित करके अयोध्या लौटते हैं।बाद में दशरथ विवाह मंगल गीत गाती हुई महिलाओं के साथ मिथिला के लिए प्रस्थान करते हैं,जनक उनका स्वागत करते हैं तथा उन्हें नगर के पश्चिम में स्थित महल में ठहराते हैं। जबकि वाल्मिकीय रामायण में धनुर्भंग के बाद दशरथ को बुलाया जाता है और वे अनेक ऋषि-मुनियों और चतुरंगिणी सेना के साथ मिथिला आते हैं। वहाँ राम-सीता के अतिरिक्त अन्य तीन भाइयों के विवाह भी सम्पन्न किए जाते हैं। लक्ष्मण सीता की बहन उर्मिला से तथा भरत-शत्रुघ्न क्रमश: जनक के भाई कुशध्वज की पुत्रियों मांडवी-श्रुतिकीर्ति से विवाह करते हैं।सामान्यत: सभी रामकथाओं में ऐसा ही वर्णन मिलता है। किन्तु, अपवाद स्वरूप वाल्मीकि रामायण के पश्चिमोत्तर पाठ में जनक को राम-भरत का और कुशध्वज को लक्ष्मण-कुशध्वज का ससुर कहा गया है–
जनक: श्वसुरो राजा रामस्य भरतस्य च।
कुशध्वजा सुताभ्यां च सुमित्रानन्दनौ पती।।
महाभारत के रामोपाख्यान, गुणभद्र के उत्तरपुराण, तिब्बती रामायण, खोतानी रामायण और बौद्ध जातकों में सीता का विवाह ही वर्णित है। कुछ रामकथाओं में केवल राम और लक्ष्मण के विवाह का उल्लेख किया गया है। जैनी रामकथा ‘पउम चरियं’ में राम के अतिरिक्त भरत के विवाह का वर्णन भी मिलता है। राम-सीता विवाह के कारण भरत को उदास देखकर कैकेयी ने भरत-सुभद्रा के विवाह का प्रस्ताव रखा। सुभद्रा जनक के भाई कनक की कन्या है। इस पर सुभद्रा स्वयंवर का आयोजन होता है जिसमें वह भरत को चुन लेती है। बाद में राम और भरत दोनों का विवाहोत्सव मनाया जाता है।
कम्ब रामायण, उदार राघव और बलरामदास की रामकथाओं के अनुसार दशरथ अपनी रानियों को भी मिथिला ले जाते हैं। जबकि रामचरित मानस सहित अन्य रामकथाओं में केवल पुरुषवर्ग ही बारात में जाते हैं। संभवत: स्थानीय लोक-रीतियों का इस वर्णन में असर पड़ा होगा।
अनेक रामकथाओं में विवाहोत्सव में देवताओं के आगमन का उल्लेख मिलता है। तत्वसंग्रह रामायण शिव तथा ब्रह्मा की उपस्थिति का उल्लेख करता है। रामचरित मानस के अनुसार देवता विमान पर चढ़कर राम का विवाह देखने आते हैं ।(सिव ब्रह्मादिक बिबुध बरूथा। चढ़े बिमानन्हि नाना जूथा।।), ब्राह्मण का रूप धारण कर विवाहोत्सव में भाग लेते हैं (ब्रह्मादि सुरबर बिप्र बनाइ कौतुक देखहिं।) तथा होम के समय प्रकट होकर पूजा स्वीकार करते हैं (सुर प्रगटि पूजा लेहिं देहिं असीस अति सुख पावहिं।) देवियाँ भी छद्मवेश में परछन के अवसर पर राम की आरती उतारती हैं:
सची सारदा रमा भवानी। जे सुरतिय सुचि सहज सयानी।।
कपट नारि बर बेष बनाई। मिलीं सकल रनिवासहिं जाई।।
विवाह के बाद भी राम को सीता जी इतनी आसानी से नहीं मिल जातीं। विदेशी रामकथा सेरी राम के अनुसार राम को एक और परीक्षा देना होती है। सीता को मूर्तिवत खड़ी रहने का आदेश देकर महीरसी कली उनको एक मंदिर में छिपाते हैं जहाँ एक हजार मूर्तियाँ हैं। राम सीता की खोज करते हुए मंदिर में पहुँचते हैं और मूर्तियों को गुदगुदाकर सीता का पता लगाते हैं। एक अन्य पाठ के अनुसार राम मूर्तियों की आँखों पर पुष्प मारकर सीता को खोज निकालते हैं।
नृसिंह पुराण से लेकर अनेक रामकथाओं में सीता स्वयंवर के पश्चात् अन्य राजाओं के आक्रमण का वर्णन किया गया है। अपने भाइयों की सहायता से राम उन राजाओं को पराजित करते हैं। पद्मपुराण, तोरवे रामायण, असमिया बालकांड, असमिया रामविजय और सेरिराम में इस युद्ध का उल्लेख किया गया है। आनन्द रामायण में इस युद्ध का वर्णन एक अन्य अवसर पर किया गया है। जनक ने दशरथ को कुटुम्ब के साथ दीपावली के अवसर पर निमंंत्रित किया था। उत्सव के पश्चात् अयोध्या के रास्ते में स्वयंवर में पराजित राजाओं ने आक्रमण किया तथा राम ने अपने भाइयों की सहायता से उन्हें हरा दिया था।

