3.5 जब श्रीराम जगत के ध्वंस पर उतारू हो गए.

3.5 जब श्रीराम जगत के ध्वंस पर उतारू हो गए.

सदैव शांत रहने वाले और जगत-पिता श्रीराम सहसा कुपित होकर त्रिलोकी को तहस-नहस करने पर उतारू हो सकते हैं,इस बात पर विश्वास करना कठिन है। किन्तु, कभी-कभी ऐसा भी होता है कि हमेशा शांत और संयत रहने वाला व्यक्ति जब क्रोधित हो जाता है तब उसका क्रोध सातवें आसमान पर पहुँच जाता है। रामचरितमानस में कुछ प्रसंगों में श्रीराम केे कोप का उल्लेख हुआ है, पर गोस्वामी जी ने उन्हें बहुत सौम्यता के साथ प्रस्तुत किया है। क्योंकि वे मानते थे कि उनके आराध्य परब्रह्म परमात्मा ही हैं, जिनकी भृकुटि तिरछी होने मात्र से समस्त सृष्टि का लय हो सकता है(भृकुटि विलास सृष्टि लय होई) तब वे कैसे मानते कि उनके क्रोधित होने पर सृष्टि टिकी रह सकती थी।उनके प्रभु तो मर्यादा पुरुषोत्तम हैं, इसलिए उनके प्रभु राम की सारी लीलाएँ मानव कल्याण के लिए ही थीं। पर मानस मर्मज्ञों का मानना है कि कुछ अवसरों पर श्रीराम का क्रोध क्षणिकमात्र ही क्‍यों न हो, झलका अवश्य था।

रामचरितमानस के बालकांड की कथा के अनुसार सीता स्वयंवर के दौरान महाराजा जनक की सभा में मौजूद कोई राजा शिव- धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाना तो दूर, उसे उठाने में भी समर्थ नहीं पाया था। तब राजा जनक ने कहा कि क्या कोई क्षत्रिय ऐसा नहीं है, जो इस शिव-धनुष को उठा कर मेरी प्रतिज्ञा पूरी कर सके। उस समय स्‍वयंवर में उपस्थित श्रीराम विश्‍वामित्र की आज्ञा पाकर धनुष उठाकर उसकी प्रत्यंचा चढ़ा ही रहे थे कि शिवधनुष टूट गया।धनुष टूटने की आवाज सुनकर शिव के परम भक्त परशुराम क्रोधित हो जनक की सभा में पहुंच गए। तब वहां लक्ष्मण के साथ उनका वाद-विवाद हुआ। उस दौरान भी मर्यादा पुरुषोत्तम शांत रहे। लेकिन जब परशुराम आवेश में आकर राम को अपने धनुष पर दिव्‍यास्‍त्र चढ़ाने को दिया तो क्रोध में आकर राम ने उस धनुष पर दिव्यास्त्र चढ़ाया और पूछा कि अब बताएं कि इसे किस दिशा में छोडा जाए। तब परशुराम जी को श्री राम के विष्णु अवतार होने का भान हुआ और वे राम से क्षमा मांग कर उनकी स्तुति कर तपस्या करने महेन्द्र पर्वत पर चले गए।

श्री राम के क्रोध के संबंध में एक कथा और आती है। वह है इंद्र पुत्र जयंत द्वारा कौवा का रूप धर सीता के पैर में चोंच मारने की। उस समय भी प्रभु श्री राम को क्रोध आता है। इस कथा का उल्‍लेख आदि कवि वाल्‍मीकि द्वारा रचित रामायण, गोस्‍वामी तुलसी दास कृत रामचरित मानस, आनंद रामायण सहित नरसिंह पुराण और पद्मपुराण में भी मिलता है। तुलसीदास जी लिखते हैं–

सीता चरण चोंच हतिभागा। मूढ़ मंद मति कारन कागा॥

चला रुधिर रघुनायक जाना। सीक धनुष सायक संधाना॥

यद्यपि रामायण और रामचरित मानस में माता सीता के अंगों और कांड या सर्ग को भी लेकर भिन्‍नता है। वाल्‍मीकि कृत रामायण और अध्‍यात्‍म रामायण में अयोध्या कांड में और रामचरित मानस के अरण्‍यकांड में मिलता है। वहीं आनन्द रामायण में भी यह प्रसंग है और यह सारकांड के सर्ग 6 में है जो मानस से मेल खाता है, लेकिन थोड़ी सी भिन्नता लिए हुए है। जहां रामचरितमानस का कौवा माता सीता के पैर में एक बार चोंच मारकर भाग जाता है वहीं आनन्द रामायण में अंगूठे पर बार-बार चोंच मारने का प्रसंग आता है।

कथा के अनुसार जयंत कौवे का रूप धारण कर माता सीता के पैर में चोंच मारता है। तब श्री राम की भृकुटि तन जाती है और वह पास में पड़े तिनके को उठाकर कौवा बने जयंत तरफ फेंक देते हैं। तिनका ब्रह्मास्‍त्र बन कर कौवा का पीछा करने लगता है और अंत में वह व्याकुल होकर श्रीराम की शरण में जाता है, जिसपर राम उसे क्षमा कर प्राण दान दे देते हैं किन्तु उसके अपराध के लिए उसे एक नेत्र विहीन कर देते हैं।

किष्किंधा कांड के अनुसार बालि वध के पश्‍चात् श्री राम ने सुग्रीव को किष्किंधा का राज्य सौंप दिया। इसके बदले में सुग्रीव ने सीता जी के खोज अभियान में सहायता करने का वचन दिया था। किन्तु, सुग्रीव राजसुख में अपना वचन भूल बैठा। तब क्रोधित श्रीराम ने लक्ष्मण को अपना दूत बना कर सुग्रीव के पास भेजा, ताकि उसे उसके वचन की याद दिलाई जा सके। लक्ष्मण सुग्रीव के पास पहुंचे और उसे भोग-विलास में लिप्त देखकर क्रोधित हो गए। बाद सुग्रीव राम से क्षमा मांगी और अपने श्रेष्ठतम सेनानायक हनुमान को श्री राम की सेवा में नियुक्त किया।

रामचरित मानस के अनुसार लंका पर चढ़ाई के लिए सेतु निर्माण आवश्‍यक था। इसके लिए भगवान श्री राम अपने भ्राता लक्ष्‍मण के साथ तीन दिन तक समुद्र से रास्‍ता देने की प्रार्थना करते रहे। लेकिन समुद्र नहीं माना। इस संबंध में गोस्वामी जी ने लिखा है-

बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीनि दिन बीति। बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति॥

तब भगवान राम ने क्रोध में लक्ष्मण से कहा- धनुष-बाण लाओ, मैं अग्निबाण से समुद्र को सुखा डालूं। मूर्ख से विनय, कुटिल के साथ प्रीति और कंजूस से सुंदर नीति की बात अच्छी नहीं लगती है। उनके ऐसा निश्चय करते ही समुद्र देवता थर-थर कांपने लगे तथा उपस्थित हो प्रभु श्री राम से शांत होने की प्रार्थना करने लगे और उन्होंने राम-सेना के समुद्र पार उतरने का उपाय बताया। तदनुसार सेतु निर्माण हुआ।

रामचरितमानस के अनुसार सदा शांत रहने वाले और वितरागी स्‍वभाव के श्री राम अपने जीवन काल में मात्र चार बार क्रोधित हुए हैं।

किन्तु, वाल्मीकि रामायण की कथा श्रीराम के क्रोध का नया स्वरूप बतलाती है। यह प्रसंग तब का है जब पंचवटी से माता जानकी का अपहरण हो गया था और श्रीराम अपने भाई लक्ष्मण के साथ उन्हें वन में ढूँढ़ते फिर रहे थे पर कोई संकेत नहीं मिल पा रहा था। वे वन,नदी,पर्वत सबसे जानकी के बारे में पूछ रहे थे किन्तु,कोई उत्तर उन्हें नहीं मिल रहा था। ऐसी स्थिति में वे सहसा बहुत क्रोधित हो जाते हैं। विचित्र स्थिति यह है कि यहाँ पर श्रीराम और लक्ष्मण की भूमिकाएँ बदल जाती है। जो लक्ष्मण राम के विरुद्ध कुछ भी अनुचित होता देख कर प्राय: क्रोध में आ जाया करते थे और राम उन्हें शांत किया करते रहते थे, वही लक्ष्मण यहाँ राम के क्रोध को शांत करने की भरपूर चेष्टा करते दिखाई देते हैं।

इस प्रसंग में राम लक्ष्मण से कहते हैं—हे सौम्य! प्रतीत होता है कि देवता लोग मेरे कोमल हृदय, लोकहित में तत्परता, जितेन्द्रिय और दयालु होने के कारण मुझे पराक्रमहीन मानते हैं।

मृदुं लोकहितेे युक्तं दान्तकरुण वेदिनम्।

निवीर्य इति मन्यन्ते नूनं मा त्रिदशेश्वरा:।।

इसलिए लक्ष्मण, अब देखो अब मैं अपने कोमल गुणों को अलग कर अपने तेज को प्रकट करता हूँ। इस तेज के प्रकट होने पर न तो यक्ष, न गन्धर्व, न पिशाच, न राक्षस, न किन्नर और न ही मनुष्य ही सुख पाएँगे। हे लक्ष्मण, देखो, मैं अपने अस्त्र रूपी बाणों से आकाश को ढंके देता हूँ। जिससे तीनों लोकों में आने-जाने वाले विमानों का मार्ग ही बंद हो जाएगा। ग्रहों की गति रुक जाएगी, चन्द्रमा जहाँ कि तहाँ स्थिर हो जाएगा। वायु, अग्नि और सूर्य की द्युति के ढक जाने से सर्वत्र अंधकार छा जाएगा।

मैं पर्वतों के शिखरों को काट कर गिरा दूँगा, जलाशयों को सुखा दूँगा और वनों को वृक्ष, लता और झाड़ों से शून्य कर दूँगा।समुद्रों को उजाड़ दूँगा।

यदि देवतागण सीता को कुशलपूर्वक मुझे न देंगे,तो मैं तीनो लोकों में प्रलयकाल उपस्थित कर दूँगा।

त्रैलोक्यं तु करिष्यामि संयुक्तं कालधर्मणां।

न तां कुशलिनीं प्रदास्यन्ति यदीश्वरा:।।

हे लक्ष्मण, मैं देवताओं को अभी अपना पराक्रम दिखला दूँगा। आकाश में जाकर भी कोई न बच सकेगा। क्रोध में भरकर इस त्रैलोक्य का नाश करते समय कोई भी मेरे सामने टिक न सकेंगे। देवताओं, दानवों, यक्षों और राक्षसों के भी जो लोक हैं वे मेरे बाणों की मार से खंड-खंड हो नीचेे गिर पड़ेंगे। मैं अपने बाणों की मार से आज लोकों की मर्यादा भंग कर दूँगा।

बहुधा न भविष्यंति बाणौघै शकलीकृता:।

निमर्यादानिमाँल्लोकान्करिष्याम्यद्य सायकै:।।

जब तक देवता मुझे सीता को न लौटा देंगे मैं चराचर सहित सारे जगत को ही नहीं, प्रत्युत तीनों लोकों को नष्ट कर डालूँगा। इस तरह राम ने क्रोध के मारे नेत्रों को लाल लाल कर, हाथ में धनुष ले लिया। फिर चमचमाता और सर्प के विष के समान भयंकर बाण ले धनुष पर रखा।

सीता जी के हरण से क्लेशित और संतप्त तथा प्रलयकालीन अग्नि की तरह लोकों का नाश करने में तत्पर, बार-बार प्रत्यंचा युक्त धनुष को देखते हुए और लम्बी लम्बी सांसें लेते हुए तथा युग के अन्त में सम्पूर्ण जगत को रुद्र की तरह भस्म करने को तत्पर, अपूर्व विलक्षण क्रोध से युक्त, श्रीराम को देख, लक्ष्मण जी हाथ जोड़कर उनसे बोले।

आप दयालु स्वभाव, जितेन्द्रिय और प्राणिमात्र के हित में रत होकर, इस समय क्रोध के वश में हो, अपने स्वभाव को न त्यागिए। जैसे चन्द्रमा में श्री, सूर्य में प्रभा, वायु में गति और पृथ्वी में क्षमा नियमित रूप से रहती है, वैसे ही आप में इन चारों गुणों सहित उत्तम यश स्थित है। आपके लिए यह उचित नहीं है कि एक के अपराध के लिए सम्पूर्ण जगत का नाश करें। राजा लोग अपराध के अनुसार दंड देने वाले होकर भी दयालु और शांत हुआ करते हैं और आप तो सदा सब प्रणियों के रक्षक और उनकी परमगति हैं। हे नरेन्द्र! शील, साम, विनय और नीति से यदि आपको सीता न मिले, तो आप इन्द्र के वज्र के समान स्वर्ण पुखों वाले तीरों से लोकों को नष्ट कर डालिए। अर्थात् दण्ड नीति का प्रयोग आप तब करें जब तक आपकी अन्य नीतियां विफल न हो जाएँ।

श्रीराम के चरणस्पर्श कर लक्ष्मण ने आगे समझाया– हे राम, यदि आप ही इस प्राप्त हुए दु:ख को नहीं सहेंगे, तो अज्ञानी, अल्पबुद्धि वाले दूसरो लोगों में कौन सह सहेगा। हे नरश्रेष्ठ आप अपने चित्त को संभालिए। क्योंकि कौन ऐसा प्राणी है, जिस पर विपत्ति नहीं पड़ती और अग्नि की तरह स्पर्श कर क्षण भर में ही नहीं निकल जाती। आपको साधारण लोगों की तरह शोक करना उचित नहीं। क्योंकि आप जैसे यथार्थदर्शी महात्मा शोक से विकल नहीं होते। हे महाप्राज्ञ! आपकी बुद्धि को देवता भी नहीं पा सकते। हे राम, आप अपने दिव्य और मानवी पराक्रम की ओर देखकर, शत्रुवध का प्रयत्न कीजिए। सबका नाश कर आप क्या करेंगे। आप उसी शत्रु को खोजिए, जिसने सीता हरी है और उसी का आप नाश कीजिए।

जब लक्ष्मण ने श्रीराम को इस प्रकार समझाया, तब सारग्रही राम शांत हुए और उन्होंने अपने क्रोध को त्यागकर अपने विचित्र धनुष की प्रत्यंचा उतार दी।

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