8.17 जातक कथाओं में राम — बौद्ध-धर्म भी राम से प्रभावित.

8.17 जातक कथाओं में राम — बौद्ध-धर्म भी राम से प्रभावित.

भारत में उत्पन्न कोई भी धर्म, राम के उज्जवल चरित्र और उनके आदर्शों से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका।इसी कारण जैनियों ने राम चरित्र पर अपने ग्रंथ रचे और बौद्ध धर्म ने भी जातक कथाओं में राम को आदर्श के रूप में अपनाया।इन धर्मों की अपनी मान्यताएँ और स्थापनाएँ रही हैं,जिनमें रामकथा को ढालने के कारण राम कथा का स्वरूप यहाँ आकर अलग दिखाई देता है।बौद्ध धर्म के सिद्धांत और उनके आचार-विचार यद्यपि ब्राह्मणों की यज्ञप्रधान और वर्णवादी-व्यवस्था के विरोधी थे।फिर भी श्रीराम ही ऐसे सूत्र थे,जो दोनों विचारधाराओं को जोड़ते हैं।इसीलिए ‘दशरथ जातक’ में महात्मा बुद्ध भी पूर्वजन्म में स्वयं को ‘राम’ होना बतलाने का मोह संवरण न कर सके।

इस जातक का कथा-सार इस प्रकार है— एक समय की बात है किसी गृहस्थ के पिता की मृत्यु हो गई,इस पर वह शोक में डूब गया और उसने अपना सारा काम-काज त्याग दिया।यह जानकर बुद्ध ने उससे कहा कि प्राचीन-काल में पंडित लोग अपने पिता के मरण पर किंचित् शोक नहीं करते थे।इसके बाद उन्होंने दशरथ के मरने पर राम के धैर्य का उदाहरण देते हुए उसे ‘दशरथ-जातक’ सुनाया। इसके अनुसार किसी समय दशरथ वाराणसी के राजा थे और अपनी प्रजा का धर्मपूर्वक पालन करते थे।इनकी ज्येष्ठा महारानी की तीन संतान थी: दो पुत्र (राम-पंडित और लक्खन) और एक पुत्री (सीता देवी)।इस महारानी की मृत्यु के बाद राजा ने एक दूसरी को ज्येष्ठा के पद पर नियुक्त किया।उसके भी एक पुत्र (भरत कुमार) उत्पन्न हुआ।राजा ने उसी अवसर पर उसको एक वर दिया।जब भरत की अवस्था सात वर्ष की थी,रानी ने अपने पुत्र के लिए राज्य माँगा। राजा ने स्पष्ट इन्कार कर दिया। पर जब रानी बाद में भी बार-बार इसके लिए दबाव ड़ालने लगी तब राजा ने उसके षड्यन्त्रों के भय से अपने दोनों पुत्रों को बुलाकर कहा—‘यहाँ रहने से तुम्हारा अनर्थ होने की संभावना है।किसी अन्य राज्य या वन में जाकर रहो और मेरे मरने के बाद लौटकर राज्य पर अधिकार प्राप्त करो’।तब राजा ने ज्योतिषियों को बुलाकर उनसे अपनी मृत्यु की अवधि पूछी।बारह वर्ष का उत्तर पाने पर उन्होंने कहा –‘हे पुत्रों, बारह वर्ष बाद आकर राजछत्र को उठाना’।पिता की वंदना करके दोनों भाई जाने वाले ही थे कि सीता देवी भी पिता से विदा लेकर उनके साथ हो ली।तीनों के साथ-साथ अन्य बहुत से लोग भी चल दिए। उनको लौटाकर तीनों हिमालय पहुँच गए और आश्रम बनाकर रहने लगे।

नौ वर्ष के बाद राजा दशरथ पुत्र वियोग में मर जाते हैं। रानी भरत को राजा बनाने में असफल होती है, क्योंकि अमात्य और भरत भी इसका विरोध करते हैं।तब भरत चतुरंगिणी सेना को लेकर राम को ले आने के उद्देश्य से वन को जाते हैं। आश्रम के पड़ौस में सेना को छोड़कर भरत कुछ अमात्यों के साथ राम के पास जाते हैं।उस समय राम अकेले ही हैं। क्योंकि, लक्ष्मण और सीता वन में फल लेने गए हैं। भरत राम से पिता के देहान्त का सारा वृतान्त कह रोने लगते हैं।राम पंडित न शोक करते हैं न रोते हैं (रामपंडितो नेव सोचि न रोदि)।

संध्या के समय लक्खन और सीता लौटते हैं। पिता के देहान्त का समाचार सुनकर दोनों अत्यंत शोक करते हैं।इस पर राम पंडित उन्हें धैर्य देने के लिए अनित्यता का धर्मोपदेश सुनाते हैं।उसे सुनकर सभी को शोक मिट जाता है।

बाद में भरत के बहुत अनुरोध करने पर भी रामपंडित यह कह कर वन में रहने का निश्चय करते हैं–‘मेरे पिता ने मुझे बारह वर्ष की अवधि के अन्त में राज्य करने का आदेश दिया है। अब लौटकर मैं उनके आज्ञा की अवहेलना नहीं कर सकता।मैं तीन वर्ष बाद लौट आऊँगा।’

जब भरत भी शासन करना अस्वीकार करते हैं तब राम पंडित अपनी तृण की पादुकाएँ देकर कहते हैं, ‘मेरे आने तक यह शासन करेंगी’।

पादुकाओं को लेकर भरत, लक्ष्मण और सीता अन्य लोगों के साथ वाराणसी लौटते हैं। अमात्य इन पादुकाओं के सामने राज- कार्य करते हैं। अन्याय होते ही पादुकाएँ एक दूसरे पर आघात करती हैं और ठीक निर्णय होने पर वे शांत रहती हैं।

तीन वर्ष बीतने पर रामपंडित लौटकर अपनी बहन सीता से विवाह करते हैं और सोलह सहस्त्र वर्ष तक धर्मपूर्वक राज्य करने के बाद वे स्वर्ग चले जाते हैं।

जातक के अन्त में बुद्ध बतलाते हैं कि उस समय महाराजा सुद्दोधन महाराज दशरथ थे, महामाया (बुद्ध की माता) राम की माता, यशोधरा (राहुल की माता) सीता, आनन्द भरत थे और मैं राम पंडित था।

एक और जातक ‘अनामकं जातकम्’ है, जिसमें किसी भी पात्र के नाम का उल्लेख नहीं हुआ है, लेकिन राम और सीता का वनवास,सीता-हरण, जटायु का वृतान्त, वालि और सुग्रीव का युद्ध, सेतुबंध, सीता की अग्नि-परीक्षा, इन सबके संकेत मिलते हैं। इसमें एक महत्वपूर्ण अन्तर यह है कि राम की विमाता के कारण पिता द्वारा वनवास नहीं दिया जाता। वे अपने दुष्ट मामा के आक्रमण की तैयारियों का समाचार सुनकर व्यर्थ के रक्तपात को रोकने के उद्देश्य से स्वेच्छा से अपना राज्य छोड़ देते हैं और वन में चले जाते हैं।इस जातक की आगे की कथा और रोचक है जो संक्षेप में इस प्रकार है:: बोधिसत्व (राम) पहाड़ी वन में निवास करता था।समुद्र में दुष्ट नाग रहता था।उसने ऋषि का छद्म वेष धारण कर लिया।जिस समय राजा वन में फल लेने गया था, नाग रानी का अपहरण कर भाग निकला। समुद्र की ओर उसका पथ दो घाटियों के तंग रास्ते से था। पहाड़ी पर एक विशाल पक्षी रहता था जिसने पंख फैलाकर रास्ता रोक लिया। नाग ने पक्षी को मारा और उसका एक पंख तोड़ डाला। अन्त में वह समुद्र में स्थित अपने द्वीप को लौट गया।

इधर जब फल तोड़ कर राजा लौटा,अपनी रानी को न पाकर वह बहुत दुखी हुआ और धनुष-बाण लेकर रानी की खोज में इधर-उधर घूमने लगा। एक नदी के स्त्रोत पर पहुँचकर राजा ने एक बड़े बंदर को देखा जो उदास और खिन्न था। पूछने पर बंदर ने कहा ‘मैं राजा था, मेरे चाचा ने मेरा राज्य छीन लिया है।अब मेरा कोई साथी नहीं रहा।’ राजा ने भी अपना सब वृतान्त सुनाया। एक-दूसरे की सहायता के लिए वचनबद्ध होकर उन दोनों ने मैत्री कर ली।दूसरे दिन बन्दर ने अपने चाचा से युद्ध किया। राजा (बोधिसत्व) ने धनुष-संधान किया,जिसे देखते ही बन्दर का चाचा मारे डर के भाग निकला।

बन्दर ने अपने साथियों को बोधिसत्व की रानी को खोजने की आज्ञा दी। एक-एक कर वे सभी चल पड़े। बन्दरों ने एक घायल पक्षी को देखा।पक्षी ने बताया कि नाग ने रानी को चुराया है।

बन्दरों के राजा ने अपनी सेना को समुद्र के पार करने में असमर्थ पाया। इन्द्र ने छोटे बंदर का रूप धारण करके कहा–‘प्रत्येक बन्दर को पर्वत का एक एक टुकड़ा लाने की आज्ञा दो।समुद्र पर पुल बन जाएगा और आप द्वीप पर पहुँच जाएँगे’।

बन्दरों ने ऐसा करके समुद्र पार किया।सब बन्दरों ने नाग द्वीप को घेर लिया। नाग ने ऐसा घना घुआँ उत्पन्न किया जिससे सभी पृथ्वी पर गिर पड़े। छोटे बन्दर (इन्द्र) ने एक दिव्य औषधि निकाली और सबको सुंघाकर उन्हें स्वस्थ कर दिया।

अब नाग ने आँधी और बादल से सूर्य को छिपा लिया। बिजली चमकने लगी। छोटे बन्दर ने बतलाया कि बिजली ही नाग है। इस पर राजा ने एक बाण से नाग को मार गिराया।

छोटे बन्दर ने रानी को मुक्त किया।राजा अपने मामा का देहान्त सुनकर अपने देश चला गया।राजा और रानी के प्रभाव से सब वर्ण अपने-अपने धर्म का पालन करने लगे। बुद्ध ने भिक्षुओं से कहा ‘तब मैं राजा था, गोपा रानी थी, देवदत्त मामा था और मैत्रेय इन्द्र था।

इसके अतिरिक्त दशरथ कथानम् जातक, साम जातक,वेसन्तर जातक,संबुला जातक,महासुत सोम जातक और आदिच्चुपट्ठान जातक पर भी रामकथा की छाया देखी जा सकती है।

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दि. 31जनवरी,2021 को स्वदेश,भोपाल में प्रकाशित आलेख की छायाप्रति.

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