हमारी धार्मिक कथाओं में ‘वरदान’ या ‘शाप’ महति भूमिका निभाते नजर आते हैं।इसके जरिए यह भी पता लगता रहा है कि जो कुछ भी हुआ है, वह क्यों हुआ।हमारे दोनों महान ग्रंथों ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ में ऐसी तमाम कथाएँ भरी पड़ी हैं,जिसकी खास वजह वरदान या शाप देना ही रहा है।ऐसा माना जा सकता है कि उन दिनों भक्ति या तपस्या के कारण वरदान/शाप देने वालों में इतनी शक्ति पैदा हो जाती थी कि उनके वचन तत्काल फलीभूत हो जाते थे।इसलिए पुराने लोग साधु-संतों की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए उनकी भक्तिभाव से सेवा करते थे और इस बात से डरते थे कि वे कहीं नाराज होकर कोई शाप न दे बैठें। हमारे एक ऐसे ही महान तपस्वी ऋषि थे दुर्वासा,जो प्रसन्न होने पर सेवक को वर देकर निहाल कर सकते थे तो नाराज होने पर शाप देकर तबाह भी।आम लोग तो छोड़िए राजा-महाराजा भी इनके पधारने की खबर सुन कर थर-थर कांपने लगते थे कि बाबा कहीं नाराज न हो जाएँ और उनके शाप से हमारा सर्वनाश न हो जाए।इसलिए सभी सावधानी से उनकी सेवा में लग जाते थे।
यहाँ हम रामकथा के संदर्भ में देखते हैं कि वरदान और शाप ने कैसी-कैसी भूमिकाएँ निभाईं।रामकथा के दो प्रमुख पात्र ‘राम’ और ‘रावण’ की उत्पत्ति ही शाप और वरदान के कारण हुई है।इसलिए पहले देखा जाए कि वरदान का क्या रोल रहा।अध्यात्म रामायण, रामचरित मानस और कश्मीरी रामायण के अनुसार कश्यप-अदिति ने भगवान विष्णु की घोर तपस्या की।जिसके फलस्वरूप भगवान विष्णु प्रकट हुए और वर मांगने के लिए कहा।उन्होंने स्वयं विष्णु को पुत्र रूप में प्राप्त करने की इच्छा प्रकट की।तब विष्णु ने उन्हें वरदान दिया कि वे जब अगले जन्म में दशरथ और कौशल्या के रूप में जन्मेंगे तब वे उनके यहाँ पुत्र के रूप में प्रकट होंगे।कृतिवास रामायण में विष्णु, कश्यप-अदिति की ओर इशारा करते हुए देवताओं से कहते हैं कि दशरथ और कौशल्या ने मेरी सेवा की है और मैं उनको यह वर दे चुका हूँ कि मैं तुम्हारे घर जन्म लूँगा।शतपथ ब्राह्मण की कथा के अनुसार ब्रह्मा के पुत्र स्वायंभू मनु प्रजा की कामना से प्रेरित होकर आराधना और तपस्या में प्रवृत हुए।विष्णु पुराण में स्वायंभू और शतरूपा की संतति का वर्णन किया गया है।भागवतपुराण में भी स्वायंभू के विरक्त हो जाने और अपनी पत्नी के साथ वन में तपस्या करने की कथा वर्णित है।पद्मपुराण के अनुसार स्वायंभू ने तपस्या कर विष्णु से यह वर प्राप्त किया कि विष्णु तीन जन्मों में उनके पुत्र बनें।तद्नुसार स्वायंभू-शतरूपा क्रमश: दशरथ-कौशल्या,वसुदेव-देवकी प्रकट हुए और कलियुग में संभल ग्रामवासी ब्राह्मण हरिगुप्त तथा उनकी पत्नी देवप्रभा के रूप में प्रकट होंगे।राम रहस्य और तत्वसंग्रह रामायण में भी इससे मिलती-जुलती कथा आती है।
अब देखें कि शाप के कारण क्या-क्या हुआ।विष्णु को शाप की एक कथा मत्स्यपुराण में है।जिसके अनुसार भृगु की पत्नी का वध करने के कारण भृगु ने विष्णु को सात बार मनुष्य का अवतार लेने का शाप दिया।लिंगपुराण,वायुपुराण,ब्रह्माण्ड पुराण और देवीभागवतपुराण में भी ऐसी ही कथा मिलती है।वाल्मीकि रामायण के अनुसार भृगु ने विष्णु को बहुत समय तक पत्नी वियोग सहने का शाप दिया था,जिसके फलस्वरूप रामावतार में सीता-त्याग की घटना हुई।
एक दूसरी कथा वृंदा शाप की आती है।इसका उल्लेख स्कंदपुराण,शिवमहापुराण,पद्म पुराण और योगवशिष्ठ रामायण में हुआ है।कथा के अनुसार दैत्य जलंधर शिव से युद्ध करते हुए अपनी पत्नी वृंदा के सतीत्व के कारण अजेय रहे।इस पर विष्णु ने जय-विजय की सहायता से वृंदा का सतीत्व भंग किया।भेद खुलने पर वृंदा ने जय-विजय को राक्षस हो जाने का और विष्णु को मनुष्य हो जाने का शाप दिया और कहा कि ये दोनों तुम्हारी पत्नी का हरण करेंगे।तत्वसंग्रह रामायण में राम स्वयं वृंदा-शाप को सीता हरण का कारण मानते हैं।रामचरित मानस में इस कथा का मात्र उल्लेख हुआ है,जो इस प्रकार है:-
छल करि टारेउ तासु व्रत,
प्रभु सुर कारज कीन्ह।
जब तेहि जानेउ मरम तब,
श्राप कोप करि दीन्ह।।
तासु श्राप हरि कीन्ह प्रवाना।कौतुकनिधि कृपालु भगवाना।।
तहाँ जलंधर रावन भएऊ।
रन हति राम परम पद दिएऊ।।
तीसरी कथा नारद मोह से संबंधित है।महाभागवतपुराण में नारद का शाप सूर्यवंश में विष्णु के जन्म और सीताहरण का कारण माना गया है।शिवमहापुराण में जो कथा मिलती है,वह रामचरित मानस के वृतान्त से जैसी ही है।श्रीमती (विश्वमोहिनी) को प्राप्त करने के लिए नारद ने विष्णु के पास जाकर हरिरूप मांगा।विष्णु ने उन्हें हरि अर्थात् वानर का रूप दिया और स्वयं विश्वमोहिनी के स्वयंवर में जाकर उसे प्राप्त किया।उस स्वयंवर में दो शिवगणों ने नारद का उपहास किया और नारद के शाप के कारण वे रावण और कुंभकर्ण बन गए।नारद ने विष्णु को भी यह शाप दिया कि तुम मनुष्य बनकर वानरों के साथ विरह का दु:ख भोगोगे।
हमारे भोलेनाथ और आदिदेव ब्रह्माजी तो प्राय: असुरों,दैत्यों, दानवों,राक्षसों को उनका मनचाहा वरदान दे बैठते थे,जिससे वे अत्यंत बलशाली बनकर देवताओं के लिए दुखदायी बन जाते थे।राक्षसराज रावण ने भी इनसे वर प्राप्त किए थे और इन्द्रादि देवताओं को परास्त किया था।
कभी-कभी यूँ भी होता था कि वर देने वाले के लिए वरदान शाप जैसे हो जाते थे या शाप भी वरदान बन जाता था।राजा दशरथ ने कैकयी को दो वर देने का वादा किया था,वही वर उनके स्वयं के लिए शाप सिद्ध हो गए।कैकेयी ने राम के राज्याभिषेक के मौके पर राम के लिए चौदह वर्ष का वनवास और भरत के लिए राज्य मांग लिया था।नतीजे में पुत्र-वियोग के कारण दशरथ का प्राणान्त हुआ।अँधमुनि ने भी उन्हें पुत्र-वियोग में प्राण त्यागने का शाप दिया था,जिसे सुनकर उन्हें लगा जैसे वरदान मिल गया हो। रघुवंश के अनुसार दशरथ ने विवाह के पश्चात् अनजाने में मुनिपुत्र को मारा था और क्योंकि उन्हें उस समय तक पुत्र प्राप्त नहीं हो सका था,उन्होंने मुनि से कहा था कि मैं आपका शाप वरदान ही समझता हूँ—-शापोअप्यदृष्टतनयाननपद्मशोभे सानुग्रहो भगवता मयि पातितोअयम्।
मेनका से बलपूर्वक संबंध बनाने पर कुबेर के पुत्र नलकूबर ने रावण को शाप दिया था कि भविष्य में यदि वह असहमत स्त्री से जबरन संबंध बनाने की कोशिश करेगा तो उसके सिर के कई टुकड़े हो जाएँगे।यह शाप कई स्त्रियों के लिए वरदान बन गया,जिसे रावण हर लाया था और जो उसके कैद में थीं।इसी शाप के भय से वह सीता जी को हाथ नहीं लगा सका था।
रामकथा में राम-रावण के जन्म लेने के कारण जो भी हों, कथा विस्तार में वरदान और शाप अहम भूमिका निभाते नजर आते हैं।ये कथा की कई घटनाओं का औचित्य सिद्ध करते हैं और मूल चरित्र को कई दोषारोपण से बचा लेते हैं।

