8.9 रामभक्ति के आचार्य हनुमान्

8.9 रामभक्ति के आचार्य हनुमान्

श्रीराम से निष्प्रयोजन और निष्काम प्रेम करने वालों की यदि सूची बनाई जाए, तो नि:संदेह उसमें हनुमान् जी का नाम सबसे पहले आएगा। यूँ तो माता सीता,भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न का राम के प्रति प्रेम और समर्पण कुछ कम नहीं था।परन्तु, उनका राम से केवल भक्ति का ही नहीं अपितु कुछ और नाता भी था। यहाँ तक कि ऋषि-मुनियों का प्रेम भी निष्काम नहीं था। उनके मन में कुछ न कुछ कामना थी। किसी को भक्ति चाहिए थी, किसी को मोक्ष। कम से कम राक्षसों से सुरक्षा तो चाहिए ही थी। बिना किसी इच्छा के राम के प्रति प्रेम, भक्ति और समर्पण का भाव रखने वालों में एक थीं माता शबरी और दूसरे बजरंगबली। क्योंकि, ये दोनों राम के इस वचन का मर्म जानते थे “मानउ एक भगति कर नाता।”

प्राचीन रामकथा साहित्य में हनुमान् की रामभक्ति का उल्लेख प्रारम्भ में नहीं होता।ऐसा प्रतीत होता है कि हनुमान् की रामभक्ति संबंधी अवधारणा धीरे-धीरे पनपी। फिर भी इसका प्राचीनतम उल्लेख वाल्मीकि रामायण में मिलता है,जहाँ हनुमान् द्वारा राम से तीन वर मांगने का वर्णन किया गया है।

राम से वर प्राप्ति की कथा के प्रारंभिक रूप में रामभक्ति का उल्लेख नहीं है।इसी तरह देवताओं से वरप्राप्ति के प्राचीनतम वृतान्त भी रामभक्ति के विषय में मौन है। देवतागण हनुमान जी को जो वर देते हैं उनमें ब्रह्मा जी ‘अशस्त्रवध्यता और कामरूपत्व’,इन्द्र द्वारा ‘इच्छानुसार मरण’, सूर्य से सूर्यतेज का शतांश और शास्त्र के अध्ययन में सहायता,’ यम से अरोगत्व, कुबेर से अविषाद, विश्वकर्मा से चिरंजीवत्व, आदि सम्मिलित हैं। पर इनमें रामभक्ति की बात नहीं आई है।किन्तु, बाद के राम-साहित्य में रामभक्ति पर विशेष जोर दिया गया है।

रामभक्ति का भाव समस्त मध्यकालीन राम-साहित्य में व्याप्त है। इसलिए यह स्वाभाविक ही था कि आदि-रामायण के उत्साही और विश्वस्त राम-सेवक हनुमान् को उस साहित्य में आदर्श रामभक्त के रूप में प्रस्तुत किया जाए। शिवमहापुराण की शतरुद्र संहिता में हनुमान् को भक्तवर के साथ ही रामभक्ति के प्रवर्तक होने का श्रेय दिया गया है::

‘स्थायामास भूलोके रामभक्तिं कपीश्वर:।

स्वयं भक्तवरो भूत्वा सीताराम सुखप्रद:।।’

बहुत सी रचनाओं में हनुमान् को रामभक्ति का आचार्य भी माना गया है।

बाद के साहित्य में हनुमान् को मिले वरदानों में उनकी रामभक्ति को सर्वाधिक महत्व दिया गया है।तत्वसंग्रह रामायण में स्वर्गारोहण के अवसर पर राम हनुमान् को यह आशीर्वाद देते हैं–तुम सदा जीवित रहो और रामभक्ति को बनाए रखो।अध्यात्म रामायण के युद्धकांड के अनुसार हनुमान् ने यह वर मांग लिया कि मैं निरंतर रामनाम जपते हुए सशरीर जीवित रह सकूँ।

” त्वनाम स्मरतो राम न तृप्यति मनो मम।

अंतस्त्वन्नाम सततं स्मरन्स्थास्यामि भूतले। यावत्स्थास्यति ते नाम लोके तावत्कलेवरम्।

मम तिष्ठतु राजेन्द्र वरोअयं मेभिकांक्षित:।।

आनन्द रामायण,भावार्थ रामायण आदि रचनाओं में हनुमान् के इस निवेदन का भी उल्लेख है कि जहाँ कहीं रामकथा का पाठ हो रहा हो मैं वहाँ उपस्थित रह सकूँ—-

“यत्र तत्र कथा लोके प्रचरिष्यति ते शुभा। तत्र तत्र गतिर्मेअस्तु श्रवणार्थ सदैव हि।।

तत्वसंग्रह रामायण के एक प्रसंग के अनुसार जब हनुमान् सीता का पता लगा कर राम के पास लौटे तब राम ने उन्हें हृदय से लगाकर यह आशीर्वाद दिया–जहाँ कहीं मेरे नाम का उच्चारण होगा वहाँ तुम उपस्थित रहोगे। अंत में तुम चतुरानन ब्रह्मा बन कर संसार की सृष्टि करोगे और उसके बाद मुझ में मिल जाओगे।तुम वास्तव में शिव हो जो काशी में आने वालों को मेरा मंत्र प्रदान करते हो।कृतिवास रामायण में राम के अभिषेक के अवसर पर सीता हनुमान् को चिरंजीवत्व का वरदान देने के पश्चात् उनसे कहती हैं कि जहाँ कहीं राम-नाम का प्रसंग हो तुम वहीं जाकर उपस्थित रहो।जबकि रामचरित मानस अशोक वाटिका में बैठी माता सीता हनुमान् की रामभक्ति के प्रति पूरी तरह आश्वस्त हो जाने पर उन्हें अजर-अमर होने का वरदान तब देती हैं।

“आसिष दीन्हि रामप्रिय जाना।

“होहु तात बल सील निधाना

अजर अमर गुणनिधि सुत होऊ।

करहु बहुत रघुनायक छोहु।।”

परवर्ती साहित्य में हनुमान् की जन्मकथा के अन्तर्गत रामभक्ति का प्राय: उल्लेख होता है।आनन्द रामायण की जन्मकथा के अनुसार ब्रह्मा हनुमान् को यह वरदान देते हैं कि तुम अमर और अबाधगति होगे,तुम हरि के भक्त बन जाओगे और विष्णु की सहायता भी करोगे।भविष्यपुराण में भी ब्रह्मा के इस वरदान का उल्लेख है।जन्म के बाद माता द्वारा परित्यक्त हनुमान् ने रावण को पराजित किया था और बाद में तपस्या करने लगे थे।इस तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने उनसे कहा कि त्रेतायुग में राम प्रकट होंगे,तुम उनकी भक्ति प्राप्त कर पूर्णकाम बन जाओगे।(तस्य भक्तिं च सम्प्राप्य कृतकृत्यो भविष्यसि।)

भागवत पुराण के एक उल्लेख के अनुसार हनुमान् हिमालय के किंपुरुषवर्ष में अन्य किन्नरों के साथ अविचल भक्तिभाव से राम की उपासना करते रहते हैं।उनकी रामभक्ति की उत्पत्ति के विषय में बंगाली रामकथाओं एक वृतान्त इस प्रकार है—लक्ष्मण शिव की वाटिका में फल तोड़ने गए,वहाँ के द्वारपाल हनुमान् थे,लक्ष्मण उनसे युद्ध करने लगे।बाद में शिव और राम भी वहाँ आ पहुँचे और उन दोनों का भी युद्ध हुआ।अन्त में शिव अपने द्वारपाल हनुमान् को राम के हाथ सौंपते हैं,उस समय से हनुमान् शिव को छोड़कर राम भक्त बन गए।स्कंदपुराण में कई जगहों पर हनुमान् द्वारा शिवलिंग की स्थापना का उल्लेख मिलता है।यहाँ राम और शिव की अभिन्नता और हनुमान् के रुद्रावतारत्व का संकेत भी है।

वाल्मीकीय रामायण के अनुसार रामाभिषेक के अवसर पर सीता ने,राम से जो माला मिली थी,उसे हनुमान् को प्रदान किया।हनुमान् की रामभक्ति सिद्ध करने के उद्देश्य से बाद के राम-साहित्य में इस कथा को एक नवीन रूप दे दिया गया।कृतिवास रामायण के अनुसार हनुमान् ने माला हाथ में लेकर उसे ध्यान से देखा और वह उसकी बहुमूल्य मणियों को तोड़कर खाने लगे।अपने इस व्यव्हार का कारण पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि इस माला में कहीं राम-नाम अँकित नहीं है,इसलिए मेरे लिए इसका कोई मूल्य नहीं है।इस पर लक्ष्मण ने कहा कि तुम अपना शरीर क्यों नहीं छोड़ देते हो।यह सुनकर हनुमान् ने नखों से अपनी छाती फाड़कर दिखलाया कि उनकी अस्थियों में राम नाम लिखा है।भावार्थ रामायण में इस कथा का अन्य रूप है।माला ग्रहण करने के बाद हनुमान् ने विचार किया कि इस माला के कारण मेरे मन मे अहंकार उत्पन्न हो सकता है,इसलिए उन्होंने मणियों को दांतों से फोड़कर कहा कि हम वानरों को भोजन के अतिरिक्त और कुछ नहीं चाहिए।

कुछ रामकथाओं में हनुमान् की रामभक्ति का विशेष ध्यान रखा गया है।आनन्द रामायण के अनुसार हनुमान् ने स्वयं राम का उच्छिष्ट खाया और दूसरे वानरों को भी खिलाया।रंगनाथ रामायण,तोरवे रामायण और भावार्थ रामायण में भी इससे मिलती-जुलती कथाएँ पाई जाती हैं।सेरिराम के अनुसार हनुमान् ने सीता की खोज करने के पूर्व राम के साथ एक ही पत्तल में भोजन किया था।इससे सिद्ध होता है कि हनुमान् की अनन्य रामभक्ति को सिद्ध करने के लिए अनेक कथाओं का आश्रय लिया गया।

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