1.1 रामायण की रचना कैसे और कब हुई.

1.1 रामायण की रचना कैसे और कब हुई.

यह तो हम सभी मानते हैं कि रामायण की रचना महर्षि वाल्मीकि ने की थी।किन्तु,रचना कब और कैसे हुई थी,इसके बारे में कोई निश्चित मत नहीं है।रामायण की रचना कैसे हुई,इसका एक उत्तर तो रामायण स्वयं देती है।कथा के अनुसार एक बार महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में देवर्षि नारद पधारे।तब महर्षि ने उनसे पूछा कि इस समय संसार में सबसे गुणी,वीर,धर्मज्ञ,सत्यवादी, दृढ़व्रत,प्राणी मात्र के हितैषी,विद्वान, समर्थ,धैर्यवान,अति दर्शनीय,क्रोध को जीतने वाले,तेजस्वी,ईर्ष्या रहित कौन हैं? तब नारद जी ने उत्तर दिया कि इक्ष्वाकु कुल में उत्पन्न श्रीराम ही सर्वगुण सम्पन्न हैं।वे मन को वश में करने वाले,बड़े बली,अति तेजस्वी,आनन्दरूप और सबके स्वामी,सर्वज्ञ,मर्यादावान,मधुरभाषी और शत्रुनाशक हैं।वे गंभीरता में समुद्र के समान,धैर्य में हिमालय की तरह,पराक्रम में विष्णु के समान,प्रियदर्शन में चन्द्रमा की तरह,क्रोध में कालाग्नि की तरह और क्षमा करने में पृथ्वी के समान हैं।वे दान देने में कुबेर की तरह और सत्यभाषण दूसरे धर्म हैं।श्रीराम के गुणों का परिचय देने के बाद उन्होंने राम का सम्पूर्ण जीवन चरित्र सुुनाया।

कुछ अवधि के बाद वाल्मीकि के पास जगतपिता ब्रह्मा स्वयं पधारे और उन्होंने वाल्मीकि जी से कहा कि लोकों में धर्मात्मा,गुणवान और बुद्धिमान श्रीराम के चरित्र का वर्णन तुम वैसे ही करो,जैसे कि नारद जी के मुख से सुन चुके हो। तुम श्रीराम की मनोहर तथा पवित्र कथा श्लोकबद्ध करो।यह कह कर वे अन्तर्धान हो गए।ब्रह्माजी का आशीर्वाद पाकर वाल्मीकि जी ने समाधि लगाई और श्रीराम के चरित्रों को वैसे ही देखा,जैसे वे प्रत्यक्षत: उनके सामने घटित हो रही हों।तदनन्तर उन्होंने रामायण की रचना की।तब संधियों और समासों तथा अन्य व्याकरण के अंगों से सम्पन्न करने वाले वाक्यों युक्त,श्रीराम के चरित्र एवं रावण वध काव्य को महर्षि वाल्मीकि ने जनकल्याण हेतु रचा।

“तदुपगत समाससंधियोगं,

सममधुरोपनतार्थ वाक्य बद्धम्।

रघुवर चरितं मुनि प्रणीतं,

दशशिरसश्चवधं निशामयध्वम्।।”

एक मत यह है कि राम संबंधी गाथा-साहित्य की उत्पत्ति इक्ष्वाकु वंश में हुई थी।रामायण में लिखा है:

“इक्ष्वाकूणामिदं तेषां राज्ञां वंशे महात्मनाम्।

महदुतपन्नमाख्यानं रामायणमिति श्रुतम्।।”

अर्थात् उन महात्मा इक्ष्वाकुवंश वाले राजाओं के वंश में यह महाकथा उत्पन्न हुई है,जो रामायण के नाम से जगत में प्रसिद्ध है।राम इक्ष्वाकुवंशीय थे।इसलिए इक्ष्वाकुवंश के सूतों ने इनके विषय में गाथाएँ व व्याख्यान सुनाए होंगे।इस तरह राम के चरित्र को लेकर स्फुट आख्यान काव्य का एक विस्तृत साहित्य बढ़ने लगा।महाभारत के द्रोणपर्व और शाँतिपर्व में जो संक्षिप्त राम चरित मिलता है,वह इस प्राचीन आख्यान पर निर्भर प्रतीत होता है।साथ-साथ महाभारत में रामकथा की उपस्थिति यह भी बताती है कि राम संबंधी आख्यान-काव्य का प्रचार कौशल देश तक ही सीमित नहीं था अपितु पश्चिम की ओर भी फैलने लगा था,जहाँ महाभारत की रचना हुई थी।

आदिरामायण की उत्पत्ति के बारे में एक मत यह भी है कि जिस दिन किसी कवि ने रामकथा विषयक स्फुट आख्यान-काव्य का संकलन कर उसे एक कथा-सूत्र में पिरो दिया,उस दिन रामायण की उत्पत्ति हुई।यह कवि कौन था?प्राचीनतम परम्परा वाल्मीकि को आदिकवि मानती है।युद्धकांड की फलश्रुति में लिखा है: आदिकाव्यमिदं चार्ष पुरा वाल्मीकि कृतम्।। कालिदास ने भी रघुवंश में वाल्मीकि को आद्य कवि की उपाधि प्रदान की है—कवेराद्यस्य शासनात्।

आदिरामायण में अयोध्याकांड से युद्धकांड तक कथावस्तु विद्यमान थी।यद्यपि वह भी प्रचलित रामायण में मूल रूप से विद्यमान नहीं है।क्योंकि बाद मेंं इनमें भी बहुत से प्रक्षेप जुड़े।अभिधर्म विभाषा में कहा गया है कि रामायण में बारह हजार श्लोक मिलते हैं।जबकि प्रचलित रामायण का कलेवर चौबीस हजार श्लोकों का है।यह जानना दिलचस्प होगा कि फिर इसका आकार बढ़ा कैसे?आदिरामायण का विकास समझने के लिए उसके प्रचार की रीति को ध्यान में रखना बहुत जरूरी है।बालकांड तथा उत्तरकांड में लिखा है कि वाल्मीकि ने अपने शिष्यों को रामायण सिखला कर उसे राजाओं,ऋषियों और जनसाधारण को सुनाने का आदेश दिया: कृत्स्नं रामायणं काव्यं गायतां परया मुदा।।

ऋषिवाटेषु पुण्येषु ब्राह्मणावसधेषु च।

रथ्यासु राजमार्गेषु पार्थिवानां गृहेषु च।।

इससे ज्ञात होता है कि रामायण मौखिकरूप से प्रचलित थी।कुशीलव सारे देश में उसे गा कर सुनाते थे और इस प्रकार अपनी जीविका चलाते थे।वे काव्योपजीवी ही थे,रामायण उन्हें कंठस्थ थी और वे अपने पुत्रों को सिखलाते थे।रामायण का कोई ग्रंथ प्रचलित नहीं था और प्राचीन फलश्रुति श्रवणफल-स्तुति ही है: श्रुत्वा रामायणमिदं दीर्घमायुश्च विन्दति।

बाद में रामायण पढ़ने तथा लिखने का भी उल्लेख मिलता है:

रामायणमिदं कृत्स्नं श्रृण्वत: पठत: सदा।।

ये लिखन्तीह च नरास्तेषां वास्त्रिविष्टपे।।

कुशीलव रामायण को गाते-गाते अपने श्रोताओं की रुचि का भी ध्यान रखते होंगे।जिन गायकों में काव्यकौशल था वे लोकप्रिय अंशों को बढ़ाते थे और इसी तरह आदिरामायण का कलेवर बढ़ने लगा।

आदिरामायण की कथावस्तु न केवल बीच के प्रक्षेपों के कारण बढ़ने लगी वरन् राम कौन थे,सीता कौन थी,इनका विवाह कब और कैसे हुआ आदि ऐसे स्वाभाविक प्रश्न थे,जो श्रोताओं के मन में उठते थे।जनसाधारण की इन जिज्ञासाओं को दूर करने के लिए बालकांड की रचना की गई।यह बाद की रचना ही है।इसकी शिथिल शैली पर आदिकवि की छाप नहीं है।राम के बाल चरित के अलावा उसकी नई सामग्री पौराणिक कथाएँ और अवतारवाद की भावना है।उत्तरकांड में यह अवतारवाद अत्यंत व्यापक है।इससे स्पष्ट है कि इसे बालकांड के बहुत बाद में रचा गया है।फिर भी यह ध्यान रखने योग्य बात है कि रामकथा के विकास में आदिरामायण के प्रक्षेप अर्थात् बालकांड,उत्तरकांड,अवतारवाद मूल आदिरामायण के प्रामाणिक अंशों से कम महत्वपूर्ण नहीं हैं।दूसरी शताब्दी ई. से लेकर रामायण अपना प्रचलित रूप धारण कर चुकी थी और तब से कवियों तथा जनसाधारण ने प्रामाणिक तथा प्रक्षिप्त सामग्री में कोई अंतर नहीं माना।

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