रावण सीता जी का अपहरण कर उन्हें लंका ले तो आया,फिर सोचने लगा कि अब ऐसा क्या किया जाए,जिससे जानकी मुझ पर प्रसन्न हो सके।उसने तब अपने अन्त:पुर में सीता जी को ले जाकर बैठा दिया और राक्षसियों को आज्ञा दी कि मेरी आज्ञा के बिना कोई भी सीता से मिलने न पाए।उसने यह भी कहा कि यदि सीता वस्त्र-आभूषण आदि जो भी मांगे वह वस्तु उसे बिना मुझसे पूछे तत्काल दे देना।जानकर या अनजाने में भी अगर कोई सीता से कठोर वचन कहेगा,तो मारा जाएगा।फिर उसने विचार किया कि मैंने अपना वैभव तो सीता को दिखलाया ही नहीं।तब उसने शोक से पीड़ित और उदास सीता को बरजोरी अपना देवगृह तुल्य दिव्य-भवन दिखाया।उस घर के खम्बे हाथी दांत,सुवर्ण, स्फटिक,चांदी और वैडूर्य के रमणीक काम से सज्जित थे।मणि-माणिक्य का भवन में प्रचुरता से उपयोग किया गया था।भवन कई तल के थे और उसमें अनेक अटारियाँ थी,जिनमें सोने के जंगले लगे हुए थे।भवन में जगह-जगह अनेक पुष्करणियाँ बनी हुई थीं,जिनके चारों ओर विभिन्न प्रकार के वृक्ष थे,जिन पर अनेक पक्षी कलरव कर रहे थे।पर यह सब ऐश्वर्यपूर्ण दृश्य सीता जी को तनिक भी नहीं सुहा रहे थे।
रावण उन्हें लुभाने के लिए बोला-“यह समस्त राज परिकर मेरे सहित तुम्हारे ही अधीन हैं।क्योंकि मैं तुम्हें प्राणों से प्रिय समझता हूँ।इसलिए तुम मुझे स्वीकार कर लो।इसके विपरीत तुम कुछ सोचोगी भी तो कोई परिणाम नहीं निकलेगा।यहाँ से तुम्हें कोई नहीं ले जा सकता।किसी का भी यहाँ पहुँचना असंभव है।सौ योजन विस्तार वाली लंका चारों ओर से एक हजार योजन तक समुद्र से घिरी हुई है।किसी में इतना सामर्थ्य नहीं जो कोई यहाँ तक पहुँच सके।फिर मेरे पराक्रम का सामना करने के बारे में देवताओं सहित कोई सोच भी नहीं सकता।” पुन: समझाने वाले स्वर में सीता जी से बोला “देखो,राज्य से च्युत,दीन,भिक्षुक,पैदल घूमने वाले मनुष्य जाति के अल्प तेज वाले राम को लेकर क्या करोगी। तुम फिर से राम से मिलने की आशा भी मत रखो।क्योंकि कोई कल्पना में भी कोई यहाँ आ नहीं सकता।इसलिए,हे सीते,तुम तो मुझे ही अपनाओ,क्योंकि तुम्हारे योग्य पति तो मैं ही हूँ।यह यौवन सदा नहीं रहता।अत: जब तक है,मेरे साथ विहार करो।अब तू ही इस लंका के विशाल राज्य का पालन कर,केवल मैं ही नहीं,समस्त देवता और समस्त चराचर तेरे अनुचर बन कर रहेंगे।पूर्व जन्म में तेरे कुछ पाप रहे होंगे,वे वनवास करने से नष्ट हो गए और जो पूर्वजन्म के पुण्य बाकी हैं,उनके फलों को तू लंका में रह कर उपभोग कर।”
राक्षसेश्वर रावण फिर बोला “हे वैदेही,धर्म के लोप हो जाने की शंका से तेरा लज्जित होना व्यर्थ है।क्योंकि,राक्षस-विवाह भी तो ऋषि प्रोक्त विवाह है।यह कोई अधर्म कार्य नहीं है। देखो,मैं अपना सिर तेरे कोमल चरणों में रखता हूँ।(पादौ मयास्निग्धौ शिरोभि परिपीडतौ।)ऐसा कह कर रावण ने अपना सिर वैदेही के चरणों में रख दिया और बोला “अब तू मुझ पर प्रसन्न हो जा।मैं तेरा वशवर्ति दास हूँ।मैंने ऐसी अधीनताई की बातें केवल तुझसे कही है।नहीं तो रावण ने आजतक किसी स्त्री के पैरों पर अपना सिर नहीं रखा।”
“प्रसादं कुरु में क्षिप्रं वश्यो दासोअहमस्मि ते।
इमा: शून्या मया वाच: शुष्यमाणेन भाषिता:।
न चापि रावण: काश्चिन्मूर्ध्ना स्त्री प्रणमेत ह।।
ऐसा कहे जाने पर शोक संतप्त सीता जी ने तिनके की आड़ ले कर,निर्भय हो रावण से कहा “हे पापी रावण, श्रीराम ही मेरे पति और देवता हैं।वे तीनो लोकों में धर्मात्मा के नाम से विख्यात हैं।वे अत्यंत बलशाली हैं।यदि वे प्रज्वलित नेत्रों से तुझे देख भी लें तो तू पराभव को प्राप्त हो भस्म हो जाए।(यदि पश्येत्स रामस्त्वां रोषदीप्तेन चक्षुसा।रक्षस्वमद्यं निर्दग्धो गच्छे: सद्य: पराभवम्।।) उनके लिए कोई भी कार्य असंभव नहीं है।उन्होंने खर,दूषण,त्रिशरा सहित चौदह हजार राक्षसों की सेना को पल भर में नष्ट कर दिया था।यदि कहीं उनकी उपस्थिति में तूने मुझे बलपूर्वक हरने का साहस किया होता तो तू आज युद्ध में मारा जाकर जनस्थान में खर की तरह भूमि पर सोया होता।
प्रत्यक्षं यद्यह तस्य त्वया स्यां धर्षिता बलात्।
शयिता त्वं हत: संख्ये जनस्थाने यथा खर:।।
हे राक्षस,यह शरीर तो निश्चेष्ट है,चाहे तो तू इसे बांध या मार।मुझे न इस शरीर को रखना है न प्राणों को बचाने हैं।
सीता जी के ऐसे रोमांचकारी कठोर वचन सुनकर,रावण भय दिखलाता हुआ कहने लगा।हे सीते सुन,बारह महीने के भीतर तू मुझे स्वीकार न करेगी तो मेरे रसोईए तेरे शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर मेरे लिए कलेवा तैयार करेंगे।तब रावण राक्षसियों से बोला-इस सीता को तुम अशोक वाटिका ले जाओ,वहाँ इसे घेर कर गूढ़ भाव से सदा रखवाली किया करो।
जैनी रामकथा पउमचरियं के अनुसार रावण ने सीता को पहले देवरमण उद्यान और बाद में समन्त-कुसुम-उद्यान में रख दिया था।गुणभद्र के अनुसार सीता को नन्दनवन में रखा गया था।एक वृतान्त में माना गया है कि सीता के चारों ओर अग्नि घिरी हुई थी,इस कारण रावण उन्हें अपने महल में नहीं रख सकता था।कृतिवास रामायण के अनुसार शूर्पनखा ने अशोकवन में सीता के पास आकर मार डालने की धमकी दी थी किन्तु रावण के डर से कुछ कर न सकी।
रावण सीता जी से कोई अनुचित व्यव्हार क्यों न कर सका,बाद की राम कथाओं में इसके कई कारण दिए गए हैं।एक के अनुसार रावण को नल-कूबर ने शाप दिया था कि अनासक्त पर-स्त्री के साथ रमण करने पर उसका सिर फट जाएगा।जैनी रामायणों में माना गया है कि रावण ने पर-नारी के साथ रमण न करने का व्रत लिया है।गुणभद्र के उत्तरपुराण के अनुसार रावण ने हरण के समय भी सीता का स्पर्श इसीलिए नहीं किया था कि पतिव्रता स्त्री के स्पर्श से उसकी आकाशगामिनी विद्या शीघ्र नष्ट हो जाएगी। सेरीराम में माना गया है कि रावण को लंका में सीता से चालीस धनु दूर रहना पड़ता था।
अध्यात्म रामायण में ऐसा कोई विस्तृत विवरण नहीं है जिससे पता चलता हो कि लंका में रावण ने सीता जी के साथ कैसा सुलूक किया था।बल्कि इसमें भक्ति-भाव का विशेष पुट भी जुड़ गया है। इसके अनुसार रावण ने उन्हें अपने अन्त:पुर के एकान्त देश अशोकवन में रखा और राक्षसियों से घेरे में रखकर मातृबुद्धि से उनकी रक्षा करने लगा।
स्वान्त:पुरे रहस्येताम शोकविपिनेअक्षिपत।
राक्षसीभि: परिवृतां मातृबुद्धयाअन्वपालयत्।।
रामचरित मानस में भी भक्ति का भाव ही है।इस कारण रावण सीता जी का हरण करते समय उनके चरणों की मन ही मन में वंदना करते हुए परम सुख का अनुभव करता है।(मन महुँ चरन बंदि सुख माना।)
वाल्मीकि रामायण के एक वृतान्त के अनुसार सीताहरण के बाद ब्रह्मा ने इन्द्र को बुलाकर उनको आदेश दिया था कि सीता जी के पास अन्न ले जाकर उनके प्राण बचा लें।इस पर इन्द्र और निद्रा लंका चले गए।निद्रा ने राक्षसों को सम्मोहित किया जिससे इन्द्र सीता के पास जा सकें।इन्द्र ने सीता को राम के आने का भरोसा दिलाकर उन्हें क्षुधा-तृषा मिटाने वाला पायस खिलाया।यह वृतान्त कुछ बदलाव के साथ बृहद्धर्मपुराण, महाद्देवीभागवतपुराण,आनंद रामायण,कृतिवास रामायण आदि में भी मिलता है।
