इन दिनों नवरात्रि का समय चल रहा है। आज हम एक ऐसी देवी की चर्चा करते हैं,जिनके बारे में आमतौर पर हमें बहुत कम माहिती है। शास्त्रों के अनुसार जब भगवान नारायण ने भगवान नरसिंह का तमस अवतार लिया, तब वे अपने हाथों हिरण्यकश्यप का वध करने के बाद भी शांत नहीं हुए। देवताओं नरसिंह अवतरण को शांत करने के लिए भगवान शिव से प्रार्थना की।महादेव ने तब शरभ का रूप धारण किया जो आधा सिंह और आधा पक्षी था। वे दोनों लम्बी अवधि तक बिना किसी परिणाम के लड़ते रहे। हरि और हर के बीच युद्ध रोकना असम्भव सा लगने लगा था।इसलिए देवताओं ने देवी महाशक्ति महा योगमाया दुर्गा का आह्वान किया, जो अपने मूल रूप से भगवान शिव की पत्नी हैं। उनके पास नारायण को योगनिद्रा में विलीन करने की क्षमता भी थी,क्योंकि वे स्वयं योगनिद्रा हैं। देवी महामाया ने फिर आधे सिंह और आधे मानव का देह धारण किया और उन दोनों के सामने इस तीव्र स्वरूप में प्रकट हुईं और अपने प्रचण्ड हुँकार से उन दोनों को स्तब्ध कर दिया। जिससे उन दोनों के बीच का भीषण युद्ध समाप्त हो गया और सृष्टि से प्रलय का संकट टल गया।
देवी निकुम्भला नारायण और शिव की संयुक्त विनाशकारी शक्ति रखती हैं और शेर और मानव रूपों का संयोजन अच्छाई और बुराई के संतुलन का प्रतिनिधित्व करती हैं। इस देवी को निकुम्भला, प्रत्यंगिरा, अघोर लक्ष्मी,सिद्ध लक्ष्मी, पूर्ण चंड़ी, अथर्वन भद्रकाली आदि नामों से भी जाना जाता है।
यही निकुम्भला या प्रत्यंगिरा देवी रावण की कुल देवी थीं। जिनकी कृपा से वह असीम शक्ति प्राप्त करता था। रावण और मेघनाथ दोनों तंत्रशास्त्र के विशेषज्ञ थे और देवी की तांत्रिक विधि से पूजा कर उन्हें प्रसन्न किया करते थे।
निकुम्भला देवी से संबंधित एक कथा इस प्रकार है–राम-रावण के युद्ध में कुुम्भकर्ण सहित रावण के बड़े-बड़े योद्धा राक्षस मारे जा चुके थे,तब रावण के पुत्र मेघनाथ ने स्वयं युद्ध में जाने का निर्णय लिया। मेघनाथ ऐसा अद्भुत योद्धा था जिसने देवताओं के साथ युद्ध में इन्द्र को बंदी बना लिया था और उसे ला कर लंका के कारागार में बंद कर दिया था। तब इन्द्र को छुड़ाने के लिए देवताओं सहित ब्रह्मा जी को उसके पास आना पड़ा था। उन ब्रह्मा जी को,जिन्हें प्रसन्न करने के लिए रावण को दस हजार वर्ष तक कठोर तपस्या करना पड़ी थी। उन्होंने इन्द्र को मुक्त करने के लिए मेघनाथ को वरदान दिया कि यदि किसी भी युद्ध में जाने से पहले वह अपनी कुलदेवी निकुम्भला का यज्ञ कर लेगा तो किसी के लिए भी उसे हराना असंभव होगा।
इस वरदान के फलस्वरूप, यज्ञ के समाप्त होने के बाद उसमें से एक दिव्य रथ निकलेगा जिसमें बैठने पर से उसे कोई हरा नहीं सकेगा। उस रथ पर उसे न कोई मार सकेगा न ही कोई हानि पहुँचा सकेगा। इसलिए युद्ध में उसकी विजय निश्चित होगी।
आज उसके युद्ध का तीसरा दिन है।दो दिन तक उसने अद्भुत शौर्य का प्रदर्शन किया था। पहले दिन उसने लक्ष्मण को शक्ति से चेतनाशून्य कर दिया था। दूसके दिन राम और लक्ष्मण दोनों को नागपाश में बांध दिया। राम सेना को भारी क्षति पहुंचाई। तीसरे दिन रणभूमि में जाने से पहले अपने शत्रु के शमन और अपने पिता की जीत सुनिश्चित करने के लिए शक्तिस्वरूपा निकुंभला देवी का आवाहन और अनुष्ठान निर्जन एकांत स्थान पर शुरु किया। इस अनुष्ठान के निर्विघ्न समाप्ति के लिए सभी प्रमुख दानवों को तैनात कर दिया गया। उन्हें आदेश था कि जो कोई इस यज्ञ को हानि पहुँचाने की चेष्टा करे,उसका वध कर दिया जाए। इसके साथ ही मेघनाथ ने पूरे आत्मविश्वास,उत्साह और पूरी श्रद्धा के साथ अनुष्ठान आरंभ कर दिया। किन्तु,विभीषण को अपने गुप्तचरों से यह बात पता चल गई। उसने तुरंत भगवान श्रीराम और लक्ष्मण को इसके बारे में सूचित किया और यज्ञ रुकवाने का आग्रह किया। श्रीराम चिंतित हो गए क्योंकि उन्हें मालूम था कि यदि मेघनाथ के यज्ञ से देवी निकुम्भला जागृत हो गईं और अपनी योगिनियों के साथ रणस्थल पर आ गईं, तो उनके पक्ष की भारी हानि हो जाएगी और उनको शांत करना कठिन हो जाएगा।
चूँकि विभीषण कुलदेवी निकुम्भला के मंदिर का मार्ग जानता था यद्यपि वह मार्ग अत्यंत दुर्गम और गोपनीय था, इसलिए वह लक्ष्मण व अन्य वानर सेना की टुकड़ी के साथ उस स्थल पर पहुँच गया। मेघनाथ की सेना के द्वारा एक व्यूह रचना में पहरा दिया जा रहा था जिसे वानर सेना ने हनुमान, सुग्रीव, नल-नील, जामवंत आदि के नेतृत्व में तोड़ दिया। इसके बाद वानर सेना की विशेष टुकड़ी यज्ञस्थल में घुस गई और यज्ञ विध्वंस करना प्रारंभ
कर दिया। लक्ष्मण के नेतृत्व में वानर सेना ने मेघनाथ का यज्ञ विध्वंस कर दिया। यज्ञ के विध्वंस होते ही अत्यंत क्रोध में वहाँ से निकल गया और युद्धभूमि में चला गया।
भगवान ब्रह्मा ने मेघनाथ को वर देते समय यह बताया था कि जो कोई भी उसके यज्ञ को असफल कर देगा, उसी मनुष्य के हाथों मेघनाथ की मृत्यु होगी। इसलिए अंत में मेघनाथ लक्ष्मण के हाथों ही वीरगति को प्राप्त हुआ।यदि वह अपनी कुलदेवी निकुम्भला को प्रसन्न कर पाता,तो वह अजेय हो जाता।

