6.3 “रावण ने जब शिव से पार्वती जी को मांग लिया”

6.3 “रावण ने जब शिव से पार्वती जी को मांग लिया”

सुंदर स्त्रियाँ रावण की सबसे बड़ी कमजोरी थी। जहाँ कहीं भी वह ऐसी स्त्री देखता,उसे पाने के लिए आतुर हो जाता। ऐसी स्त्री भले ही उसके आराध्य की भार्या ही क्यों न हो।इस बारे में आनंद रामायण की एक रोचक कथा यूँ है कि एक बार रावण की माता ने उसे आदेश दिया कि वह भगवान शंकर से आत्मलिंग ले आए। रावण इसके लिए तुरंत तैयार हो कैलाश पहुँच गया । यहाँ उसने भगवान शिव को अपने संगीत से प्रसन्न करने के लिए बहुत दुष्कर कार्य किया। उसने अपने शरीर की आँतों और अन्य अँगों से वीणा बनाई। जिसके बाद षड्ष आदि स्वरों से रावण ने अपने ही मुँह से गंधर्व के समान सुंदर गायन आरंभ किया तथा शंकर जी का स्मरण कर उन्हें अपना एक सिर काट कर चढ़ाया। तब भगवान शंकर ने नंदी को कहा कि तुम रावण के पास जाओ और उसका कटा हुआ सिर वापस उसके कंधे पर जोड़ दो और उससे कहना कि महादेव तुम्हें आत्मलिंग कभी नहीं देेंगे,मैं उनके मन की बात जानता हूँ। तुम वापस चले जाओ।

“तदा नंदीश्वरं प्राहं शंकरो लोक शंकर:।

शिर: संधाय हस्तेन त्वया वाचोअद्य रावण:।।

आत्मलिंग राक्षसं त्वांशंकरौ न प्रदास्यति।

हृद्वतं हि मया ज्ञातं शंभोस्तवं याहि स्वस्थलम्।।

ऐसा लगातार दस दिन तक चलता रहा किन्तु, रावण जाने का नाम नहीं लेता था। अन्त में भगवान शंकर उसके भयानक कृत्य और मनोहर गायन से प्रसन्न हुए।

उन्होंने रावण से वर मांगने के लिए कहा। रावण पार्वती जी के अलौकिक सौंदर्य को देखकर मुग्ध हो गया था। उसने भगवान शिव से दो वर मांगे। एक तो अपनी माता के लिए आत्मलिंग और दूसरा अपने लिए पार्वती को।

“वरयामास मन्मात्रे आत्मलिंग तथा मम। पत्न्यर्थं पार्वतीं देहि तथेत्युक्वा ददौ शिव:।।”

दूसरे वर को सुन कर शिव मन ही मन मुस्कराए। सोचने लगे इसका साहस तो देखो कि यह मुझसे मेरी ही पत्नी मांग रहा है। यह नहीं जानता कि सर्वशक्तिमान,सम्पूर्ण एश्वर्यों का स्वामी और त्रिलोकी का कर्ता-धर्ता होकर भी जब मैं कुपित भवानी को मना नहीं पाता, तब यह रावण आदिशक्ति भवानी को कैसे मना पाएगा। वे तो कुपित होने पर उसका सर्वस्व भस्म ही कर देंगी। फिर भी उन्होंने ‘तथास्तु’ कह दोनों वर रावण को दे दिए। शिव ने रावण को सावधान किया कि इस लिंग को मार्ग में कहीं रख देने पर यह वहीं अटल हो जाएगा। इसके बाद रावण लिंग और पार्वती जी को लेकर चला गया।

यहाँ रास्ते में जाते-जाते पार्वती जी सोचने लगीं कि ये कैसे भोलेनाथ हैं। वर देते समय कुछ विचारते ही नहीं हैं। प्रसन्न हो जाने पर जो जैसा वर मांगता है, वैसा ही दे देते हैं। कोई कितना भी प्रसन्न हो अपनी पत्नी को किसी को दे देता है क्या। न जाने वे किस पिनक में रहते हैं। अब तो भगवान श्रीहरि ही कोई उपाय कर सकते हैं। ऐसा सोच कर इस विपत्ति से छुटकारा पाने के लिए उन्होंने श्रीहरि विष्णु का स्मरण किया। विष्णु ने अपने शरीर के चंदन से सुंदरी मंदोदरी की सृष्टि करके उसे मय के घर में रख दिया। तब वह ब्राह्मण का रूप धारण कर मार्ग में रावण से मिले और उन्होंने रावण से कहा की शिव ने तुम्हें धोखा देकर वास्तविक पार्वती को पाताल में मय के यहाँ छिपा दिया है। यह सुन कर रावण ने शिव के पास जाकर वास्तविक पार्वती को लौटाया और पाताल जाने को उद्यत हुआ। रास्ते में लघुशंका जाने की इच्छा से आत्मलिंग उस ब्राह्मण (विष्णु) के हाथ में दे दिया। देर हो जाने पर विष्णु आत्मलिंग गोकर्ण (कुछ विद्वान इसे आज का गोवा बतलाते हैं, जबकि बिहार की कथा में इस घटनास्थल को वैद्यनाथ मंदिर (देवघर) माना जाता है।) की भूमि पर रखकर अंतर्द्धान हो गए। वापस आकर रावण ने उसे उठाने के बहुत प्रयास किए।किन्तु, वह सफल न हो सका। तब उसने मय के घर आकर विष्णु द्वारा निर्मित मंदोदरी को प्राप्त किया।

रावण के बारे में एक अन्य कथा के अनुसार शूर्पनखा अपने भाई रावण की इस कमजोरी को जानती थी कि वह कितना कामुक है और किसी सुंदर स्त्री के बारे में सुनने पर वह उसे पाने के लिए किस तरह व्याकुल हो जाता है। इस बात का लाभ उठाने के लिए वह लंका आ गई। इसके पूर्व वह राम-लक्ष्मण द्वारा ठुकराई और विरूप की जा चुकी थी। इसका वह बदला लेना चाहती थी। रोते-गाते और आँसू बहाते उसने रावण को बताया कि जन-स्थान में दो महा-शूरवीर योद्धा आ गए हैं। उनके साथ एक अत्यंत मनोहर स्त्री भी है, जो तुम्हारे सर्वथा योग्य है। इसलिए मैंने चाहा था कि उसका हरण करके तुम्हारे पास ले आऊँ।मेरे इसी प्रयास में उन लोगों ने मुझे कुरूप कर दिया और खर-दूषण,त्रिशिरा सहित सम्पूर्ण सेना को समाप्त कर दिया। यदि उन्हें अभी नहीं रोका गया तो वे सम्पूर्ण धरा को राक्षस विहीन कर देंगे। इसके साथ ही उसने सीता के सौंदर्य की भूरि-भूरि प्रशंसा की। रावण यह सुनकर सीता जी को पाने के लिए आतुर हो गया। अब वह किसी भी स्थिति में सीता जी को पाना चाहता था। दूसरी ओर श्रीराम से कोई भी बात छिपी हुई नहीं थी। वे भविष्य में होने वाली घटनाओं के बारे में भी जानते थे। इसलिए एक बार जब लक्ष्मण कंद-मूल एकत्र करने गए हुए थे, एकान्त में श्रीराम ने सीता जी से कहा कि अब मैं कुछ मानव-लीला करना चाहता हूँ। इसलिए तुम कुछ अवधि के लिए अग्नि में निवास करो।

“तुम पावक महुँ करहु निवासा।

जो लगि करौं निसाचर नासा।।

निज प्रतिबिम्ब राखि तहँ सीता।

तैसेइ सील रूप सुबिनीता।।

सीता जी ने ऐसा ही किया। स्वयं अग्नि में चली गईं और अपने प्रतिबिम्ब को छोड़ गईं। यह बात लक्ष्मण भी नहीं जानते थे, तो रावण कैसे जान सकता था। उसने मारीच के साथ मिल कर अनेक प्रपंच रचे और छाया सीता का अपहरण कर लंका ले आया। फिर भी वह कभी सीता जी की छाया को भी छू न सका।

स्वयं को सबसे शक्तिशाली, बुद्धिमान समझने वाले रावण ने इस तरह पार्वती जी के बाद दूसरी बार धोखा खाया।उसे न माया मिली न राम।जो पराई स्त्री पर नजर ड़ालते हैं,उनके साथ ऐसा ही होता है।

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