आज विजयादशमी के दिन को असत्य पर सत्य,बुराई पर अच्छाई,अँधेरे पर प्रकाश की विजय के रूप में मनाते हैं और मानते हैं कि आज के ही दिन श्रीराम ने दुष्ट रावण का वध किया था।किन्तु,अनेक लोगों का मत कुछ अलग है।।एक ज्योतिषाचार्य श्री योगेश मिश्र ने अपनी ज्योतिषीय गणनाओं के आधार पर बताया कि श्रीराम ने रावण का वध दशहरा के दिन (अक्टूबर महीने में)नहीं किया था।बल्कि चैत्र मास के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी(अर्थात् अप्रेल माह)के दिन किया था।ऐसा ही मत आर्य समाज का भी है।उनका कथन है कि रावणवध का दिन अश्विन माह की दशमी न होकर चैत्र माह की चतुर्दशी थी और उसकी अंत्येष्टी अमावस्या को हुई थी।किन्तु,इस आलेख का उद्देश्य रावण के वध का दिन तय करना नहीं,अपितु रावण वध से संबंधित उन रोचक कथाओं को जानना है,जो विभिन्न ग्रंथों में दी गई है।
जैनी राम साहित्य पउमचरियं और अन्य जैन कथाओं में रावण के पश्चाताप का वर्णन किया गया है।बहुरूपविद्या सिद्ध करने के बाद रावण सीता से मिलने आया।सीता ने उसे ठुकराया और यह कह कर मूर्छित हो गई कि मैं तभी तक जीवित रहूँगी,जब तक राम,लक्ष्मण और भामंडल की मृत्यु का समाचार नहीं पाती।रावण सीता का पातिव्रत्य देखकर दयार्द्र हो सोचने लगा कि मैंने उसका अपहरण कर पाप किया है।फिर यह समझकर कि बिना युद्ध किए सीता को लौटाने से मेरा अपयश होगा, रावण ने संकल्प किया कि मैं राम,लक्ष्मण को हराकर सीता उन्हें लौटा दूँगा।तोरवे रामायण के अनुसार भी रावण युद्ध के लिए प्रस्थान करने के पूर्व अपनी सारी सम्पत्ति दरिद्रों बाँट देता है,जेल में बंद सभी कैदियों को रिहा कर देता है और यह आदेश निकालता है कि यदि मैं युद्ध में मारा गया तो विश्वासपात्र विभीषण को गद्दी पर बिठाया जाए।
रावण-वध के बाद के वृतान्तों में अक्सर रावण के मर्मस्थान या रावण की मृत्यु की किसी गुप्त युक्ति का उल्लेख है।अध्यात्म रामायण के अनुसार उसके नाभि में अमृत रखा हुआ है,विभीषण से यह राम ने यह जानकर आग्नेय अस्त्र से उस अमृत को सुखाया था।रावण के शरीर में स्थित अमृत का उल्लेख बहुत सी अन्य रामकथाओं में भी किया गया है।जैसे आनन्द रामायण,रंगनाथ रामायण, धर्म-खण्ड,तत्वसंग्रह रामायण,रामचरित मानस (नाभिकुंड पियूष बस याकें।नाथ जिअत रावण बल ताकें)भावार्थ रामायण आदि।
तत्वसंग्रह रामायण के अनुसार रावण ने जटायु से युद्ध करते समय धोखा देकर कहा था कि मेरा मर्मस्थल पैर का अँगूठा है।खोतानी रामायण और तिब्बती रामायण में भी वही रावण का मर्मस्थान माना गया है।दक्षिण भारत के एक वृतान्त के अनुसार रावण का हँसने वाला सिर उसका मर्म स्थान है।सेरिराम में सीता हनुमान को बताती है कि रावण के दाहिने कान के नीचे जो छोटा सा सिर है उसमें रावण का जीव निवास करता है।
कृतिवास रामायण के अनुसार रावण ने तपस्या करने के बाद ब्रह्मा से अमरत्व का वरदान मांगा था।ब्रह्मा ने उसे ब्रह्मास्त्र देकर कहा कि इस ब्रह्मास्त्र से तुम्हारा मर्मस्थान छेदित हो जाने पर ही तुम मर सकोगे।रावण ने बाद में यह ब्रह्मास्त्र मन्दोदरी की रक्षा में छोड़ दिया।विभीषण ने इस रहस्य को बताया तब हनुमान् ने राम की अनुमति से ब्राह्मण वेश में मन्दोदरी के पास पहुँचकर कहा जब तक ब्रह्मास्त्र तुम्हारे पास है,रावण मर नहीं सकता।पर मुझे आशंका है कि विभीषण कहीं यह बात जान न लें कि तुमने उसे कहाँ पर छिपाकर रखा है।मन्दोदरी ने उत्तर दिया कि मैं बहुत ही सावधान हूँ,मैंने उसे इस खंभे में छिपाकर रखा है।इस पर हनुमानजी ने स्फटिक का वह खंबा लाठी से तोड़ दिया और ब्रह्मास्त्र लेकर राम के पास लौटे।सेरीराम की कथा के अनुसार सीता ने हनुमान् से कहा था कि मन्दोदरी के पास रावण का मायावी खंग है,जिसकी पूजा मन्दोदरी किया करती है।हनुमान् ने सीता के परामर्श से मन्दोदरी के पास जाकर रावण के वध का झूठा समाचार सुनाया,शोक संतप्त मन्दोदरी ने अपना सिर झुका लिया और उस क्षण का लाभ उठाकर हनुमान् ने रावण खंग चुरा लिया,जिससे रावण शक्तिहीन हो गया था।
बिर्होर रामकथा के अनुसार उसके महल के भीतर एक मंजूषा में सुरक्षित था।हनुमान् और लक्ष्मण दोनों ने लंका में प्रवेश कर मंजूषा को खोलकर रावण का जीव मुक्त कर दिया।रामकियेन की कथा में कहा गया है कि रावण का जीव गोपुत्र नामक रावण-गुरु के पास एक मंजूषा में बंद था और हनुमान् ने अंगद के साथ गोपुत्र के पास जाकर उस मंजूषा को छल से प्राप्त कर लिया।ब्रह्मचक्र के अनुसार रावण ने लंकादहन के बाद ही अपना हृदय किसी ऋषि के यहाँ सुरक्षित रखा था,हनुमान् ने रावण का रूप धारण कर उसे प्राप्त किया और राम को दे दिया।
पद्मपुराण के अनुसार अतिकाय और महाकाय ने गुप्तचर के रूप में राम-सेना में प्रवेश किया और पकड़ेे गए,उन्होंने शुक्राचार्य की इस भविष्यवाणी का उद्घाटन कर दिया कि लंका द्वार पर जो लकड़ी का कीर्तिमुख है (दारुपंचवक्त्र),उसके छिन्न-भिन्न हो जाने पर रावण की मृत्यु अवश्यंभावी है।राम ने बाण मार कर उस कीर्तिमुख को नष्ट कर दिया था।
महानाटक के अनुसार राम ने विश्वकल्याण की दृष्टि से रावण के वक्षस्थल पर बाण नहीं चलाया था,राम जानते थे कि रावण के हृदय में सीता का निवास था,सीता के हृदय में राम और राम के हृदय में समस्त भुवनावली विद्यमान थी।रामचरित मानस में भी सीता-त्रिजटा प्रसंंग में इसका उल्लेख किया गया है।त्रिजटा सीता से कहती है:-
“एहि के हृदय बस जानकी, जानकी उर मम बास है।
मम उदर भुवन अनेक लागत बान सब कर नास है।।
सुनि बचन हरष विषाद मन असि देखि पुनि त्रिजटाँ कहा।
अब मरिहि रिपु एहि बिधि सुनहि सुंदरि तजहि संसय महा।।”
काटत सिर होइहि बिकल छुटि जैहे तव ध्यान।
तब रावणहि हृदय महुँ मरिहहिं राम सुजान।।
रावण-वध के वर्णन में कई ग्रंथों में कुछ बदलाव किए गए हैं।महाभारत में माना गया कि राम का ब्रह्मास्त्र रावण को इस प्रकार जला देता है कि राख भी शेष नहीं रही।बलरामदास रामायण में राम रावण वध के समय अपना शरीर बढ़ाकर कृत्तान्तक रूप धारण कर लेते हैं।तत्वसंग्रह रामायण के अनुसार राम ने रावण का वध करने के लिए परमेश्वर का रूप धारण कर लिया।तोरवे रामायण में भी माना गया है रावण ने अपने वध के पूर्व राम का विश्वरूप देखा था।

