3.1 “पक्षिराज जटायु ने रावण का मुकाबला क्यों किया”

3.1 “पक्षिराज जटायु ने रावण का मुकाबला क्यों किया”

सीता-हरण के बाद श्रीराम के हित में पहली बार अगर किसी प्राणी ने रावण से टक्कर ली थी तो वह था जटायु।पर प्रश्न यह है कि उसने महाबली रावण से मुकाबला क्यों किया?उसका रावण से तो कोई बैर था नहीं?माना कि रावण सीता जी का हरण के ले जा रहा था।किन्तु, उससे जटायु को क्या लेना-देना था?राम और जटायु का आपस में संबंध क्या था?इनका उत्तर वाल्मीकि रामायण कुछ इस तरह देती है।श्रीराम अगस्य ऋषि के आश्रम से पंचवटी नामक क्षेत्र की ओर जा रहे थे।रास्ते में उन्हें एक विशाल आकार वाला व्यक्ति मिला।उन्होंने उससे पूछा कि तुम कौन हो?तब उसने बहुत विनम्रता के साथ मधुर वचनों में उत्तर दिया कि मुझे अपने पिता का मित्र जानो।(वत्सं मा विद्धि वयस्यं पितुरात्मन:)।तब श्रीराम ने उसका आदर-सत्कार किया और उससे ठीक-ठीक कुल और नाम पूछा।तब उसने बताया-मैं अरुण का पुत्र हूँ।मेरा नाम जटायु है और सम्पाति मेरा बड़ा भाई है।उसने कहा कि हे तात, अगर तुम चाहोगे तो मैं वनवास में तुम्हारी सहायता करुँगा।क्योंकि यह वन बड़ा दुर्गम है और इसमें वन्यपशु और राक्षस रहते हैं।हे तात,तुम और लक्ष्मण आश्रम छोड़कर कहीं चले जाओगे,तब मैं सीता की रखवाली किया करूँगा।(सीतां च तात रक्षिष्ये त्वयि याते सलक्ष्मणे)।तब श्रीराम ने जटायु का वृतान्त सुनकर आदर और हर्ष सहित उसे अपने गले लगाया और उसे प्रणाम किया।क्योंकि,उसने कई बार अपने को राम के पिता का मित्र कह कर अपना परिचय दिया था।फिर लक्ष्मण सहित श्रीराम, सीताजी की रक्षा के लिए जटायु को अपने साथ लेकर सुप्रसिद्ध पंचवटी को चले आए।

किन्तु,वाल्मीकि रामायण का यह वृतान्त यह नहीं बतलाता कि जटायु के साथ राजा दशरथ की मित्रता कब और कैसे हुई थी?पर पद्मपुराण,असमिया बालकाण्ड और कृतिवास रामायण में दशरथ-जटायु की मित्रता की कथा कुछ इस तरह मिलती है।”किसी समय अयोध्या में अनावृष्टि हुई थी।नारद से इसका कारण रोहिणी नक्षत्र पर शनि की नजर जानकर दशरथ शनि से युद्ध करने गए।शनि की दृष्टि मात्र से दशरथ का रथ टूट गया किन्तु जटायु ने उसे संभाला,जिससे दशरथ की विजय हुई।इसके कारण दोनों ने अग्नि को साक्षी बनाकर मित्रता की थी।”

यह तो कथा का एक भाग हो गया।दूसरा भाग यह है कि जरूरत पड़ने पर जटायु ने सचमुच अपने प्राण देकर अपनी मित्रता और वचन की रक्षा की।स्वर्ण-मृग का पीछा करते हुए और बाद में राम को संकट में जान सीता द्वारा लक्ष्मण को भी राम के पास भेज देने के बाद आश्रम को सूना देखकर रावण ने उनका अपहरण कर लिया।रावण के रथ पर सीता रोती-बिलखती जा रही थी।तभी सीता की नजर उनींदे से जटायु पर पड़ी।सीता ने उससे कहा-हे मेरे बड़े-बूढ़े जटायु,देखो-यह पापी रावण अनाथ की भांति निर्भय होकर मुझे पकड़ कर लिए जाता है।लगता है तुम इस महाबली राक्षस को रोक नहीं सकते,इसलिए तुम श्रीराम को मेरे हरे जाने का यथार्थ वृतान्त कह देना।तब जटायु ने रावण से अपना परिचय देते हुए कहा कि हे रावण मैं सदा से सेवा और धर्म में लगा हुआ हूँ और सत्य पर आरूढ़ हूँ।मेरा नाम जटायु है और गीधों (गीध कुल के आदिवासियों) का महा बलवान राजा हूँ।साथ ही रावण को समझाईश देते हुए बोला- जो राजा धर्म मार्ग पर चलता हो,क्या उसे पर स्त्री पर हाथ ड़ालना उचित है।हे महाबली,तुम्हें तो राजपत्नी की रक्षा विशेष रूप से करना चाहिए।इसलिए तुम पराई स्त्री के हरण की नीच बुद्धि त्याग दो।जिस काम को करने में निंदा होती हो,वह काम श्रीमान पुरुष नहीं किया करते।बोझ उतना ही उठाना चाहिए जितने से स्वयं दब न जाना पड़े।जिस कार्य को करने में न तो पुण्य होता है और न ही संसार में कीर्ती और यश फैलता है,उसे भला कौन समझदार पुरुष करेगा।(यकृत्वा न भवेद्धर्मो न कीर्ति न यशो भुवि)।जब उसने देखा कि मेरे समझाईश का रावण पर कोई असर नहीं हो रहा है,तब चेतावनी देते हुए बोला-तुम युवा हो,कवचधारी हो,रथ पर सवार हो,धनुष-बाण लिए हुए हो और मैं बूढ़ा हूँ।तथापि तुम सीता को लेकर कुशलता पूर्वक नहीं जा सकते।मेरी आँखों के सामने तुम बरजोरी सीता को नहीं ले जा सकते।(तथाअप्यादाय वैदेहीं कुशली न गमिष्यसि।न शक्तस्त्वं बलाद्धर्तुं वैदेहीं मम् पश्यत्।।)

अंतत: जटायु और रावण के बीच युद्ध होता है।इस युद्ध में जटायु अपने नखों से रावण को आहत करता है और उसके दो धनुष छीन कर नष्ट कर देता है।वह रथ के खरों को मार कर रथ को तोड़ देता है,रथ में बैठे हुए राक्षसों को गिरा देता है और सारथी को भी मार ड़ालता है,जिससे रावण सीता के साथ भूमि पर गिर जाता है।(स भग्नधन्वा विरथो हताश्वो हतसारथी:।अंके नादाय वैदेहीं पपात भूवि रावण:।)अब रावण के पास केवल तलवार रह गई है।वह फिर उठ कर आकाश में सीता को ले जाता है।जटायु उसकी बाईं भुजा को काट लेता है किन्तु वे फिर उत्पन्न हो जाती हैं।अंत में रावण सीता को छोड़ देता है और जटायु के अंग काट कर भूमि पर गिरा देता है।सीता जटायु के पास जाकर विलाप करती है,किन्तु रावण उन्हें केशों से पकड़ कर आकाश मार्ग से लंका ले जाता है।

महाभारत के रामोपाख्यान के अनुसार राम और लक्ष्मण स्वर्ण-मृग वध के बाद वापस आते हुए जटायु से भेंट करते हैं।जो उनसे कहता है कि रावण सीता का अपहरण कर दक्षिण की ओर भाग गया है।वाल्मीकि रामायण में वे दोनों पहले कुटी को खाली पाते हैं; बाद में सीता को खोजते समय वे रावण-जटायु युद्ध के चिह्न को देखकर राक्षसों द्वारा सीता हरण अथवा वध की आशंका प्रकट करते हैं।आगे बढ़कर वे मरणासन्न जटायु से जान लेते हैं कि रावण सीता को लेकर दक्षिण की ओर चला गया है।साथ ही जटायु यह भी बतलाता है कि-सीता के हरण काल का मुहूर्त ‘वृन्द’ था।यह ऐसा मुहूर्त है कि उसमें खोया हुआ धन उसके मालिक को पुन: प्राप्त हो जाता है।इसलिए तुम्हें जानकी के लिए दुखी नहीं होना चाहिए।क्योंकि तुम शीध्र ही उस राक्षस को मार कर फिर सीता के साथ विहार करोगे।साथ ही यह भी बताया कि वह राक्षस ऋषि विश्रवा का पुत्र और कुबेर का भाई है।इसके बाद जटायु राम लक्ष्मण के सामने ही प्राण छोड़ देता है।राम और लक्ष्मण विधिवत उसकी अंत्येष्टि और उदकक्रिया पूर्ण करते हैं।यहाँ वे मृत जटायु के प्रति शुभकामना प्रकट करते हुए कहते हैं–मया त्वं समनुज्ञातो गच्छ लोकाननुत्तमान।बाद की रचनाओं में जटायु के दिव्य रूप धारण कर राम की स्तुति गाने और स्वर्गलोक की ओर प्रस्थान करने का उल्लेख मिलता है।रामचरित मानस के अनुसार भी-

गीध देह तजि धरि हरि रूपा।

भूषण बहु पट पीत अनूपा।।

स्याम गात बिसाल भुज चारी।

अस्तुति करत नयन भरि बारी।।

अबिरल भगति मागि बर गीध गयउ हरि धाम।

तेहि के क्रिया जथोचित निज कर कीन्हीं राम।।

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