कुछ बातें बुजुर्गों से

कुछ बातें बुजुर्गों से

सबसे आदर्श स्थिति तो यह है कि परिवार में बेटे-बहू और बच्चों के साथ बड़े-बुजुर्ग भी रहें। जिनमें माँ-बाप, दादा-दादी, नाना-नानी या और कोई भी हो सकते हैं। इससे नाती-पोतों को समुचित प्यार, देखभाल और सुरक्षा मिल जाती है। साथ ही बुजुर्गों की देखभाल भी हो जाती है। पहले ऐसे परिवार मिल जाना आम बात थी। ज्यादातर परिवारों का गुजारा खेती-बाड़ी, पशुओं की देखभाल और दूध उत्पादन से होता था, जिनमें हाथ बंटाने के लिए सभी सदस्यों की जरूरत होती थी। पर आज तेजी से बदलते सामाजिक और आर्थिक परिदृष्य में यह सब संभव नहीं रहा। बच्चों को पढ़-लिख कर नौकरी-चाकरी के लिए बाहर निकलना मजबूरी हो गई। संताने दूर किसी शहर में जा कर रहने लगीं। संयुक्त परिवार बिखरने लगे।

ऐसी स्थिति ने घर के बड़े-बुजुर्गों पर बहुत असर ड़ाला है। वे नई परिस्थति में ढ़लने में स्वयं को असमर्थ पाने लगे हैं। ऐसा भी नहीं है कि बेटे अपने माँ-बाप को साथ में नहीं रखना चाहते हैं। पर उनकी आमदनी और शहरों के बढ़ते खर्चों के बीच वे खुद को बेबस पाने लगे हैं। शहरों के स्तर और लोकेशन के हिसाब से घर का किराया चुकाना एक बड़ी समस्या बन चुकी है। जो हर दो साल में दस प्रतिशत बढ़ जाता है। फिर बच्चों की शिक्षा, घर और पत्नी सहित स्वयं को मेंटेन रखने का खर्च कमर तोड़ देता है। फिर भी मातृ-पितृ भक्ति और लोक-लाज के कारण माता-पिता को वे ले भी आएँ तो नए तरह की कई समस्याएँ खड़ी होने लगती हैं।

माता-पिता जो कि गाँव या छोटे कस्बे से आए हुए होते हैं, औसतन बड़े घरों में रहने के आदी होते हैं, जिनमे आँगन भी होता है और छत भी। जबकि, शहर के फ्लेटों में ये दोनों ही सुविधाएँ नादारद होती हैं। छोटे घर और नए शहर में उन्हें एड़जस्ट होने में कठिनाई होने लगती है। उनका परिवेश भी छूट जाता है और संगी-साथी भी। बात केवल इतनी नहीं है, बुजुर्ग व्यक्ति आ तो जाते हैं, पर साथ में उनकी आदतें, व्यवहार, तौर-तरीके भी साथ में आते हैं।

जैसे कई बुजुर्गों को बिड़ी, सिगरेट पीने की आदत होती है। वे धुएँ और राख से पूरा घर भर देते हैं। उसकी तेज बदबू को सहन कर पाना हर किसी के बस की बात नहीं है। कुछ बुजुर्ग तम्बाकू, गुटका, खैनी खाने के आदी होते हैं, जो थूक-थूक कर सारे वाशरूम को गंदा कर देते हैं। कइयों को बात-बात में गाली देने की आदत होती। वे इसके इतने अभ्यस्त होते हैं कि उन्हें मालूम ही नहीं पड़ता कि वे गाली दे रहे हैं। घर की बहू बहुत परेशान हो जाती है। वह उन्हें कुछ कह भी नहीं पाती और यह डर भी सताता है कि बच्चे इन आदतों को न सीख जाएँ।

माता लोग बहुओं पर अपना अनुशासन अलग चलाती हैं। बात-बात में टोका-टाकी। बहू ऐसा करो-वैसा करो। अपने घर में ऐसा होता है, वैसा नहीं होता। ये चीज यहाँ रखो, वहाँ मत रखो। ढ़ंग के कपड़े पहनो, सिर पर पल्ला लो। मतलब की बहू का जीवन हलकान कर देती हैं। वो जो अपने तरीके से जी रही थी, सास के आने पर वह अपने को कैदी समझने लगती है। कोई तेज-तर्रार बहू यदि पलट कर जवाब देती है या अनसुना कर देती है तो घर में एक अलग मोर्चा खुल जाता है।

दूसरी ओर बेटा इसलिए भी परेशान रहता है कि माँ-पिताजी की दवाई, तरह-तरह की जांचे डाक्टरों का खर्च को वह कैसे वहन करे। यद्यपि अच्छी संतान होने का तमगा पाने के लिए यह जरूरी भी होता है। यहाँ बुजुर्गों की अंटी से चवन्नी नहीं छूटती। फिर चूँकि वे बुजुर्ग हैं इसलिए शहर के सारे मंदिरों में देव-दर्शन कराना भी जरूरी हो जाता है और यदि कोई पिकनिक स्पाट है तो वहाँ जाना भी। नहीं तो कोई मॉल ही सही। सारी जगहें खर्चीली। इस बात को लेकर पति-पत्नी के बीच के बीच आए दिन दबे स्वर में चिकचिक होती रहती है। दोनों मनाते हैं कि हे भगवान! ये जल्दी से रवाना हों। यदि किसी दिन पिताजी ने कह दिया कि भैया, अब वापस जाना है, तो उसी दिन बिना ना-नुकुर किए तत्काल वापसी का टिकिट करा दिया जाता है।

सोचिए, कहीं आप भी तो उन बुजुर्गों में से नहीं हैं, जिनके आने से ज्यादा उनके जाने की खुशी उनके अपनों को होती है।

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