4.2 वालि-वध की विविध रामकथाएँ

4.2 वालि-वध की विविध रामकथाएँ

परम् प्रतापी श्रीराम ने वालि का वध का छुप कर किया था,ये बात कुछ अटपटी सी लगती है।जिन राम के बारे में “भृकुटि विलास सृष्टि लय होई” कहा जाता है,भला वो ऐसा क्यों करेंगे।इसलिए अनेक राम कथाएँ ऐसी भी हैं,जो यह कहती हैं कि राम ने छुप कर नहीं,अपितु द्वंद- युद्ध में वालि की वध किया था।

आदि रामायण में राम के द्वारा छल से नहीं,वरन् संंग्राम में वालि को मारने संबंधी उल्लेख है।इस कथन के अनुसार “सुग्रीव राम के साथ वालि की गुफा के पास गया,वालि सुग्रीव की गर्जना सुनकर निकला।राम ने संग्राम में वालि को मारा और राज्य सुग्रीव को दिया”–

ततोगर्जद्धश्विर: सुग्रीवो हेमपिंगल:।

तेन नादेन महता निर्जगाम हरीश्वर:।।

तत:सुग्रीववचनाद्धत्वा वालिनमाहवे।

सुग्रीवमेव तद्राज्ये राघव: प्रत्यपादयत्।।

इस संग्राम के विषय में वालि-वध के बाद तारा वानर-सेना को डाँटती हैं किन्तु वानर उत्तर में कहते हैं कि आपका पुत्र जीवित है,उसकी रक्षा कीजिए।यमराज ने राम के रूप में आकर वालि का वध किया।उसने वालि द्वारा चलाए वृक्ष और पत्थर विदीर्ण किए और वालि को मारा है।वालि के मरने के बाद सारी वानरसेना भाग गई।”

“अन्तको रामरूपेण हत्वा नयति वालिनम्।”

इसके अतिरिक्त हनुमान भी दो अवसरों पर कहते हैं कि राम ने युद्ध में वालि को मारा था।पहली बार सीता से–ततो निहत्य तरसा रामो वालिनमाहवे। और दूसरी बार भरत से–वालिनं समरे हत्वा महाकायं महाबलम्।

महाभारत के रामोपाख्यान में भी राम सुग्रीव से मैत्री करने के बाद प्रतिज्ञा करते हैं कि मैं वालि को समर में मारूँगा–प्रतिजज्ञे च काकुत्स्थ समरेवालिनो वधम्।

कुछ रचनाओं में वालि-वध का प्रसंग ही उपस्थित नहीं हुआ है।अनामकं जातकम् वालि राम का धनुष-संधान को देखते ही भाग जाता है और उसका आगे चल कर कोई उल्लेख नहीं होता।पउमचरियं के अनुसार वालि स्वेच्छा से सुग्रीव को राज्य देकर श्रमण बन गया था।गुणभद्रकृत उत्तरपुराण के अनुसार वालि ने राम के पास संदेश भेजकर कहा कि रावण का सामना करने में सुग्रीव और हनुमान् असमर्थ हैं,मैं ही उसका वध कर सकता हूँ।राम ने इस प्रस्ताव का कटु शब्दों में उत्तर देकर वालि का महामेघ नामक हाथी मांगा था।वालि ने उसे देना अस्वीकार किया जिसपर दोनों सेनाओं में घोर युद्ध हुआ।अंत में लक्ष्मण ने एक तीक्ष्ण बाण से वालि का सिर काट दिया।

रामकथा से संबंधी नाटकों में प्राय: राम-वालि के द्वंद-युद्ध का वर्णन किया गया है।महावीर चरित में माल्यवान के उभाड़ने से वालि राम-लक्ष्मण का मार्ग रोक लेता है और राम द्वारा द्वंद-युद्ध में मारा जाता है।उदात्तराघव में भी इसी प्रकार का वर्णन मिलता है।अनर्घराघव में लक्ष्मण दुंदुभी के अस्थि कंकाल को दूर तक फेंक देते हैं,जिसे वालि ने वृक्ष पर रख दिया था।इस पर वालि आकर युद्ध के लिए ललकारता है और राम द्वंद-युद्ध में उसका वध करते हैं।जानकीपरिणय नाटक में भी वालि का वध द्वंद-युद्ध में ही माना गया है।

अभी तक उन रामकथाओं का उल्लेख था जिनमें माना गया है कि राम और वालि के द्वंद-युद्ध में वालि मारा जाता है।किन्तु,ऐसी रामकथाएँ भी प्रचुर हैं,जिनमें माना गया है कि द्वंद-युद्ध तो वालि और सुग्रीव के बीच ही हुआ था पर सुग्रीव की रक्षा के लिए राम ने छुप कर वालि पर बाण चलाया था। प्रचलित वाल्मीकि रामायण में वालि-सुग्रीव के दो द्वंद-युद्धों का वर्णन है।पहले द्वंद-युद्ध में दोनों भाईयों के एक जैसे दिखने के कारण राम बाण नहीं चला पाए थे।उन्होंने दूसरे द्वंद युद्ध के समय सुग्रीव को गज-पुष्पों की माला पहना कर भेजा। और द्वंद-युद्ध में उसे वालि से परास्त होता देखकर वालि पर वृक्ष की आड़ से बाण चलाया, जिससे वालि मूर्छित होकर वह भूमि पर गिर पड़ा।मूर्छा हटने पर वह राम के अक्षत्रिय-व्यवहार के कारण दोष देता है–अधर्मेण त्वयाअहं निहतो रणे।

(मारेऊ मोहिं ब्याध की नाई।।)

मैंने आपके साथ कोई अन्याय नहीं किया था और आपने अदृश्य रहकर दूसरे के साथ युद्ध करते समय मुझे मारा।इस पर राम अपनी सफाई में तर्क देते हुए कहते हैं–मैंने राजा भरत का प्रतिनिधि होकर तुम्हें अनुज की भार्या का अपहरण करने के कारण समुचित दंड दिया है,जैसा कि मैंने सुग्रीव को प्रतिज्ञा दी थी।(अनुज बधू भगिनी सुत नारी।सुनु सठ कन्या सम ए चारी।।

इन्हहि कुदृष्टि बिलोकई जोई।

ताहि बधे कछु पाप न होई।।)

वालि यह तर्क स्वीकार कर राम से क्षमा मांगता है और अँगद, सुग्रीव और तारा की रक्षा करने का राम से निवेदन करता है।

सेरीराम,रामकेर्ति और रामकियेन में माना गया है वालि ने आहत होने के पूर्व ही राम-बाण को हाथ से रोक दिया था।सेरीराम के अनुसार वालि ने अपनी निर्दोषिता का प्रमाण देने के बाद राम को उनका बाण लौटाना इसलिए अस्वीकार कर दिया कि विष्णु का बाण अमोघ है।तब उसने बाण को छोड़ दिया और वह उपर उठकर वालि की छाती में घुस गया।आहत वालि ने राम का हाथ पकड़कर उनको अपनी पत्नी और अपने पुत्रों को सौंप दिया और हनुमान को राम-सेवा के उपयुक्त बताया और राम का हाथ छोड़कर चल बसा।पद्मपुराण में इसका उल्लेख किया गया है कि मरने के पूर्व वालि ने राम को उनका बाण लौटाया था।कम्ब रामायण के वालिवध पटल के अनुसार वालि ने आहत होने के बाद रामबाण को अपने शरीर से बाहर निकलने के पूर्व ही बलिष्ठ हाथ से पकड़ लिया था।बाद में उसके हाथ शिथिल पड़े,रामबाण वालि के शरीर को भेदित कर समुद्र जल में धुलकर राम के तूणीर में जा पहुँचा।

भक्तिभाव से पूरित बाद की अधिकांश रामकथाओं में वालि की मुक्ति प्राप्ति का वर्णन किया गया है।वह प्राय: नारायण के रूप में राम की स्तुति करने के बाद स्वर्ग की ओर प्रस्थान करता है।अध्यात्म रामायण, पद्मपुराण, आनंद रामायण,कम्ब रामायण, रंगनाथ रामायण,तोरवे रामायण, बलरामदास रामायण और रामचरित मानस (राम बालि निज धाम पठावा।)में ऐसा ही माना गया है।कुछ रामकथाओं में वालि के अगले जन्म के विषय में माना गया है कि द्वापर युग के अंत में वालि भील के रूप में प्रकट हुआ और विष्णु के अन्य अवतार श्रीकृष्ण पर बाण चलाकर उनके शरीरांत का कारण बना।

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