विघ्नहरण की व्यथा

विघ्नहरण की व्यथा

गणेश जी अपने सामने लड्डूओं के थालों को देख-देख कर कंटाल गए थे। जहाँ देखो वहाँ उनके सामने लड्डुओं का थाल लाकर रख दिया जाता है। माना कि मुझे कि लड्डु विशेष प्रिय हैं। फिर भी भला कोई लगातार एक तरह की ही डिश खा सकता है क्या? मेरी इच्छा भी तो होती है कि इसके साथ कुछ चटपटे नमकीन भी खाए जाएँ। पर कोई मेरे मन की बात समझने को कोई तैयार ही नहीं। एक तो सराफा व्यापारियों नेे मुझे भरे बाजार लाकर बिठा दिया है, जहाँ शाम हुई नहीं कि एक से एक पकवानों की खुशबु उड़ने लगती है।चाट-पकौड़ी, कचौरी-समोसा, दही-बड़े,मूँग बड़े जैसी चीजों का तो कहना ही क्या? शाम को मेरी आरती करने के बाद भक्तगण भिड़ जाते हैंं, थाल साफ करने पर।सुना है कि इंदौर वाले तो वैसे भी चटोरे होते हैं। जलेबी-पोहे के बिना तो उनका दिन ही शुरू नहीं होता। पर मजाल कि कोई भक्त मुझसे पूछ ले कि प्रभु, आपको लड्डुओं के अलावा कुछ और चाहिए क्या?

अब इसको देखो, मेरे मूषक को। कहाँ तो तय था कि यह मुझे बिठा कर दूर-दूर तक घुमाने ले जाएगा। पर इसकी यह हालत हो गई है कि अब खुद इससे ही हिला नहीं जाता । लड्डू खा-खा कर मुटा गया है। मुझे तो भय है कि कहीं इसे डायबिटीज न हो गई हो। यह अब मुझे क्या संभालेगा, मुझे ही इसे संभालना पड़ रहा है। एक ओर मेरे बड़े भाई कार्तिकेय स्वामी को देख लीजिए। अपने मोर पर बैठ कर मजे से जगत की सैर कर रहे हैं। पता लगा है कि अभी वे दक्षिण भारत में सबरीमला के पहाड़ियों पर सैर कर रहे हैं और वहीं कहीं आश्रम बनाकर रहना चाहते हैं।

दूसरी ओर साधु संत, ऋषि-मुनि और भोलेबाबा के भक्तगण उनसे शिकायत करते रहते हैं कि आपने विनायक को बुद्धि और ज्ञान के प्रदाता, सकल गुण निधान बना तो दिया, पर वे हम लोगों को ज्ञान देने कभी आते ही नहीं। हम किससे ज्ञान लें। बाबा ने भी मैया से शिकायत की है कि अपना गणेश कहीं आता-जाता तो है नहीं, फिर ऋषि-मुनियों तक दिव्य ज्ञान कैसे पहुँचेगा। मैया ने भी आकर मुझे समझाया कि बेटा गणु, पूरी दुनिया को तुम्हारी जरूरत है। सब जगह जाया करो, तुम्हारे भक्त दर्शन को बहुत लालायित रहते हैं।

मैंने भी सोच लिया कि अच्छा चलो, धरती वासियों को भी उपकृत किया जाए।मैंने देखा कि सचमुच लोग मेरी बहुत राह देखते हैं। हर ओर मेरी बहुत आव-भगत होती है। लोग बहुत श्रद्धा-भक्ति से दस दिन के लिए मेरी स्थापना करते हैं। सुबह-शाम मन लगा कर आरती करते हैं। पर कठिनाई यह है कि मेरे भोग के लिए वही लड्डुओं का थाल परोस दिया जाता है। इधर मैं संकोच के मारे कुुछ कह भी नहीं पाता कि भक्तों, साथ में कुछ और नमकीन चटपटी चीजें भी लाकर रखा करो। इसलिए अब जो सामने है, उसी का भोग लगा कर संतुष्ट रहता हूँ।

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