4.1 कितनी सच है शबरी की कथा

4.1 कितनी सच है शबरी की कथा

शबरी की कथा को रोचक और भावपूर्ण बनाने के लिए प्रवचनकार अपनी-अपनी मति के अनुसार इसे अनेक रंग-रूप देकर सुनाते हैं।अधिकतर अपनी कथा में इस बात को अवश्य शामिल करते हैं कि कैसे उसने श्रीराम को अपने झूठे बेर खिलाए और प्रभु ने भी उन्हें बार-बार सराह कर खाते रहे।शबरी की कथा में झूठे बेर खिलाने की बात कब और कैसे शामिल हो गई,इसका पता लगाना भी रोचक होगा।

रामकथा मर्मज्ञों के अनुसार वाल्मीकि के आदिकाव्य में शबरी की कथा संभवत: नहीं थी।इसलिए महाभारत के रामोपाख्यान में भी शबरी का कोई उल्लेख नहीं मिलता है।किन्तु,प्रचलित वाल्मीकि रामायण में यह कथा दी गई है।जिसके अनुसार शबरी अपने गुरु मतंग ऋषि की सेवा रहकर आध्यात्मिक उच्चता को प्राप्त करती है।गुरु अपने अंत समय में ब्रह्मधाम को जाते हुए उससे कहते हैैं कि वह अपने आश्रम में रहकर श्रीराम की प्रतीक्षा करे,जो कुछ समय बाद यहाँ आएँगे।उनकी बात तब सच साबित होती है,जब श्रीराम सीता को खोजते हुए अनुज लक्ष्मण के साथ उसके आश्रम में पधारते हैं।शबरी राम और लक्ष्मण का पूजन-सत्कार करती हुई कहती है कि “हे राम,मैं आपके निर्हेतुक कृपा कटाक्ष से आज मैं पवित्र हो गई।हे अरिन्दम,आपकी कृपा से मुझे अक्षय लोकों की प्राप्ति होगी।”

“चक्षुसा तव सौम्येन पूताअस्मि रघुनन्दन।गमिष्यामक्षयाँल्लोकांस्त्वत्प्रसादादरिन्दम।।

शबरी राम से यह निवेदन करती है कि मैंने आपके लिए वन से विविध कन्द-मूल-फल एकत्र कर रखे हैं।”मया तु संचित वन्यं विविधं पुरुषर्षभ।” बाद में वह अपने गुरुओं का गुणगान करती हुई , राम को मतंगवन के दर्शन कराती है।अंत में वह उन ऋषियों के पास जाने की इच्छा प्रकट करती है और राम की आज्ञा लेकर अग्नि में प्रवेश करती है और वह दिव्य रूप धारण कर उसमें से प्रकट हो जाती है और विद्युत सा प्रकाश फैलाती हुई (विद्युत सौदामिनी यथा)अपने गुरु महर्षियों के पास पहुँच जाती है।

अध्यात्म रामायण में दिए गए शबरी प्रसंग के अनुसार कबंध शबरी की राम-भक्ति का उल्लेख करता है और राम को आश्वासन देता है कि शबरी उन्हें सीता के बारे में सब बातें बता देगी।शबरी भक्तिपूर्वक राम-लक्ष्मण का आतिथ्य सत्कार करती है और उन्हें अपने इकट्ठे किए हुए दिव्यफल देती है।

“कंद मूल फल सुरस अति, दिए राम कहुँ आनि।

प्रेम सहित प्रभु खाए,बारंबार बखानि।।”

बाद में यह बताती है कि इस आश्रम में पहले जो गुरु निवास करते थे,उनके आदेशानुसार वह राम का ध्यान करती हुई प्रतीक्षा करती रही।अन्त वह राम से पूछती है कि मैं मूढ स्त्री हीन जाति में उत्पन्न होते हुए भी आपके दर्शन के योग्य क्यों कर हुई।इस पर राम कहते हैं कि- नर,नारी,जाति,नाम,आश्रम आदि का कोई महत्व नहीं है,भक्ति ही सर्वोपरि है।

“कह रघुपति सुनु भामिनि बाता।

मानहु एक भगति कर नाता।।”

इसके बाद राम शबरी को नवधा भक्ति की शिक्षा देकर कहते हैं कि उन साधनों द्वारा प्रेमलक्षणा भक्ति उत्पन्न होती है,जिससे इसी जन्म में मुक्ति मिलती है।अन्त में राम सीता के विषय में पूछते हैं–“सीता कमललोचना कुत्रास्ते केन वा नीता।”तब वह बताती है कि सीता लंका में है और राम को सुग्रीव के पास जाने का परामर्ष देती है।अन्त में वह योगाग्नि में देह त्याग कर (तजि जोग पावक देह हरि पद लीन भइ जहँ नहिं फिरे)राम के प्रसाद से मोक्ष प्राप्त कर लेती है।

बाद के रामकथाओं में भी शबरी कथा का यह रूप अध्यात्म रामायण के अनुसार ही है।जैसे आनंद रामायण,पद्मपुराण,मंजुल रामायण,रामचरित मानस, रामगीतावली,रामचंद्रिका आदि।

सूरदास ने शबरी के फलों के विषय में पहले-पहल लिखा था कि ये जूठे ही थे।बलरामदास वृतान्त की विशेषता यह है कि शबरी अपने पति के साथ राम-लक्ष्मण से भेंट करती है और इसका भी स्पष्ट उल्लेख है कि राम वे फल नहीं खाते जिनमें शबरी के दाँतों के निशान नहीं थे।

शबरी की कथा आदिवासियों में अधिक लोकप्रिय है।मध्यभारत के कोल अपने को शबरी का वंशज मानते हैं।उनमें प्रचलित कथा के अनुसार वनवास के समय किसी दिन शबरी से राम-सीता-लक्ष्मण से भेंट हुई। तीनों भूखे थे और शबरी ने उन्हें जंगली बेर खिला कर तृप्त किया।इसके बाद वह हर रोज अपने अतिथियों के लिए बेर बटोरने जाती थी।एक दिन उसने बेखयाली में प्रत्येक फल का थोड़ा सा अंश खाकर अपनी टोकरी में रख लिया।घर पहुँचकर उसे पता चला कि उसने यह क्या किया है और वह राम को जूठे बेर देने में हिचकती है।राम ने अनुरोध किया और वे सीता के साथ फल खाने लगे।लक्ष्मण ने एक आदिवासी का जूठा भोजन खाने से परहेज किया।इस पर एक बाण ने लक्ष्मण को घायल कर दिया और वे तब तक अवस्थ रहे जब तक उन्होंने अपना मन नहीं बदल दिया।शबरी घर से जाते समय राम ने उसे वर-स्वरूप राज्य या परिवार चुनने का विकल्प दिया।जिस पर शबरी ने परिवार चुन लिया और राम ने उसे आश्वासन दिया कि उसके असंख्य वंशजों को कभी भोजन और कपड़ों का अभाव नहीं होगा।यह कथा शबरी के पति के बारे में कुुछ नहीं कहती।

रामरसिकावली में शबरी एक मुनि की पत्नी थी,जो अपने पति के साथ वन में निवास करती थी।किसी अवसर पर उसका पति वन से तपस्या कर लौटा और शबरी ने उसके पैर धोए।बाद में मुनि को पता चल जाता है कि उसी दिन शबरी को एक पुत्र उत्पन्न हुआ।इस पर कुपित होकर कि उसने अस्वच्छता की अवस्था में उनका पूजन किया है शबरी को वन भेजते हुए शाप दिया कि “शबरी होसि महावन जाई।”पत्नी का विलाप सुन कर मुनि ने उसे सांत्वना देकर कहा कि “करिहै संतन की सेवा,ऐहैं तुव घर रघुकुल देवा।” एक अन्य दंतकथा के अनुसार शबरी का जन्म एक उच्च और सम्पन्न परिवार में हुआ था।किन्तु,परतंत्रता के कारण उसे सत्संग और साधना के लिए समय नहीं मिलता था।इसलिए उसने प्रार्थना की थी कि उसका अगला जन्म किसी नीच जाति में हो ताकि उसकी भक्ति-साधना में बाधा न पड़े।जिससे वह भीलों के घर पैदा हुई।विवाह योग्य हो जाने पर उसने देखा कि घर में सैकड़ों भैंसे-बकरे इकट्ठे किए जा रहे हैं।पूछने पर उसे पता चला कि उसके विवाह के अवसर पर इन सबका बलिदान दिया जाएगा।यह सुनकर वह बहुत दुखी हुई और सब जानवरों को मुक्त कर जंगल में चली गई और पंपा सरोवर के पास झोपड़ी बनाकर ऋषियों की सेवा करने लगी।

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