श्रीराम ने शिव-प्रतिष्ठा सेतु निर्माण के समय की थी या रावण वध के बाद लौटते समय? इस बारे में ग्रंथों में मत-भिन्नता है।वाल्मिकी रामायण में सेतु-निर्माण के समय शंभु स्थापना का उल्लेख नहीं है। किंतु, रावण विजय के बाद राम लौटते हैं,तब सीता जी को सेतु दिखला कर कहते हैं कि महादेव ने यहाँ मुझ पर अनुग्रह किया था–अत्र पूर्वं महादेव: प्रसादमकरोद्विभु:।सेतु बाँधने के पूर्व मेरे द्वारा स्थापित होकर वे यहाँ विराजमान हुए थे।
अन्य रामकथाओं में सेतुबन्ध के समय शिव-प्रतिष्ठा का उल्लेख प्राय: किया गया था।किन्तु,ऐसा प्रतीत होता है कि पहले राम द्वारा शिव-प्रतिष्ठा युद्ध के बाद ही मानी जाती थी।नारदीय पुराण,नृसिंह पुराण,कूर्म पुराण,बृहद्धर्म पुराण और पद्मपुराण में केवल युद्ध के बाद ही राम द्वारा शिव-लिंग की स्थापना का उल्लेख किया गया है।स्कंदपुराण और कृतिवास रामायण में सेतु निर्माण के समय और युद्ध के बाद,दोनों बार इसका वर्णन किया गया है।सेतु महात्म्य में द्वितीय शिव-प्रतिष्ठा का वृतान्त इस प्रकार है।युद्ध के बाद गंधमादन पर्वत पर जाकर राम दण्डकारण्य से आए मुनियों से पूछते हैं कि रावणवध का प्रायश्चित किस प्रकार किया जाए।वे रामेश्वर लिंग स्थापना का सुझाव देते हैं।इस पर राम हनुमान को शिवलिंग ले आने के लिए कैलास भेज देते हैं।वहाँ पहुँचकर हनुमान को उसे प्राप्त करने के लिए तपस्या करनी पड़ती है।मुहूर्त बीत जाने के भय से मुनि बालू के लिंग की स्थापित करने का अनुरोध करते हैं।बालू के लिंग की स्थापना हो जाने के बाद वहाँ पहुँचने पर हनुमान बहुत दुखी हो जाते हैं,क्योंकि,उन्हें लगता है उनका परीश्रम व्यर्थ गया।राम हनुमान को बालू के शिवलिंग को उठाने की आज्ञा देते हैं।किन्तु,हनुमान इसमें असमर्थ हो जाते हैं और मूर्छित होकर गिर पड़ते हैं।बाद में हनुमान अपने लाए हुए लिंग को रामेश्वर लिंग के उत्तर में स्थापित करते हैं।
इस प्रकार की कथा आनंद रामायण में भी मिलती है।पर इसका वर्णन युद्ध के पूर्व ही रखा गया है।इस कथा के अनुसार हनुमान को काशी भेजा गया था तथा शिव ने हनुमान को दो लिंग दिए थे।बाद में शिवजी ने समुद्रतट पर राम को दर्शन देकर बारह ज्योतिर्लिंग की कथा और रामेश्वर लिंग का महात्म्य सुनाया।भावार्थ रामायण की कथा भी मिलती-जुलती है पर एकनाथ ने उस घटना को युद्ध के बाद ही अयोध्या वापसी के समय रखा है।रंगनाथ रामायण की कथा इस प्रकार है।विमान पर अयोध्या की यात्रा करते समय राम सीता को सेतु दिखला रहे थे कि उन्होंने अचानक रावण की भयंकर मूर्ति देखी।इस पर विभीषण ने राम से कहा–“आपको ब्रह्महत्या का दोष लग गया है,आपको प्रायश्चित करना चाहिए।” राम ने पुष्पक उतरवाया तथा ब्रह्मा का ध्यान किया।ब्रह्मा ने प्रकट होकर सेतु पर शिव प्रतिष्ठा करने का परामर्श दिया।बाद में हनुमान का काशी भेजा जाना,मुहूर्त बीत जाने के डर से राम द्वारा सैकत लिंग की स्थापना,हनुमान का गर्व-निवारण आदि का वर्णन है।
अध्यात्म रामायण में शिव प्रतिष्ठा का वर्णन सेतु निर्माण के अवसर पर रखा गया है।यह कथानक शिव-पार्वती संवाद के रूप में है।इसमें महादेव पार्वती को बताते हैं कि–हे पार्वति! सेतुबंध के आरम्भ होने पर भगवान राम ने रामेश्वर महादेव की स्थापना कर उनका पूजन करते हुए लोकहित के लिए इस प्रकार कहा–
सेतुमारभमाणस्तु तत्र रामेश्वर शिवम्।
संस्थाप्य पूजयित्वाह रामो लोकहिताय च।।
“जो पुरुष रामेश्वर शिव का दर्शन कर सेतुबंध को प्रणाम करेगा वह मेरी कृपा से ब्रह्महत्या आदि पापों से मुक्त हो जाएगा।”
प्रणमेत्सेतुबंध यो दृष्टवा रामेश्वरं शिवम्।
ब्रह्महत्यादिपापेभ्यो मुच्यते मदनुग्रहात।।
रामचरित मानस में भी सेतु-निर्माण के समय ही शिव-स्थापना करने का प्रसंग आया है।उस परम् रमणीय स्थान को देखकर श्रीराम कहते हैं कि मैं यहाँ शिवजी की स्थापना करूँगा।मेरे हृदय में यह महान संकल्प है।(करिहऊँ यहाँ संभु थापना।मोरे हृदयँ परम कलपना।।) तब उनके वचन सुनकर सुग्रीव ने बहुत से दूत भेजे,जो सब श्रेष्ठ मुनियों को बुलाकर ले आए।शिवलिंग की स्थापना करके विधिवत उसका पूजन किया।फिर बोले–शिवजी के समान मुझे दूसरा कोई प्रिय नहीं है।(लिंग थापि विधिवत करि पूजा।सिव समान प्रिय मोहि न दूजा।।)इसके बाद वे उस जगह का महात्म्य बतलाते हुए बोले–जो मनुष्य मेरे द्वारा स्थापित इन रामेश्वरजी के दर्शन करेंगे,वे शरीर छोड़कर मेरे लोक को जाएँगे और जो गंगाजल लाकर इन पर चढ़ाएगा,वह मनुष्य सायुज्य मुक्ति पाएगा।
जो रामेस्वर दरसनु करहहिं।
ते तनु तज मम लोक सिधरिहहिं।।
जो गंगाजलु आनि चढ़ाइहि।
सो साजुज्य मुक्ति नर पाइहि।।
एक संथाली रामकथा के अनुसार राम ने रावणवध के बाद संथालों के यहाँ रहकर एक शिवमंदिर बनवाया था और उसमें प्रतिदिन सीता के साथ पूजा करने आते थे।

