रामकथा के कई आयाम हैं।पर,रामचरित मानस की रामकथा के अनुसार श्रीराम लंका विजय के बाद अयोध्या लौटे,उनका राज्याभिषेक हुआ,राम राज्य आ जाने से हर ओर आनंद-मंगल का वातावरण छा गया।सब सुखी और निरोगी हो गए और अपने कर्तव्य पालन में लग गए।तुलसीदास जी ने इसका वर्णन कुछ इस तरह किया है:-
“दैहिक दैविक भौतिक तापा।
सब नर करहिं परस्पर प्रीति।
चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती।।”
श्रीराम अपने भाईयों और प्रजा को समय-समय पर उपदेश देते थे।रामचरित मानस सिर्फ यहीं तक रामकथा बतलाती है।यद्यपि ऐसा भी नहीं है कि गोस्वामी जी को राम कथा के आगे की जानकारी नहीं थी।बल्कि उन्होंने रामाज्ञाप्रश्न और गीतावली में सीतात्याग और लव-कुश के प्रसंगों का उल्लेख किया भी है,फिर भी मर्यादा बनाए रखने की दृष्टि से रामचरित मानस में उन्होंनें सोच-समझ कर इन प्रसंगों को शामिल नहीं किया। इसके बाद की कथा बताना गोस्वामी तुलसीदास का उद्देश्य रहा भी नहीं होगा।संभवत: उसकी दो वजह रही होगी।एक तो यह कि इससे समाज को कोई मार्गदर्शन मिलने वाला नहीं था।दूसरे यह कि संभवत: महाकवि यह जानते रहे होंगे कि उत्तरकांड और बालकांड आदि-कवि वाल्मीकि रचित रामायण के भाग नहीं हैं,अपितु बाद के संत कवियों ने इन्हें जोड़ा है।ऐसा ही मत आज के रामकथा मर्मज्ञों और अध्येताओं का भी है।
फिर भी रामकथा के हर पाठक के मन में यह जानने की उत्सुकता तो रहती ही है कि गद्दी पर बैठने के बाद उन्होंने क्या-क्या किया।क्या वे कभी लौट कर लंका भी गए।उस सेतु का क्या हुआ जो उन्होंने समुद्र पार करने के लिए बनवाया था।उन्होंने और कहाँ-कहाँ की यात्राएँ की,अपने साम्राज्य के विस्तार के लिए उन्होंने क्या-क्या किया।धर्म की मर्यादा उन्होंने किस तरह बनाए रखी,आदि।इस संबंध में कुछ जानकारी वाल्मीकिकृत रामायण के उत्तरकांड से मिलती है।भले ही उसे बाद में जोड़ा गया हो। कुछ अन्य ग्रंथ भी इस विषय में बहुत कुछ बतलाते हैं।
युद्ध में रावण वध के बाद ब्रह्महत्या के दोष के निवारण के लिए रामजी को भी कई उपाय करने पड़े थे।वाल्मीकीय रामायण के युद्धकांड के अंतिम सर्ग के अनुसार राम ने दस अश्वमेध यज्ञ किए थे।उत्तरकांड के अनुसार गौतमी तट पर नैमिष वन में अश्वमेध के लिए यज्ञभूमि को तैयार किया गया और सुग्रीव, विभीषण,शत्रुघ्न आदि को निमंत्रण दिया गया।इस यज्ञ के अवसर पर कुश और लव ने रामायण का गान किया और सीता ने सतित्व की शपथ लेकर भूमि में प्रवेश किया।बाद में राम ने बहुत से यज्ञ किए थे,जिसके लिए एक कांचिनी सीता का निर्माण हुआ था।क्योंकि,राम ने सीता के भूमि प्रवेश के बाद अन्य विवाह नहीं किया:
“न सीताया: परां भार्यां वद्रे स रघुनंदन:।
यज्ञे यज्ञे च पत्नयर्थं जानकी कांचनीभवत्।।”
रघुवंश से लेकर बाद की रामकथाओं में प्राय: इसी स्वर्णमयी सीता का उल्लेख है।अग्निपुराण में लिखा है कि अश्वमेध द्वारा उन्होंने अपनी ही आराधना की।आध्यात्म रामायण और आनन्द रामायण के अनुसार राम ने कोटि-कोटि शिवलिंग स्थापित किए।पद्मपुराण के पातालखंड के अनुसार राम ने स्वयं को ब्रह्म हत्या का दोषी मान कर वशिष्ठ से इस पाप के प्रायश्चित का उपाय पूछा।उन्होंने अश्वमेध यज्ञ करने का परामर्ष दिया,जिसके अनुसार श्रीराम ने इस यज्ञ का आयोजन किया।स्कंद पुराण के अवंति खंड में हनुमान भी राक्षसों के वध के कारण ब्रह्महत्या के दोषी माने गए हैं।इस दोष के निवारणार्थ उन्होंने नर्मदा तीर्थ पर बहुत वर्षों तक शिव की उपासना की।
रामकथा साहित्य में राम के अभिषेक के बाद उनकी अनेक यात्राओं का उल्लेख मिलता है।उनमें उनकी लंका की यात्रा सबसे प्रसिद्ध है।नृसिंहपुराण के अनुसार राम ने उस अवसर पर लंका में पुण्यारण्य की स्थापना की थी।स्कंदपुराण के नागरखण्ड में माना गया है कि राम ने लक्ष्मण की मृत्यु के बाद सुग्रीव को लेकर लंका की यात्रा की थी और विभीषण को देव-पूजा का उपदेश देकर सेतु-प्रांत में तीन रामेश्वर स्थापित किए और विभीषण के अनुरोध पर सेतु नष्ट किया।पद्मपुराण के सृष्टिखंड में इस यात्रा का विस्तृत विवरण मिलता है।सीता के भूमिप्रवेश के बाद राम ने लक्ष्मण को अयोध्या का राज्य सौंप दिया और वे भरत के साथ पुष्पक पर चढ़ कर पश्चिम में भरत के पुत्रों से बाद में पूर्व में लक्ष्मण के पुत्रों से मिले।बाद में दोनों दक्षिण में चले गए और सुग्रीव को साथ लेकर लंका पहुंच गए।विभीषण ने राम को वैष्णवी मूर्ति प्रदान की और सेतुभंग के लिए राम से निवेदन किया।राम ने उस निवेदन को स्वीकार किया और शत्रुघ्न से मिलकर कान्यकुब्ज में वामन की स्थापना की।
ऐसी जानकारी भी मिलती है कि राम विभीषण को सहायता देने के उद्देश्य से लंका की यात्रा करते थे।नारद पुराण में इसका उल्लेख हुआ है कि राम ने द्रविड़ देश में विभीषण को मुक्त किया था।वाल्मीकि रामायण में भरत द्वारा गंधर्व देश की विजय-यात्रा का वर्णन मिलता है।आनन्द रामायण में भी विजय यात्राओं का विवरण है।राम स्वयं पृथ्वी के सारे राजाओं विजय प्राप्त करने के उद्देश्य से विमान पर चढ़ कर भारत,जम्बूद्वीप,प्लक्षद्वीप आदि सात द्वीपों की विजय-यात्रा करते हैं।
राम अभिषेक के बाद अनेक तीर्थ-यात्राएँ करते हैं।स्कंदपुराण के ब्राह्मण खंड़ के अनुसार राम ने धर्मारण्य की यात्रा के अवसर पर वहाँ के निवासियों की रक्षा के लिए हनुमान को नियुक्त किया था।आनंद रामायण के यात्राकांड में राम द्वारा गंगा-सरयू-संगम के बाद पूर्व,दक्षिण,पश्चिम और उत्तर के तीर्थों की यात्रा की थी।इसके विलासकांड के अनुसार राम ने सूर्यग्रहण के अवसर पर कुरुक्षेत्र की यात्रा की थी।
इससे यह पता लगता है कि श्रीराम का पूरा जीवन हलचल भरा रहा है।राम का जीवन त्याग और तपस्या की जीवंत कहानी है।

