श्रीराम ने इस धरा-धाम पर कितना समय बिताया था,यह तो पक्के तौर पर कोई नहीं बता सकता।क्योंकि इस बारे में कई मत हैं।किसी का मानना है कि उन्होंने सौ वर्ष बिताए थे तो किसी का दस हजार वर्ष।पर यह सब मानते हैं कि उन्हें वन में चौदह वर्ष बिताना पड़ा था।वास्तव में राम का वनगमन ही उनके जीवन का वह टर्निंग प्वाईंट था,जिसकी वजह से उनका व्यक्तित्व पूरी तरह से निखरा।उनकी मर्यादा,नैतिकता, विनम्रता,करूणा,क्षमा,धैर्य,त्याग,पराक्रम,परदु:खकातरता,शरणागत वत्सलता,सुग्रीव के प्रति मित्रता,भाई के प्रति उनका असीम प्रेम आदि उनके दिव्य गुण इसी काल में प्रकट होते हैं,जो उन्हें अलौकिक बनाते हैं।सोचिए, यदि ये चौदह वर्ष उनके जीवन में नहीं आए होते तो राम-कथा का क्या स्वरूप होता।
यह तो हम सभी जानते हैं कि युवराज पद पर अभिषेक होने के ऐन मौके पर उन्हें वनवास क्यों जाना पड़ा था।वाल्मीकि रामायण ने भी बताया है कि इसके पीछे उनकी विमाता कैकयी थीं।जिन्होंने राजा दशरथ से दो वर मांग लिए थे।एक-भरत के लिए राज्य और दूसरा-राम के लिए चौदह वर्ष का वनवास।तब से राम के निर्वासन का यह कारण सबसे प्राचीन और बाद में सबसे प्रचलित और प्रामाणिक माना गया।कम्बोडिया की रामकथा रामकेर्ति में कैकयी राम और लक्ष्मण दोनों के लिए चौदह-चौदह वर्ष का वनवास मांगती है।यह सुन कर लक्ष्मण बहुत उग्र हो जाते हैं,पर राम उन्हें शांत करते हैं।उदारराघव में दशरथ स्वयं लक्ष्मण से अनुरोध करतेे हैं कि वह विद्रोह करके राम को बलपूर्वक राजा बनाएँ।
भट्टिकाव्य,महावीरचरित और अनर्घराघव में कैकेयी राम,लक्ष्मण और सीता का वनवास मांगती है।
इसके विपरीत बौद्ध और जैन रामकथाओं में राम के वन जाने के कुछ अलग कारण दिए गए हैं।बौद्ध कथा दशरथ जातक और दशरथ कथानम् में भरत की माता केवल एक वर मांगती है,भरत के लिए राज्य।बाद में भरत की माता के षडयंत्रों के भय से दशरथ अपने दो पुत्रों राम और लक्ष्मण को वन भेज देते हैं और बारह वर्ष बाद लौटने को कहते हैं।
पउमचरियं और अन्य जैन रामकथाओं के अनुसार दशरथ को वैराग्य हुआ और भरत को राज्य दिया गया।यह सुनकर राम स्वेच्छा से सीता और लक्ष्मण के साथ दक्षिण की ओर प्रस्थान करते हैं।
रामकथाओं में राम वनगमन का सारा दोष आमतौर पर कैकयी को ही दिया गया है।फिर भी ऐसा भी माना गया है कि सारा दोष उन्हीं का नहीं था।अपितु इसके पीछे दैवीय योजना भी थी।वाल्मीकि रामायण में ही भरद्वाज राम से कहते हैं कि कैकयी को ही दोष नहीं देना चाहिए क्योंकि राम का निर्वासन सबों के हित का कारण सिद्ध होगा।चित्रकूट में जब भरत कैकयी की भर्त्सना करते हैं, तब राम स्वयं कैकयी का पक्ष लेकर भरत को स्मरण दिलाते हैं कि दशरथ ने विवाह के अवसर पर कैकेयी के पुत्र को राज्य देने की प्रतिज्ञा की थी:
‘पुरा भ्रात: पिता न: स मातरं ते समुदवहन्।
मातामहे समाश्रौषीद्रज्यशुल्कमनुत्तमम्।।’
एक और भी कथा मिलती है कि कैकयी ने किसी ब्राह्मण की निंदा की थी और ब्राह्मण ने कैकयी को शाप दिया था कि तुम्हारी भी निंदा की जाएगी।इस कारण ‘शापदोषमोहिता’ कैकयी मंथरा के जाल में फँस गई थी।इस शाप का उल्लेख रामायणमंजरी और कृतिवास व बलरामदास की रामायणों में भी मिलता है।तत्वसंग्रह रामायण के अनुसार कैकेयी अयोध्यावासियों का दु:ख देखकर द्रवित हो गई।वह राम के पास जाकर उनकी आराधना करती हैं और क्षमा मांगते हुए वापस आने का अनुरोध करती हैं।राम उनको यह कह कर क्षमा प्रदान करते हैं—‘देवकृते कोअपराध:।त्वं मे मातृसमा देवि त्वयि नास्ति दुर्मन:।’
प्रतिमानाटक में के अनुसार ऋषि शाप के कारण पुत्रवियोग से दशरथ का मरण अनिवार्य जानकर कैकेयी ने उस शाप की रक्षा करने के लिए और राम को किसी विकट विपत्ति से बचाने के लिए वशिष्ठ,वामदेव आदि से परामर्श करने के बाद राम को वन भिजवाया था।यह सुनकर भरत उनसे पूछते हैं कि आपने चौदह वर्ष का निर्वासन क्यों दिलवाया है।इस पर कैकेयी उत्तर देती हैं कि भूल से ‘१४ दिन’ की जगह ‘१४ वर्ष ‘ मुंह से निकल गया।’जानकीहरण’ में कैकेयी की प्रशंसा इसलिए की गई है कि उनके दोष के कारण राक्षसों का नाश हुआ था–यस्या दोषोदपि भुवनत्रयस्य रक्षोभयनाशाय हेतुर्वभूव।
आध्यात्म रामायण, आनंदरामायण और रामचरित मानस में मंथरा और कैकेयी दोनों को मोहित करने के उद्देश्य से सरस्वती को अयोध्या भेजे जाने का उल्लेख किया गया है।
‘नामु मंथरा मंदमति चेरि कैकयी केरि।
अजस पेटारी ताहि करि गई गिरा मति फेरि।।
आध्यात्म रामायण के अनुसार चित्रकूट में राम ने कैकेयी से कहा था कि वनवास भेजने से संबंधित वाणी मुझसे प्रेरित होकर आपके मुंह से निकली थी।
श्रीराम के वनगमन का कारण और निमित्त कोई भी रहा हो,किंतु,इससे जगत का कल्याण ही हुआ।रावण कुटुम्बियों सहित मारा गया।पृथ्वी राक्षसों के अत्याचार से मुक्त हुई।धर्म की स्थापना हुई।मर्यादा पुरुषोत्तम राम, परब्रह्म परमात्मा के रूप में जगतपूज्य हुए।

