सांस्कृतिक पहचान ढूँढ़ता मध्यप्रदेश

सांस्कृतिक पहचान ढूँढ़ता मध्यप्रदेश

जब आप अपने ठिकाने से निकलकर मुम्बई जैसी मेट्रोपोलिटन सिटी में आते हैं, तब आपके सामने पहचान का संकट खड़ा हो जाता है। जैसे कोई लोकल आदमी आपसे पूछता है कि आप कहाँ से हैं और आप बतलाते हैं ‘मध्यप्रदेश’ से। तब वह सोच में पड़ जाता है कि मध्यप्रदेश यानि कौन सी जगह ? अब आप उलझन में पड़ जाते हैं कि मध्यप्रदेश को कैसे समझाया जाए। आप किसी शहर का नाम बतलाते हैं जो कि उसके लिए और भी अनजान होता है। जो व्यक्ति प्रदेश को ही नहीं जानता हो, वह उसके शहरों को क्या जानेगा? कुछ लोग मध्यप्रदेश यानि उत्तर प्रदेश ही समझते हैं, बोल पड़ते हैं-“अच्छा यूपी।” क्योंकि, यूपी के भैया लोगों की यहाँ भरमार है। जिनसे उनका आए दिन वास्ता पड़ता है।

ऐसा भी नहीं कि वे मध्यप्रदेश के किसी भी शहर को न जानते हों। पर जिन्हें जानते हैं उसके कारण अलग हैं। जैसे उज्जैन बताने पर उन्हें महाकाल मंदिर ध्यान आता है, जहाँ वे कभी न कभी गए हुए होते हैं या जाने के इच्छुक होते हैं। इन्दौर शहर को थोड़े-बहुत लोग इसलिए जानते हैं क्योंकि मुम्बई और इन्दौर के बीच बड़ा व्यापारिक संबंध है। पर उन्हें नहीं मालूम होता है कि ये मध्यप्रदेश के शहर हैं। भोपाल, ग्वालियर, सागर,जबलपुर,रीवा, शहड़ोल जैसे शहर उनके लिए कतई अनजान हैं। आखिर इसका कारण क्या है? शायद इसलिए कि मध्यप्रदेश की अलग से कोई सांस्कृतिक और भाषायी पहचान नहीं है। कहा जा सकता है कि हिंदी मध्यप्रदेश की भाषा है, पर वह तो उत्तर भारत के कई प्रांतों की भाषा है। अगर हम निमाड़ी, मालवी,बुंदेलखंड़ी, बधेली या किसी अन्य बोली को मध्यप्रदेश की पहचान बताएं तो भी बात नहीं बनती। क्योंकि, इनमें से कोई भी पूरे प्रदेश की बोली या भाषा नहीं है। यही संकट सांस्कृतिक पहचान को लेकर भी है। यहाँ ऐसी कोई चीज नहीं है जो पूरे मध्यप्रदेश का सांस्कृतिक परिचय कराती हो। जो हैं भी उनकी एक सीमा है, पर वे पूरे प्रदेश की पहचान नहीं बन पाती। फिर हम लोग करते क्या हैं, कोई विशिष्ट अतिथि हमारे यहाँ आता है तो उन्हें दिखाने को हम स्थानीय आदिवासी जातियों को सजा-धजा कर नचाने ले आते हैं।

दूसरी ओर मुम्बई महानगर को देखें जहाँ स्थानीय के साथ अन्य प्रांत के लोग भी बड़ी तादाद में रहते हैं, जिनकी अपनी भाषा और सांस्कृतिक पहचान है। उनके बोलने के लहजे से ही समझ में आ जाता कि वे कहाँ के हैं। वैसे भी वे समय-समय पर एकजुट होकर उनके यहाँ के सांस्कृतिक कार्यक्रम करते रहते हैं, जिसमें दूसरे लोग भी शामिल होते हैं। इससे सांस्कृतिक एकीकरण स्वत: हो जाता है। जैसे यहाँ तमिल, तेलुगू, उड़िया, कन्नड़, गुजराती, बंगाली,पंजाबी, भोजपुरी, बिहारी आदि। जिनकी अपनी भाषा है, अपनी संस्कृति है, अपनी पहचान है। महाराष्ट्रीयन तो यहाँ भारी तादाद में रहते ही हैं। क्योंकि, यह उनका ही प्रदेश है। उनके सांस्कृतिक कार्यक्रम भी खूब होते हैं। व्यापार-धंधों में यहाँ गुजराती छाए हुए हैं, इसलिए गुजराती का असर भी भरपूर है। मारवाड़ी लोगों की उपस्थिति भी महसूस की जा सकती है।

मजेदार बात तो यह है कि हिंदी सहित अन्य भाषाओं के जो अखबार यहाँ छपते हैं, वे अपने एक-दो पृष्ठों पर अन्य प्रांतों के समाचार छापते हैं, पर उनमें भी मध्यप्रदेश कहीं नहीं होता। सिवाय तब के,जब कोई बड़ी घटना घट गई हो।

दूर की बात क्यों की जाए। मुम्बई में अपने बेटे के पास जहाँ मैं रह रहा हूँ, उस आवासीय परिसर में आठ से दस हजार लोग रहते हैं। जिनमें सभी प्रदेश और संस्कृति के लोग काफी संख्या में हैं। एक तरह से ये ‘मिनि-भारत’ का प्रतिरूप है। यहाँ आए- दिन किसी न किसी समुदाय का कोई न कोई कार्यक्रम होता रहता है। जिनमें सभी लोग बहुत उत्साह से भाग लेते हैंं। उदाहरण के लिए पिछले दिनों तेलुगु समुदाय ने तिरुपति के भगवान बालाजी और लक्ष्मी की प्रतिमा की स्थापना, पूजन और उनके गठबंधन का आयोजन किया था, जिसे सम्पन्न कराने के लिए तिरुपति से पंड़ित- पुजारीगण आए थे। रात्रि में सांस्कृतिक कार्यक्रम और महाप्रसादी का वितरण हुआ, जो सभी रहवासियों के लिए था। यह कुछ ऐसे विशिष्ट कार्यक्रम हैं, जो आप मुंबई जैसे मेट्रोपोलिटन सिटी में ही देख सकते हैं। इनके अलावा महाराष्ट्र के गणेशोत्सव जैसे कार्यक्रम की तो बात ही निराली है। पर हाँ, मध्यप्रदेश से संबंधित कोई सांस्कृतिक कार्यक्रम यहाँ होता हो, ऐसा सुना नहीं है। क्योंकि, शायद ऐसा खास करने जैसा कुछ है भी नहीं। वहाँ बैठे-बैठे भले ही हम अपने प्रदेश पर कितना ही गर्व कर लें, पर बाहर निकलने पर हकीकत पता लगती है। मैं जानता हूँ यह बात कईयों को भली नहीं लगेगी, पर सच्चाई जानना भी तो जरूरी है।

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