
हर सिद्ध पुरुष बाहरी वेषभूषा, बोलचाल, तौर-तरीकों से कुछ अलग दिखे, यह जरूरी नहीं है। अपितु, जो सचमुच पहुँचे हुए पुरुष होते हैं उन्हें तो पहचानना ही मुश्किल होता है। वे चाहते भी नहीं है कि उनके पास भीड़ बढ़े और उनकी साधना में बाधा पैदा हो। किन्तु, आजकल हम जैसे बाबा देख रहे हैं उससे हमारे मन में एक अलग सी छवि बन गई है। हमें लगता है कि जो गेरुआँ रंग के कपड़े न पहने हुए हो, लहराते हुए बड़े बाल न रखे हुए हो, जो वाचाल न हो, जो जादू-मंतर का करिश्मा न बतलाता हो, मंच से प्रवचन न देता हो, भजन-कीर्तन, नाच-गाने से मन न बहलाता हो, जो बीच बीच में श्लोक-चौपाई न सुनाता हो, जो आज की समस्याओं की बात न करके पौराणिक कथाओं में लोगों को उलझाए रखता हो,जिसके कार्यक्रमों में लाखों की भीड़ न जुटती हो, वो भला बाबा या सिद्ध पुरुष कैसे हो सकता है? लोग तो जाते ही हैं “चमत्कार को नमस्कार” करने। पर प्रश्न यह है कि सच्चे संतों को पहचाना कैसे जाए? यह प्रश्न कठिन अवश्य है, पर असंभव भी नहीं। यद्यपि ऐसे संत पुरुष सर्वसुलभ नहीं हैं।
पर कुछ वर्षों पूर्व ऐसे ही सिद्ध संत नागपूर के समीप सावनेर ब्लाक में (मध्यप्रदेश के पांडुरना और सौंसर के समीप) सावंगी नाम के गाँव में हो गए हैं। वैसे भी महाराष्ट्र की धरती संतो की भूमि रही है। यहाँ प्राचीन से अर्वाचीन काल तक संतों की लम्बी श्रृँखला रही है। इसी कड़ी में सावंगी के भैयाजी महाराज भी थे जिन्हें दाजी महाराज भी कहा जाता था। वे बहुत सादा लिबास धारण करते थे। पर सदा श्वेत वस्त्र पहनते थे। जिनमें सफेद कुर्ता, सफेद लुंगी, प्लास्टिक के सफेद जूते, सिर पर सफेद साफी होती थी। वे अपने आश्रम जिसे डेरा कहा जाता था, आम्रकुंज के नीचे बैठते थे। बैठने की व्यवस्था सबके लिए एक जैसी और सादी होती थी। रेत के उपर चटाइयाँ बिछी होती थीं, जिस पर आमजन हो या खास, सब बैठते थे। उनके चेहरे पर सदा मुस्कान तैरती रहती थी जिसे देखकर सबकी चिंता और थकान दूर हो जाती । वे एक-एक कर सबसे उनका नाम, पता और समस्या पूछते थे। जिनका वे शाँति से समाधान कर दिया करते थे। वे किसी को कोई टोना-टोटका नहीं बताते वरन कहते बाबा साहब का स्मरण करो वे ही सब दु:ख दूर करेंगे। सुबह और संध्या वे सभी श्रद्धालुओं को आम के पेड़ के तले ले जाते और बाबा साहब का ध्यान करते। पाँच मिनिट के ध्यान के बाद सभा विसर्जित हो जाती।
वे सर्वधर्म समभाव के पोषक थे, इसलिए उनके पास जितनी तादाद में हिन्दू आते, उतने ही बिना संकोच मुस्लिम भी आते। उनका कहना था कि उसकी राह में किसी के लिए कोई अड़चन नहीं है। अड़चन तो हम लोग अपनी छोटी सोच की वजह से पैदा करते हैं।
उन दिनों आने-जाने के रास्ते कच्चे और कठिनाई भरे थे। बसें भी गिनती की चलती थी। इसलिए दूर से आने वाले जो श्रद्धालु वहाँ रुकना चाहते थे, उनके लिए रुकने, भोजन-प्रसादी की व्यवस्था नि:शुल्क हुआ करती थी। आश्रम और डेरे के कुछ सेवक सदा ही वहाँ रहते थे। जो आश्रम के मार्ग और बगीचे की व्यवस्था भी संभालते।
भैयाजी महाराज अंग्रेजों के जमाने के ग्रेजुएट थे और उनका मराठी, हिंदी और अंग्रेजी पर असाधारण अधिकार था। उन्होंने कई पुस्तकों के साथ मराठी में “प्रार्थना स्तोत्र” नामक पुस्तक भी लिखी, जिसमें भक्ति, ज्ञान, वैराग्य और समर्पण का हृदयग्राही निरूपण किया गया है। इस पुस्तक की प्रस्तावना आचार्य विनोबा भावे ने लिखी थी। इस पुस्तिका को नागपूर विश्वविद्यालय के दर्शनशास्त्र के कोर्स में भी शामिल किया गया था। अभी भी इसका नियमित वाचन भक्तगण करते हैं और विभिन्न आयोजनों में विशेषरूप से पधारे विद्वतजन उस पर अपने विचार रखते हैं।
उनकी इहलीला अप्रेल,1984 में पूर्ण हुई। उसके बाद वहाँ की सम्पूर्ण व्यवस्था उनके बड़े चिरंजीव “बाबा भैया” ने बहुत कुशलता से संभाली। उन्होंने वहाँ एक विशाल स्मृति मंदिर का निर्माण कराया, जिसमें भैयाजी महाराज की समाधि और प्रतिमा स्थापित की। इसके अलावा एक विशाल बहुमंजिला धर्मशाला और कार्यक्रम स्थल का निर्माण कराया। एक वर्ष पूर्व तक, जब तक वे थे वहाँ के संचालन की जिम्मेदारी उन्हीं ने संभाली। उनके बाद उनकी धर्मपत्नी श्रीमती शालिनी ताई वहाँ की देखभाल कर रही हैं।
वहाँ आने वाले श्रद्धालुओं की श्रद्धा इतनी गहन कि वे आज भी मंदिर में भैयाजी महाराज की तेजोमय उपस्थिति और उनकी ऊर्जा महसूस करते हैं। वहाँ हर पूर्णिमा और विशेष अवसरों पर कार्यक्रम आयोजित होते हैं, जिसके बाद महाप्रसादी का वितरण होता है। लोग तीन-तीन, चार-चार वर्ष पूर्व से ऐसे आयोजन में भागीदारी और सम्पूर्ण व्यय उठाने के लिए बुकिंग एड़वांस में करके रखते हैं।
